SI भर्ती को चुनौती देने वाली 22 याचिकाएं खारिज:इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नियुक्ति पर रोक लगाई थी, अब चयन प्रक्रिया का रास्ता साफ

Oct 11, 2026 - 17:22
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SI भर्ती को चुनौती देने वाली 22 याचिकाएं खारिज:इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नियुक्ति पर रोक लगाई थी, अब चयन प्रक्रिया का रास्ता साफ
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर (सिविल पुलिस) और समकक्ष पदों की सीधी भर्ती 2025 की लिखित परीक्षा की अंतिम उत्तर कुंजी को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने श्याम सुंदर व 2 अन्य सहित कुल 22 याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाया। इससे पहले सुनवाई कर हाईकोर्ट ने नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। अब याचिकाओं के खारिज होने से चयन प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया। 4,543 पदों के लिए परीक्षा हुई थी भर्ती बोर्ड ने 12 अगस्त 2025 के विज्ञापन के तहत 4,543 पदों के लिए परीक्षा आयोजित की थी। लिखित परीक्षा 14 और 15 मार्च 2026 को हुई। 23 मार्च 2026 को प्रोविजनल आंसर की जारी हुई और अभ्यर्थियों से आपत्तियां मांगी गईं। बोर्ड ने 32 प्रश्नों को जांच के लिए चुना और विषय विशेषज्ञों से संदर्भ-स्रोतों सहित राय ली। इसके बाद 7 मई 2026 को अंतिम उत्तर कुंजी और परीक्षा परिणाम जारी हुआ, जिसमें करीब 12,333 अभ्यर्थी सफल घोषित किए गए। दस्तावेज सत्यापन, शारीरिक मानक परीक्षा और शारीरिक दक्षता परीक्षा के बाद 14 जुलाई 2026 को अंतिम परिणाम घोषित हुआ। याचिकाकर्ता इसमें सफल नहीं हो सके। याचिकाकर्ताओं ने दलीलें दीं याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे और प्रभाकर अवस्थी संजय यादव सहित कई अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा। उनकी प्रमुख दलीलें ये थीं। कुछ प्रश्नों के सही उत्तर पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पहले अन्य भर्तियों में अंतिम निर्णय दे चुकी है, इसलिए वही उत्तर सही माना जाए। जिन अभ्यर्थियों के उत्तर प्रोविजनल आंसर की में सही थे, उन्हें आपत्ति का मौका ही नहीं मिला। फाइनल आंसर की में बोर्ड ने कुछ उत्तर बदल दिए, पर उसके बाद आपत्ति का कोई अवसर नहीं दिया गया। पक्षपात का आरोप नहीं लगा सकते अदालत ने कहा कि डिवीजन बेंच के पूर्व फैसले भी उसी कोर्ट से गठित विशेषज्ञ समिति की राय पर आधारित थे। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि बोर्ड के जवाबी हलफनामे का जवाब दाखिल करने का अवसर दिए जाने पर सभी याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कहा कि वे रिजॉइंडर दाखिल नहीं करना चाहते। साथ ही, कोर्ट के सीधे सवाल पर भी कोई वकील बोर्ड पर दुर्भावना (मालाफाइड), पक्षपात या अनुचित साधन अपनाने का आरोप नहीं लगा सका। कोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रश्न पर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग हो सकती है और कोई भी राय अंतिम नहीं कही जा सकती। ऐसे में परीक्षा आयोजित करने वाला बोर्ड ही सभी विशेषज्ञ राय पर विचार कर उत्तर की शुद्धता तय करेगा, जो इस मामले में किया गया। इसलिए अदालत ने किसी विशेष प्रश्न के उत्तर की सत्यता में गए बिना ही प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं पाई। दोबारा आपत्ति का अवसर नहीं अंतिम आंसर-की पर दोबारा आपत्ति का अवसर न देने की दलील को कोर्ट ने पूरी तरह निराधार बताया। न्यायालय के अनुसार ऐसा अवसर देने पर प्रक्रिया अंतहीन हो जाएगी और परिणाम कभी अंतिम नहीं हो सकेगा, क्योंकि हर उत्तर कुंजी पर आपत्तियां आती ही हैं। फैसले में बताया गया है कि चयन प्रक्रिया नियुक्ति पत्र जारी करने को छोड़कर पूरी हो चुकी थी। अदालत ने पहले एक आदेश से नियुक्ति पत्र जारी करने पर रोक लगाई थी, जो मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना थी, क्योंकि समय तय होने के बावजूद राज्य की ओर से स्थगन मांगा गया था। अब सभी याचिकाएं खारिज होने से चयन प्रक्रिया पर आगे बढ़ने का रास्ता साफ माना जा रहा है। सुनवाई में राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल, स्थायी अधिवक्ता राम स्वरूप उमराव और ब्रीफ होल्डर आकांक्षा मिश्रा उपस्थित रहे।

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