भारत में एलपीजी संकट गहराया: घरेलू उत्पादन घटा, आयात में भारी गिरावट, सप्लाई पर दबाव बढ़ा

भारत में एलपीजी सप्लाई पर बड़ा असर देखने को मिल रहा है, घरेलू उत्पादन घटा और आयात भी आधा रह गया है। जानें पूरी वजह और इसका भारत पर असर।

भारत में एलपीजी  संकट गहराया: घरेलू उत्पादन घटा, आयात में भारी गिरावट, सप्लाई पर दबाव बढ़ा

दि राइजिंग न्यूज डेस्क | 16 अप्रैल 2026 ।

भारत में एलपीजी (एलपीजी) सप्लाई को लेकर स्थिति लगातार दबाव में बनी हुई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में घरेलू एलपीजी उत्पादन पिछले महीने की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत तक घट गया है, वहीं आयात में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। फरवरी के मुकाबले एलपीजी आयात लगभग आधा रह गया है, जिससे सप्लाई चेन पर असर देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का परिणाम है।

सरकारी और उद्योग सूत्रों के मुताबिक, 1 अप्रैल से 14 अप्रैल के बीच भारत ने प्रतिदिन औसतन लगभग 37,000 टन एलपीजी आयात किया, जबकि फरवरी में यह आंकड़ा लगभग 73,000 टन प्रतिदिन था। आयात में यह गिरावट स्पष्ट रूप से अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधाओं की ओर संकेत करती है। भारत अभी भी अपनी एलपीजी जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है, जिससे सप्लाई में अचानक बदलाव करना मुश्किल हो रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर एलपीजी की अधिकतर आपूर्ति लंबे समय के अनुबंधों के तहत होती है, जिसके कारण तुरंत बाजार से अतिरिक्त गैस खरीदना आसान नहीं है। दूसरी ओर घरेलू मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे सप्लाई और डिमांड के बीच अंतर और बढ़ता जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और मध्य पूर्व में जारी अस्थिरता ने ऊर्जा आपूर्ति को और प्रभावित किया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, स्ट्रेट (ऑफ होर्मुज होर्मुज़ जलडमरूमध्य) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में बाधाओं और ऊर्जा ढांचों पर हमलों के कारण सप्लाई नेटवर्क पर गंभीर असर पड़ा है। इससे न केवल आयात प्रभावित हुआ है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार भी अस्थिर हुआ है। फरवरी से पहले भारत का लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी आयात इसी मार्ग से होकर आता था, लेकिन अब यह हिस्सेदारी घटकर लगभग 55 प्रतिशत रह गई है।

एक विशेषज्ञ अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि प्रभावित आपूर्ति को पूरी तरह सामान्य होने में कम से कम तीन साल या उससे अधिक समय लग सकता है। यह स्थिति भारत के लिए आयात लागत बढ़ाने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। फिलहाल भारत की कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात पर निर्भर है, जिससे देश की ऊर्जा नीति पर भी दबाव बढ़ गया है।

वैश्विक तनाव के बीच भारत की द्रवित पेट्रोलियम गैस सप्लाई पर असर: उत्पादन में कमी, आयात आधा हुआ, संकट गहराया

भारत में द्रवित पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की सप्लाई प्रणाली इस समय दबाव में है और ताजा आंकड़े स्थिति को और गंभीर दिखा रहे हैं। देश में घरेलू एलपीजी उत्पादन पिछले महीने की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत तक घट गया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। फरवरी के मुकाबले एलपीजी आयात लगभग आधा रह गया है, जिससे सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ रहा है।

सरकारी और उद्योग सूत्रों के अनुसार, 1 अप्रैल से 14 अप्रैल के बीच भारत ने प्रतिदिन औसतन लगभग 37,000 टन एलपीजी आयात किया, जबकि फरवरी में यह आंकड़ा करीब 73,000 टन प्रतिदिन था। यह गिरावट वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता और सप्लाई बाधाओं की ओर इशारा करती है। भारत की निर्भरता अब भी मुख्य रूप से खाड़ी देशों पर बनी हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय तनाव का प्रभाव सीधे घरेलू बाजार पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि एलपीजी का वैश्विक व्यापार लंबे समय के अनुबंधों पर आधारित होता है, जिसके कारण अचानक सप्लाई बढ़ाना या विकल्प बदलना आसान नहीं होता। इसी वजह से जब किसी क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो उसका असर तुरंत ऊर्जा आपूर्ति पर दिखता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव और अमेरिका-ईरान विवाद ने ऊर्जा सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में बाधा के कारण वैश्विक ऊर्जा व्यापार कमजोर हुआ है। पहले भारत का लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी इसी मार्ग से आता था, जो अब घटकर लगभग 55 प्रतिशत रह गया है।

घरेलू मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि सप्लाई कम हो रही है, जिससे असंतुलन और बढ़ गया है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में भारत को आयात लागत और सप्लाई दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल भारत की कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात पर निर्भर है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।

घरेलू उत्पादन और आयात दोनों में गिरावट से बढ़ी आपूर्ति की चुनौती

भारत में द्रवित पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की आपूर्ति को लेकर स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है और इसका मुख्य कारण घरेलू उत्पादन और आयात दोनों में एक साथ आई गिरावट है। ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में एलपीजी का घरेलू उत्पादन पिछले महीने की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत तक कम हुआ है, जिससे बाजार में उपलब्ध आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा है। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार से होने वाला आयात भी लगभग आधा रह गया है, जिससे सप्लाई चेन पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है। इस दोहरी गिरावट के कारण देश में एलपीजी की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था पर गंभीर असर देखने को मिल रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब घरेलू उत्पादन में कमी आती है, तो उसकी भरपाई आमतौर पर आयात से की जाती है, लेकिन इस बार वैश्विक परिस्थितियों ने आयात को भी सीमित कर दिया है। इसके कारण आपूर्ति संतुलन बिगड़ गया है और मांग के मुकाबले गैस की उपलब्धता कम हो रही है। भारत अभी भी एलपीजी के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों पर निर्भर है, जिससे अंतरराष्ट्रीय तनाव का सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ रहा है। इस स्थिति ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं भी पैदा कर दी हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति मार्गों में बाधाओं के कारण स्थिति और जटिल हो गई है। खासकर पश्चिम एशिया में अस्थिरता और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम ने एलपीजी की आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसके अलावा लंबी अवधि के अनुबंधों के कारण तुरंत अतिरिक्त आपूर्ति प्राप्त करना भी मुश्किल हो रहा है।

इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि घरेलू उत्पादन में सुधार और वैकल्पिक आयात स्रोतों को मजबूत किए बिना आपूर्ति संकट को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है। यदि यही स्थिति जारी रहती है तो आने वाले समय में एलपीजी की कीमतों और उपलब्धता दोनों पर असर पड़ सकता है, जिसका सीधा प्रभाव आम उपभोक्ताओं पर देखने को मिलेगा।

मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ता अंतर बना चिंता का कारण

भारत में एलपीजी की मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ता अंतर अब एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। देश में घरेलू स्तर पर एलपीजी की खपत लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसी अनुपात में आपूर्ति में वृद्धि नहीं हो पा रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार घरेलू उत्पादन में गिरावट और आयात में कमी के कारण बाजार में उपलब्ध गैस की मात्रा सीमित हो गई है। इस असंतुलन की वजह से कई क्षेत्रों में सप्लाई प्रेशर महसूस किया जा रहा है और वितरण व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब मांग तेजी से बढ़ती है और आपूर्ति स्थिर या कम हो जाती है, तो उसका सीधा असर बाजार संतुलन पर पड़ता है।

ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में एलपीजी की खपत बढ़ने के कारण मांग लगातार ऊपर जा रही है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं के विस्तार के बाद एलपीजी उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन वैश्विक आपूर्ति संकट और घरेलू उत्पादन में कमी के चलते सप्लाई उसी गति से नहीं बढ़ पा रही है। इससे उपभोक्ताओं तक समय पर गैस पहुंचाने में भी चुनौतियां सामने आ रही हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता और लंबी अवधि के अनुबंधों पर निर्भरता भी इस असंतुलन को और बढ़ा रही है। जब वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। इसी कारण मांग और आपूर्ति के बीच अंतर और अधिक बढ़ जाता है, जो भविष्य में कीमतों पर भी असर डाल सकता है।

यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो देश को ऊर्जा नीति और आपूर्ति रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। आने वाले समय में वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी, ताकि इस असंतुलन को कम किया जा सके और उपभोक्ताओं को स्थिर आपूर्ति मिल सके। 

अंतरराष्ट्रीय तनाव से प्रभावित हुई भारत की एलपीजी सप्लाई चेन

भारत की एलपीजी (द्रवित पेट्रोलियम गैस) सप्लाई चेन पर अंतरराष्ट्रीय तनाव का सीधा और गहरा असर देखने को मिल रहा है, जिससे देश की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। वैश्विक स्तर पर विशेष रूप से पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते विवाद ने ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। इन परिस्थितियों के कारण एलपीजी की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई बाधित हुई है और कई प्रमुख समुद्री मार्गों पर भी जोखिम बढ़ गया है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बाहरी स्रोतों पर काफी हद तक निर्भर हैं।

विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य ( होर्मुज़ जलडमरूमध्य ) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में बाधाओं और अस्थिरता ने आपूर्ति श्रृंखला को कमजोर कर दिया है। यह वही प्रमुख रास्ता है जिससे पहले भारत का बड़ा हिस्सा एलपीजी आयात होता था। अब इस मार्ग पर अनिश्चितता बढ़ने के कारण आपूर्ति में देरी और कमी देखने को मिल रही है। इसके अलावा कई ऊर्जा परियोजनाओं और ढांचों पर तनावपूर्ण हालातों का असर भी पड़ा है, जिससे वैश्विक उत्पादन और वितरण प्रभावित हुआ है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि एलपीजी का वैश्विक व्यापार ज्यादातर दीर्घकालिक अनुबंधों पर आधारित होता है, जिसके कारण अचानक सप्लाई बढ़ाना या वैकल्पिक स्रोतों की ओर तेजी से शिफ्ट करना आसान नहीं होता। इसी वजह से जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ता है, तो उसका प्रभाव तुरंत भारत की सप्लाई चेन पर दिखाई देता है। इससे न केवल आयात प्रभावित होता है, बल्कि घरेलू बाजार में भी अस्थिरता बढ़ जाती है।

यदि वैश्विक तनाव इसी तरह जारी रहता है, तो आने वाले समय में भारत को एलपीजी की उपलब्धता, कीमत और आयात लागत तीनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत विकसित करने की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।