उमस भरी गर्मी से गर्भस्थ शिशु पर खतरा

साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्म और उमस भरे मौसम का असर गर्भ में पल रहे बच्चे की वृद्धि पर पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया में लाखों बच्चे ठिगनेपन की समस्या का शिकार हो सकते हैं।

उमस भरी गर्मी से गर्भस्थ शिशु पर खतरा

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 10 जून 2026

उमस भरी गर्मी से बढ़ सकता है ठिगनेपन का खतरा

बढ़ती गर्मी और उमस केवल लोगों की दैनिक जिंदगी को प्रभावित नहीं कर रही है बल्कि इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चों के विकास पर भी पड़ सकता है। साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्म और उमस भरा मौसम बच्चे की शारीरिक वृद्धि को प्रभावित कर सकता है जिससे ठिगनेपन का खतरा बढ़ जाता है।

दक्षिण एशिया के लाखों बच्चों पर मंडरा सकता है खतरा

अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और लोगों को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष 2050 तक दक्षिण एशिया में 30 से 37 लाख अतिरिक्त बच्चे ठिगनेपन की समस्या से प्रभावित हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि बढ़ती गर्मी आने वाले वर्षों में बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

दो लाख बच्चों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन

यह शोध दक्षिण एशिया के लगभग दो लाख बच्चों के आंकड़ों पर आधारित है जिनमें अधिकांश बच्चे भारत के थे। अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्मी विशेष रूप से उमस भरी गर्मी का संबंध बच्चों में स्टंटिंग यानी ठिगनेपन से है। शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि शुष्क गर्मी और उमस वाली गर्मी के प्रभावों में स्पष्ट अंतर देखने को मिला।

क्या है स्टंटिंग

विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी बच्चे की लंबाई उसकी उम्र के हिसाब से सामान्य से कम रह जाती है तो उसे स्टंटिंग या ठिगनापन कहा जाता है। यह केवल लंबाई तक सीमित समस्या नहीं है बल्कि इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता और सीखने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

गर्भवती महिलाओं पर कैसे पड़ता है असर

शोध के मुताबिक लंबे समय तक अत्यधिक गर्म और उमस भरे मौसम में रहने से गर्भवती महिलाओं में डिहाइड्रेशन हीट एक्सॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है जिससे शरीर पर दबाव बढ़ता है। इस दबाव का असर प्लेसेंटा पर पड़ सकता है। प्लेसेंटा में रक्त प्रवाह कम होने से गर्भस्थ शिशु तक पर्याप्त पोषण और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इसके कारण बच्चे की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

उमस का असर ज्यादा गंभीर

अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के अंतिम महीनों में अत्यधिक गर्म और उमस भरे वातावरण में रहने वाली महिलाओं के बच्चों की लंबाई उम्र के अनुसार औसतन 5.1 प्रतिशत तक कम हो सकती है। वहीं केवल गर्मी और बिना उमस वाले मौसम में यह प्रभाव लगभग 1.3 प्रतिशत तक देखा गया। इससे स्पष्ट होता है कि केवल तापमान ही नहीं बल्कि हवा में मौजूद नमी भी गर्भस्थ शिशु के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

अंतिम तिमाही में सबसे अधिक जोखिम

शोधकर्ताओं के अनुसार गर्भावस्था की अंतिम तिमाही यानी 28वें सप्ताह से 40वें सप्ताह तक का समय सबसे संवेदनशील होता है। इसी दौरान बच्चे का तेजी से विकास होता है और उसे अधिक पोषण की आवश्यकता होती है। यदि इस अवधि में मां को पर्याप्त आराम और अनुकूल वातावरण नहीं मिलता तो इसका सीधा असर बच्चे के विकास पर पड़ सकता है।

इन राज्यों में अधिक खतरा

अध्ययन में बिहार पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों को अधिक जोखिम वाला बताया गया है। इन इलाकों में गर्मी के साथ उमस का स्तर भी अधिक रहता है जिससे गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।

जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ी चिंता

शोध में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल मौसम या सामान्य स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा। गर्भ में पल रहे बच्चों का विकास भी इससे प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों ने सरकारों और स्वास्थ्य एजेंसियों से गर्भवती महिलाओं को गर्मी और उमस से बचाने के लिए विशेष रणनीति बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।