रूस-यूक्रेन युद्ध: पुतिन को क्यों सता रहा फांसी का डर डोनबास बना सत्ता बचाने की सबसे बड़ी चुनौती

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच व्लादिमीर पुतिन को अपनी सत्ता और जान का डर सताने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, डोनबास पर पूर्ण नियंत्रण के बिना युद्ध समाप्त करना पुतिन के लिए राजनीतिक रूप से खतरनाक हो सकता है।

Sep 02, 2026 - 15:49
Updated: 1 month ago
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रूस-यूक्रेन युद्ध: पुतिन को क्यों सता रहा फांसी का डर डोनबास बना सत्ता बचाने की सबसे बड़ी चुनौती

दि राइजिंग न्यूज़ | यूक्रेन | 2 सितंबर 2026

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लेकर एक चौंकाने वाला दावा सामने आया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पुतिन को आशंका है कि यदि रूस ने डोनबा#यूक्रेनस पर पूरी तरह कब्जा किए बिना युद्ध समाप्त किया, तो उनके अपने करीबी और ताकतवर लोग उनके खिलाफ हो सकते हैं। इसी संदर्भ में उनके हवाले से कथित तौर पर कहा गया कि ‘वे मुझे फांसी पर लटका देंगे।’यह कथित टिप्पणी सार्वजनिक मंच पर नहीं, बल्कि पुतिन के बेहद करीबी लोगों के बीच कही गई बताई गई है। इसका उल्लेख द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन के लिए यूक्रेन युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं रह गया है, बल्कि यह उनकी सत्ता, प्रतिष्ठा और राजनीतिक भविष्य से भी जुड़ चुका है।

पुतिन को अपनी जान का डर क्यों

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुतिन की चिंता केवल युद्ध हारने तक सीमित नहीं है। उन्हें डर है कि यदि रूस को युद्ध में अपेक्षित सफलता नहीं मिली और डोनबास का पूरा क्षेत्र उसके नियंत्रण में नहीं आया, तो रूस के प्रभावशाली वर्ग में उनके खिलाफ असंतोष बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में उनकी सत्ता कमजोर पड़ने की आशंका पैदा हो सकती है।रूस की सत्ता व्यवस्था में मजबूत नेतृत्व की छवि को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में युद्ध के बीच पीछे हटना या अधूरी जीत के साथ समझौता करना पुतिन के लिए राजनीतिक कमजोरी का संकेत माना जा सकता है। यही वजह बताई जा रही है कि युद्ध समाप्त करने की बजाय वह सैन्य दबाव बढ़ाने का रास्ता अपना सकते हैं।

डोनबास पुतिन के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है

डोनबास में यूक्रेन के डोनेत्स्क और लुहांस्क क्षेत्र शामिल हैं। यह इलाका लंबे समय से रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है। औद्योगिक महत्व के साथ-साथ इस क्षेत्र का राजनीतिक और सामरिक महत्व भी बहुत अधिक है।रिपोर्ट के अनुसार, रूस डोनबास के बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर चुका है, लेकिन कुछ क्षेत्र अभी भी यूक्रेन के कब्जे में हैं। पुतिन के लिए यही बचा हुआ हिस्सा बड़ी चुनौती बना हुआ है। पूरे डोनबास पर नियंत्रण को रूस की घोषित युद्ध उपलब्धियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

डोनबास पर कब्जा पुतिन की ‘जीत’ की शर्त क्यों

द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे डोनबास पर कब्जा पुतिन के लिए युद्ध की न्यूनतम सफलता का पैमाना बन चुका है। यदि रूस इस लक्ष्य को पूरा किए बिना युद्ध समाप्त करता है, तो इसे रूसी सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर अधूरी जीत के तौर पर देखा जा सकता है।डोनबास पर नियंत्रण रूस के लिए केवल जमीन हासिल करने का मामला नहीं है। यह युद्ध के दौरान किए गए दावों और रूस की सैन्य शक्ति की छवि से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण पुतिन के लिए राजनीतिक और प्रचारात्मक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बताया जा रहा है।

युद्ध की समय सीमा लगातार बढ़ रही है

रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी सेना के अधिकारियों ने पहले दावा किया था कि वर्ष 2026 की सर्दियों तक डोनबास पर पूरा नियंत्रण हासिल किया जा सकता है। लेकिन युद्ध की जमीनी परिस्थितियां इन दावों के अनुरूप नहीं दिखाई दे रही हैं। डोनबास पर कब्जे की समय सीमा पहले भी कई बार आगे बढ़ाई जा चुकी है।अगस्त 2026 के अंत में यूक्रेनी राष्ट्रपति कार्यालय के उप प्रमुख पावलो पालिसा ने दावा किया कि रूसी सैन्य अधिकारी अब इस लक्ष्य की समय सीमा को मार्च 2027 तक बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह दावा सही है, तो इससे संकेत मिलता है कि रूस के लिए डोनबास पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करना अपेक्षा से अधिक कठिन साबित हो रहा है।

रूस के भीतर बदल रहा है माहौल

एस्टोनियाई खुफिया प्रमुख काउपो रोसिन के अनुसार, रूस के प्रभावशाली वर्ग की सोच में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई दे रहा है। उनका कहना है कि रूसी अभिजात वर्ग के लिए केवल सार्वजनिक असंतोष महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उन लोगों का रुख ज्यादा मायने रखता है जिनके पास धन, हथियार और सत्ता तक पहुंच है।बताया जा रहा है कि रूसी प्रभावशाली वर्ग में अब युद्ध को अनिश्चित समय तक जारी रखने के बजाय उसे समाप्त करने को लेकर चर्चा बढ़ रही है। यदि सत्ता के करीबी लोगों में युद्ध को लेकर मतभेद बढ़ते हैं, तो यह पुतिन के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती बन सकती है।

पुतिन युद्ध को और बढ़ाने की तैयारी में

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि युद्ध रोकने के बजाय पुतिन सैन्य दबाव बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इसके तहत रूस बड़ी संख्या में नए सैनिकों की भर्ती, यूक्रेन के खिलाफ हमले तेज करने और पश्चिमी देशों पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ाने की रणनीति अपना सकता है।रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि रूस यूक्रेन के पश्चिमी सहयोगियों के खिलाफ तोड़फोड़ और दूसरे प्रकार के दबाव बढ़ा सकता है। हालांकि, पश्चिमी देशों की आशंका के बावजूद पुतिन सीधे नाटो के साथ सैन्य टकराव से बचना चाह सकते हैं।

बड़ी संख्या में नए सैनिक भेजने की तैयारी का दावा

कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि रूस लगभग चार लाख अतिरिक्त सैनिकों को युद्ध में भेजने की तैयारी कर सकता है। इसके लिए वर्ष 2022 में जारी लामबंदी संबंधी आदेश का इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य रूसी सेना की संख्या बढ़ाकर मोर्चे पर लगातार सैन्य दबाव बनाए रखना बताया जा रहा है।हालांकि, सैनिकों की भर्ती और उन्हें युद्ध क्षेत्र में भेजने से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। यदि रूस वास्तव में बड़े पैमाने पर अतिरिक्त सैनिक भेजता है, तो इससे युद्ध की अवधि और तीव्रता दोनों बढ़ सकती हैं।

यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे पर हमले का खतरा

रिपोर्ट में आने वाली सर्दियों के दौरान यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे पर बड़े हवाई हमलों की आशंका भी जताई गई है। रूस पहले भी यूक्रेन की बिजली व्यवस्था और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाता रहा है। सर्दियों में ऐसे हमलों का असर आम नागरिकों पर काफी गंभीर हो सकता है।ऊर्जा ढांचे पर हमले का उद्देश्य यूक्रेन की सैन्य क्षमता के साथ-साथ उसकी नागरिक व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ाना हो सकता है। बिजली और गर्मी की आपूर्ति बाधित होने से आम लोगों की मुश्किलें बढ़ने की आशंका रहती है।

अमेरिकी खुफिया प्रमुख की मॉस्को यात्रा का भी जिक्र

रिपोर्ट में अमेरिकी खुफिया प्रमुख जॉन रैटक्लिफ की कथित मॉस्को यात्रा का भी उल्लेख किया गया है। दावा है कि पुतिन ने इस यात्रा को अमेरिका की कमजोरी या झिझक के संकेत के रूप में देखा। रिपोर्ट में इसकी तुलना वर्ष 2022 में अमेरिकी खुफिया प्रमुख विलियम बर्न्स की रूस यात्रा से भी की गई है।हालांकि, किसी नेता की निजी सोच के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना आसान नहीं होता। रिपोर्ट में भी माना गया है कि कोई बाहरी व्यक्ति पुतिन की मानसिक स्थिति को पूरी तरह नहीं जान सकता। इसलिए इन दावों को रिपोर्ट में बताए गए स्रोतों और विश्लेषण के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

पुतिन के सामने युद्ध रोकना भी मुश्किल, जारी रखना भी

रूस के सामने अब एक कठिन स्थिति बताई जा रही है। युद्ध जारी रखने से देश के आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और लंबे संघर्ष से सैनिकों तथा सैन्य सामग्री का नुकसान भी होता है। दूसरी ओर, बिना स्पष्ट जीत के युद्ध रोकना पुतिन की राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।यही दोहरा दबाव पुतिन की रणनीति को समझने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि वह युद्ध जारी रखते हैं तो रूस पर आर्थिक और मानवीय बोझ बढ़ता जाएगा। यदि वह अचानक पीछे हटते हैं तो सत्ता के भीतर उनकी स्थिति कमजोर होने का खतरा पैदा हो सकता है।

रूस की जनता के रुख में भी बदलाव का दावा

रिपोर्ट के अनुसार, रूस में युद्ध को लेकर लोगों की उदासीनता धीरे-धीरे कम हो रही है। राज्य समर्थित प्रचार के बावजूद सामाजिक माध्यमों पर युद्ध को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं। युवा वर्ग में युद्ध के प्रति असहमति बढ़ने का दावा भी किया गया है।लेवाडा केंद्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 57 प्रतिशत रूसी नागरिक देश की स्थिति को तनावपूर्ण मानते हैं। हालांकि, किसी भी सर्वेक्षण को व्यापक राजनीतिक बदलाव का अंतिम प्रमाण मानने से पहले उसके संदर्भ और पद्धति को समझना जरूरी है।

सम्राट के कपड़े नहीं हैं’ वाली धारणा क्यों चर्चा में

रिपोर्ट में रूसी अभिजात वर्ग के बदलते रुख को समझाने के लिए ‘सम्राट के कपड़े नहीं हैं’ वाली प्रसिद्ध कहानी का उदाहरण दिया गया है। इसका अर्थ ऐसी स्पष्ट सच्चाई से है, जिसे बहुत से लोग जानते हैं, लेकिन सत्ता के डर से खुलकर बोल नहीं पाते।रूस के संदर्भ में इसका इस्तेमाल इस धारणा को समझाने के लिए किया गया है कि प्रभावशाली वर्ग के कुछ लोग अब युद्ध की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठाने लगे हैं। यदि यह असंतोष सत्ता के भीतर बढ़ता है, तो पुतिन के लिए चुनौती केवल यूक्रेन के मोर्चे तक सीमित नहीं रहेगी।

पुतिन के लिए सबसे बड़ी लड़ाई सत्ता बचाने की

रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल रूस और यूक्रेन के बीच क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है। यह व्लादिमीर पुतिन के राजनीतिक भविष्य से भी जुड़ता जा रहा है। डोनबास पर नियंत्रण हासिल करना उनके लिए सैन्य लक्ष्य के साथ-साथ अपनी मजबूत नेता की छवि बनाए रखने का सवाल भी बन गया है।‘वे मुझे फांसी पर लटका देंगे’ वाली कथित टिप्पणी यदि रिपोर्ट के अनुसार सही है, तो यह पुतिन की अंदरूनी चिंता की ओर संकेत करती है। हालांकि, पुतिन के वास्तविक डर और भविष्य की रणनीति के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। इतना जरूर है कि युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, रूस की सत्ता, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक अभिजात वर्ग पर दबाव उतना ही बढ़ सकता है

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