नेपाल बाढ़ में अपनों की तलाश खत्म होने लगी, ‘बस पार्थिव शरीर मिल जाए’

नेपाल की भीषण बाढ़ में 1,125 लोगों की मौत और चार हजार से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। काठमांडू और त्रिशूली में परिवार अब भी अपनों की तलाश कर रहे हैं। बलिया निवासी अशोक कुमार चौरसिया ने बाढ़ में घर, कारोबार और परिवार के सदस्यों को खो दिया।

Sep 02, 2026 - 15:20
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नेपाल बाढ़ में अपनों की तलाश खत्म होने लगी, ‘बस पार्थिव शरीर मिल जाए’

दि राइजिंग न्यूज़ | काठमांडू | 02 सितंबर 2026

नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने हजारों परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। काठमांडू से लेकर त्रिशूली तक परिजन अपने लापता प्रियजनों की तलाश में अस्पतालों और शवगृहों के चक्कर लगा रहे हैं। कई दिन बीत

नेपाल बाढ़ में बढ़ती तबाही, हजारों लोग अब भी लापता

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़ी संख्या में लोगों की जिंदगी उजाड़ दी है। दी गई जानकारी के अनुसार, अब तक 1,125 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि चार हजार से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। कई परिवारों के सामने ऐसी त्रासदी आई है, जिसमें उनका कोई भी सदस्य सुरक्षित नहीं बचा।बाढ़ के कई दिन बीत जाने के बाद भी राहत और खोज अभियान जारी है। हालांकि, समय गुजरने के साथ लापता लोगों के परिवारों की उम्मीद कमजोर पड़ती जा रही है। जिन लोगों के परिजन अब तक नहीं मिले हैं, वे अस्पतालों और शवगृहों के बाहर उनकी तस्वीरें और पहचान से जुड़े निशान तलाश रहे हैं।

अस्पताल की तस्वीरों में अपनों को खोज रहे परिजन

काठमांडू के अस्पतालों के बाहर लापता लोगों की तस्वीरें लगाई गई हैं। परिवार के सदस्य एक-एक तस्वीर को ध्यान से देखते हैं और उसमें अपने रिश्तेदार की पहचान खोजने की कोशिश करते हैं। कई तस्वीरें और पहचान संबंधी विवरण समय बीतने के साथ धुंधले पड़ते जा रहे हैं।शवगृह के बाहर का दृश्य और भी पीड़ादायक है। परिवार के लोग मृतकों की तस्वीरों को देखकर अपने लापता परिजनों से मिलान कर रहे हैं। किसी चेहरे की पहचान मुश्किल होने पर लोग शरीर पर मौजूद कपड़े, आभूषण या दूसरे पहचान चिह्नों के सहारे अपने प्रियजन तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।

‘अब बस पार्थिव शरीर मिल जाए...’

काठमांडू में अपनों की तलाश कर रहे कई परिवारों की आंखों में अब उम्मीद के साथ गहरा दर्द दिखाई दे रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि शुरुआती दिनों में उन्हें उम्मीद थी कि उनके परिजन कहीं सुरक्षित मिल जाएंगे, लेकिन अब कई दिन बीत चुके हैं। ऐसे में उनकी सबसे बड़ी इच्छा केवल अपने प्रियजन के पार्थिव शरीर को खोज पाना रह गई है।परिवारों का कहना है कि यदि उनका अपना व्यक्ति जीवित नहीं है तो कम से कम उसका पार्थिव शरीर मिल जाए। इससे वे अंतिम संस्कार और अंतिम कर्मकांड पूरे कर सकेंगे। लापता लोगों की तलाश में लगे परिवारों के लिए हर गुजरता दिन मानसिक पीड़ा को और बढ़ा रहा है।

त्रिशूली में मलबे से निकाले जा रहे शव

त्रिशूली क्षेत्र में बाढ़ और पहाड़ी मलबे ने भारी तबाही मचाई है। ऊंचाई वाले इलाकों से मलबे में दबे लोगों के शव बरामद किए जा रहे हैं। बरामद शवों को हेलीकॉप्टर के माध्यम से त्रिशूली के सेना प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचाया जा रहा है।प्रशिक्षण केंद्र में शवों को सुरक्षित रखा जा रहा है और बाद में उन्हें वाहन के माध्यम से संबंधित स्थानों पर ले जाया जा रहा है। राहत दलों के लिए भी यह अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। पहाड़ी इलाकों में बाढ़ और मलबे के कारण खोज अभियान में लगातार कठिनाइयां सामने आ रही हैं।

बलिया से नेपाल पहुंचे अशोक कुमार की जिंदगी उजड़ी

त्रिशूली में तबाही का एक दर्दनाक चेहरा उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रसड़ा निवासी अशोक कुमार चौरसिया की कहानी में सामने आया है। करीब 20 वर्ष पहले वह बेहतर जिंदगी की तलाश में नेपाल आए थे। मेहनत के दम पर उन्होंने नुवाकोट के त्रिशूली क्षेत्र में कपड़ों का बड़ा कारोबार खड़ा कर लिया था।अशोक कुमार की इलाके में एक-दो नहीं बल्कि छह कपड़ों की दुकानें थीं। उनका कारोबार त्रिशूली से लेकर रसुवा तक फैला हुआ था और उन्होंने परिवार के लिए एक मजबूत आर्थिक आधार बनाया था। लेकिन 26 अगस्त की बाढ़ और मलबे ने कुछ ही समय में उनकी वर्षों की मेहनत को तबाह कर दिया।

मकान-दुकान तबाह, करोड़ों रुपये का नुकसान

बाढ़ के पानी और पहाड़ से आए मलबे ने अशोक कुमार का मकान और उनकी सभी दुकानों को भारी नुकसान पहुंचाया। उनके अनुसार, इस आपदा में चार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। कारोबार के साथ-साथ परिवार की जमा पूंजी और कीमती सामान भी बाढ़ की चपेट में आ गया।अशोक कुमार ने बताया कि बेटे की शादी के लिए बनवाए गए आभूषण भी बाढ़ में बह गए। उनके अनुसार, करीब 52 तोला सोना भी इस आपदा में नष्ट हो गया। जिस व्यक्ति ने दो दशक में अपनी मेहनत से कारोबार खड़ा किया था, वह आज अपने सामने सब कुछ उजड़ता देख रहा है।

‘बाढ़ से पहले मैं यहां का राजा था, आज भिखारी बन गया’

अशोक कुमार ने अपनी स्थिति बताते हुए कहा कि बाढ़ से पहले उनके पास कारोबार, घर और संपत्ति थी और इलाके में उनका सम्मान था। लेकिन प्राकृतिक आपदा ने उनसे सब कुछ छीन लिया। उनका कहना है कि कुछ ही समय में वह ऐसी स्थिति में पहुंच गए जहां उनके पास दोबारा जिंदगी शुरू करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।उनकी कहानी केवल आर्थिक नुकसान की नहीं बल्कि उस दर्द की भी है, जिसमें वर्षों की मेहनत और परिवार की सुरक्षा एक झटके में खत्म हो गई। बाढ़ ने उनके व्यापार को ही नहीं, बल्कि उनके परिवार को भी गहरा आघात पहुंचाया है।

पत्नी और 20 वर्षीय बेटे को खोने का दर्द

अशोक कुमार के भाई ने रोते हुए बताया कि उनकी पत्नी ऊषा देवी और 20 वर्षीय बेटा राहुल बाढ़ में बह गए। जिस समय यह हादसा हुआ, वह घर पर मौजूद नहीं थे। अब उन्हें इस बात का जीवनभर अफसोस रहेगा कि काश उस दिन वह घर से बाहर नहीं गए होते।उन्होंने बताया कि परिवार के सदस्यों को बचा न पाने का दर्द उन्हें लगातार परेशान कर रहा है। एक तरफ घर और कारोबार पूरी तरह उजड़ चुका है, वहीं दूसरी तरफ परिवार के दो सदस्यों के चले जाने का दुख है। त्रिशूली की बाढ़ ने कई ऐसे परिवारों को इसी तरह अपनों से हमेशा के लिए अलग कर दिया है।

नेपाल में बाढ़ के बाद गहरा मानवीय संकट

नेपाल में आई इस प्राकृतिक आपदा ने केवल जन-धन को नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि हजारों परिवारों को गहरे मानसिक और सामाजिक संकट में डाल दिया है। जिन लोगों के परिजन लापता हैं, वे आज भी अस्पतालों और शवगृहों के बाहर किसी खबर का इंतजार कर रहे हैं।समय बीतने के साथ सुरक्षित वापसी की उम्मीद कमजोर हो रही है, लेकिन परिवारों की तलाश अभी खत्म नहीं हुई है। कई लोग अब भी अपने प्रियजनों की पहचान मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ताकि कम से कम उन्हें अंतिम विदाई दी जा सके। नेपाल की यह त्रासदी प्रभावित परिवारों के लिए लंबे समय तक न भरने वाला घाव छोड़ सकती है।

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