रावण जन्म के साथ शुरू हुई रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला:शाही अंदाज में निकली काशी नरेश की सवारी, PAC के जवानों ने दी सलामी
विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला का शुक्रवार को परंपरागत ढंग से शुभारंभ हुआ। रावण जन्म के साथ शुरू हुई रामलीला में पहले दिन रावण के यज्ञ, ब्रह्मा से वरदान प्राप्त करने और इसके बाद उसके अत्याचारों से देवलोक और पृथ्वी पर मचे हाहाकार का मंचन किया गया। रामनगर की गलियों और निर्धारित लीला स्थलों पर जुटे हजारों श्रद्धालु और लीला प्रेमी इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बने। काशी राज परिवार के अनंत नारायण सिंह की मौजूदगी में शाम करीब पांच बजे रामबाग के मुख्य द्वार के पास पहले दिन की लीला शुरू हुई। परंपरा के अनुसार शाही सवारी के रामलीला स्थल पर पहुंचने के बाद ही लीला का मंचन शुरू हुआ। अनंत नारायण सिंह शाही बग्गी पर सवार होकर लीला स्थल तक पहुंचे। रास्ते के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग उनकी एक झलक पाने के लिए खड़े रहे। शाही सवारी के गुजरने पर हर-हर महादेव के जयघोष गूंजते रहे। रामलीला स्थल पहुंचने पर पीएसी जवानों ने काशी राज परिवार के मुखिया को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। इसके बाद अनंत नारायण सिंह हाथी पर सवार होकर लीला देखने पहुंचे। इस दौरान सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए थे। रावण जन्म से शुरू हुआ लीला का पहला प्रसंग पहले दिन की लीला की शुरुआत रावण जन्म से हुई। जन्म के बाद रावण ने अपने घर में यज्ञ किया। उसकी तपस्या और यज्ञ से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उसे इच्छित वर मांगने को कहा। रावण ने ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि मनुष्य और वानर के अलावा कोई भी उसका वध न कर सके। ब्रह्मा जी ने तथास्तु कहकर उसे वरदान प्रदान कर दिया। इसी क्रम में कुंभकर्ण ने छह महीने सोने और एक दिन जागने का वरदान मांगा। लीला में इसके बाद रावण के बढ़ते अहंकार और उसके अत्याचारों का प्रसंग सामने आया। वरदान मिलने के बाद रावण ने देवलोक में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। उसने कुबेर को पराजित कर उनका पुष्पक विमान भी छीन लिया। राक्षसों के बढ़ते आतंक से देवता भयभीत हो उठे और देवराज इंद्र देवताओं के साथ बैकुंठ की ओर चले गए। लंकनी को मिला रावण के अंत का संकेत लीला में ब्रह्मा जी और लंकनी के संवाद का भी मंचन हुआ। ब्रह्मा जी ने संकेत दिया कि रावण लंबे समय तक राज करेगा, लेकिन एक समय ऐसा आएगा जब एक वानर का निरादर करना उसके विनाश की शुरुआत बनेगा। वानर के एक प्रहार से लंकनी के बेहाल होने को राक्षस राज के अंत का संकेत बताया गया। उधर रावण के अत्याचारों से त्रस्त पृथ्वी गाय का रूप धारण कर ब्रह्मा जी के पास पहुंची और अपनी पीड़ा बताई। इसके बाद देवताओं और पृथ्वी की ओर से रावण के आतंक से मुक्ति की प्रार्थना का प्रसंग सामने आया। मानस की चौपाइयों के बीच एक घंटे का विराम पहले दिन की लीला में श्रीरामचरितमानस के बालकांड की चौपाइयों का गायन भी हुआ। इसके बाद लीला को करीब एक घंटे का विराम दिया गया। इस दौरान रामलीला देखने पहुंचे लोगों ने रामनगर में लगे मेले का आनंद लिया। विराम के बाद क्षीर सागर की भव्य झांकी के साथ अगले प्रसंग का मंचन शुरू हुआ। 1783 से चली आ रही है रामनगर की रामलीला रामनगर की रामलीला को काशी की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष स्थान प्राप्त है। इसका आयोजन वर्ष 1783 में तत्कालीन काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह के समय शुरू हुआ माना जाता है। अनंत चतुर्दशी के अवसर पर रावण जन्म के साथ इसकी शुरुआत होती है और करीब एक महीने तक अलग-अलग स्थानों पर रामचरितमानस के प्रसंगों का मंचन किया जाता है। इस रामलीला की सबसे खास बात यह है कि यह किसी एक स्थायी मंच तक सीमित नहीं है। रामनगर के अलग-अलग निर्धारित स्थलों पर लीला के प्रसंगों का मंचन होता है। करीब चार किलोमीटर के क्षेत्र में लीला के अलग-अलग प्रसंग आगे बढ़ते हैं। हर दिन हजारों की संख्या में लीला प्रेमी इसे देखने पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे नेमी लीला प्रेमियों की होती है, जो पूरे महीने नियमित रूप से रामलीला में शामिल होते हैं। आधुनिकता से दूर आज भी कायम है पुराना स्वरूप रामनगर की रामलीला ने आधुनिक तकनीक के दौर में भी अपनी पारंपरिक पहचान को काफी हद तक सुरक्षित रखा है। लीला में बड़े मंच, आधुनिक लाइट और लाउडस्पीकर की जगह पारंपरिक व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता है। पेट्रोमैक्स की रोशनी में रामचरितमानस की चौपाइयों और संवादों के साथ लीला आगे बढ़ती है। लीला के पात्र भी संवादों को ऊंची और स्पष्ट आवाज में बोलते हैं, ताकि आसपास मौजूद दर्शकों तक उनकी आवाज पहुंच सके। यहां मंचन के दौरान वातावरण में रामचरितमानस की चौपाइयों की गूंज और धार्मिक जयघोष एक अलग ही माहौल पैदा करते हैं। चार महीने पहले शुरू हो जाती है पात्रों की तैयारी रामनगर की रामलीला की तैयारी भी अपने आप में खास है। अनंत चतुर्दशी से करीब चार महीने पहले पात्रों के चयन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। परंपरा के अनुसार लीला के पात्रों का चयन विशेष प्रक्रिया से किया जाता है। चयनित पात्रों को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है और इस अवधि में उन्हें सात्विक भोजन दिया जाता है। कई पात्रों के परिवार पीढ़ियों से रामलीला की परंपरा से जुड़े हुए हैं। उनके लिए यह केवल अभिनय नहीं, बल्कि धार्मिक और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है। काशी के कई परिवारों की चौथी पीढ़ी भी आज इस परंपरा का निर्वहन कर रही है।
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