चीन की नजर F-35 पर! सऊदी डील से अमेरिका क्यों डरा?

अमेरिका ने सऊदी अरब को 48 एफ-35 लड़ाकू विमान और 49 इंजन देने वाले करीब 24.3 अरब डॉलर के संभावित सौदे को आगे बढ़ाया है। वहीं अमेरिकी खुफिया आकलनों में चीन तक संवेदनशील एफ-35 तकनीक पहुंचने की आशंका को लेकर चिंता जताई गई है।

Sep 18, 2026 - 15:52
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चीन की नजर F-35 पर! सऊदी डील से अमेरिका क्यों डरा?

दि राइजिंग न्यूज | सऊदी अरब | 18 सितंबर 2026

अमेरिका ने सऊदी अरब को एफ-35 लड़ाकू विमान देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया है। प्रस्तावित सौदे की अनुमानित कीमत करीब 24.3 अरब डॉलर है और इसमें 48 एफ-35 विमान तथा 49 इंजन शामिल हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, इस सौदे का उद्देश्य सऊदी अरब की रक्षा क्षमता को मजबूत करना और अमेरिकी तथा क्षेत्रीय सैन्य बलों के साथ उसकी सामरिक क्षमता बढ़ाना है। हालांकि, यह अभी अंतिम बिक्री नहीं है और अमेरिकी संसद को इसकी समीक्षा करनी है।

चीन तक एफ-35 की संवेदनशील तकनीक पहुंचने की आशंका

इस सौदे के साथ सबसे बड़ी चिंता एफ-35 से जुड़ी संवेदनशील सैन्य तकनीक की सुरक्षा को लेकर सामने आई है। अमेरिकी खुफिया आकलनों में आशंका जताई गई है कि सऊदी अरब में चीन की सैन्य और तकनीकी मौजूदगी के कारण एफ-35 से जुड़ी गोपनीय जानकारी तक पहुंच का जोखिम पैदा हो सकता है। इन चिंताओं का संबंध विशेष रूप से उन सैन्य ठिकानों और प्रणालियों से है जहां इन विमानों का रखरखाव और संचालन किया जाएगा।

सऊदी सैन्य ठिकानों पर चीनी पहुंच बनी चिंता

रिपोर्टों में सऊदी अरब और चीन के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग का उल्लेख किया गया है। अमेरिकी रक्षा खुफिया आकलनों में इस बात पर सवाल उठाए गए हैं कि एफ-35 से संबंधित संवेदनशील ठिकानों को बाहरी पहुंच से किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा। विशेष चिंता विमान के उन्नत रडार, निगरानी प्रणालियों और अन्य संवेदनशील तकनीकी व्यवस्थाओं को लेकर बताई गई है। अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ऐसी जगहों तक पहुंच निर्धारित अधिकारियों और अधिकृत कर्मियों तक सीमित रहे।

हुआवेई और जेडटीई की मौजूदगी पर भी सवाल

अमेरिकी खुफिया चिंताओं में सऊदी अरब के दूरसंचार ढांचे में चीनी तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा भी शामिल बताया गया है। रिपोर्टों में हुआवेई और जेडटीई जैसी चीनी कंपनियों से जुड़े उपकरणों और ढांचे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों की चिंता यह है कि संवेदनशील सैन्य सुविधाओं के आसपास मौजूद संचार ढांचा एफ-35 से जुड़ी गोपनीय प्रणालियों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से सैन्य ठिकानों के आसपास तकनीकी पहुंच को सीमित करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

सौदे में 48 विमान और 49 इंजन शामिल

अमेरिकी विदेश विभाग की अधिसूचना के मुताबिक प्रस्तावित पैकेज में 48 एफ-35 विमान और 49 एफ-135 इंजन शामिल हैं। इनमें प्रत्येक विमान के लिए एक इंजन के अलावा एक अतिरिक्त इंजन भी प्रस्तावित है। इसके साथ सुरक्षित संचार व्यवस्था, दिशा निर्धारण प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से संबंधित सहायता, कल-पुर्जे, प्रशिक्षण उपकरण, अनुकरण प्रणाली और तकनीकी सहायता भी शामिल है। पूरे पैकेज का अनुमानित मूल्य 24.3 अरब डॉलर बताया गया है।

अभी पूरी तरह अंतिम नहीं हुआ है सौदा

अमेरिका द्वारा प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि सऊदी अरब को तुरंत एफ-35 विमान मिल जाएंगे। प्रस्ताव को अमेरिकी संसद के सामने समीक्षा के लिए रखा गया है और सांसदों के पास इस प्रक्रिया में आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार है। इसलिए अंतिम समझौते, उत्पादन और विमानों की वास्तविक आपूर्ति से पहले कई प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं।

इजराइल की सैन्य बढ़त का मुद्दा भी अहम

सऊदी अरब को एफ-35 देने का मुद्दा केवल अमेरिका और सऊदी अरब के बीच रक्षा संबंधों तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में अमेरिका लंबे समय से इजराइल की सैन्य बढ़त को ध्यान में रखते हुए हथियारों की बिक्री करता रहा है। प्रस्तावित सौदे के संदर्भ में अमेरिकी पक्ष ने कहा है कि इससे क्षेत्रीय सैन्य संतुलन में बदलाव नहीं होना चाहिए, जबकि इजराइल की सैन्य बढ़त को लेकर चर्चा जारी है।

पश्चिम एशिया में सऊदी अरब के लिए बड़ा बदलाव

यदि सौदा आगे बढ़ता है और विमानों की आपूर्ति होती है तो सऊदी अरब पश्चिम एशिया में एफ-35 संचालित करने वाला इजराइल के बाद दूसरा देश बन सकता है। इससे सऊदी अरब की वायुसेना को ऐसी तकनीक मिलेगी जिसमें कम दिखाई देने की क्षमता, उन्नत सेंसर और नेटवर्क आधारित सैन्य संचालन जैसी विशेषताएं शामिल हैं। यह सौदा सऊदी अरब और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग को भी नए स्तर पर ले जा सकता है।

यूएई के मामले में भी सामने आई थीं ऐसी चिंताएं

एफ-35 को लेकर चीन से जुड़ी सुरक्षा चिंताएं अमेरिका के सामने पहले भी आ चुकी हैं। संयुक्त अरब अमीरात के साथ एफ-35 सौदे की प्रक्रिया में भी अमेरिकी पक्ष ने चीनी तकनीकी और सुरक्षा संबंधों को लेकर सवाल उठाए थे। बाद में उस सौदे की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। सऊदी अरब के मामले में भी अमेरिकी खुफिया आकलनों के कारण संवेदनशील तकनीक की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है।

सऊदी अरब और अमेरिका के पुराने रक्षा संबंध

सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिकी हथियारों का बड़ा खरीदार रहा है और दोनों देशों के बीच कई दशकों से रक्षा सहयोग चला आ रहा है। प्रस्तावित एफ-35 सौदा इसी व्यापक रक्षा साझेदारी का हिस्सा है। अमेरिकी विदेश विभाग का कहना है कि इस बिक्री से सऊदी अरब की अपने क्षेत्र और अपने क्षेत्रीय हितों की रक्षा करने की क्षमता मजबूत होगी।

अब अमेरिकी संसद की भूमिका अहम

24.3 अरब डॉलर के इस संभावित सौदे का अगला महत्वपूर्ण चरण अमेरिकी संसद की समीक्षा है। सांसद सौदे से जुड़ी सुरक्षा, तकनीकी और क्षेत्रीय चिंताओं पर विचार कर सकते हैं। एफ-35 जैसी अत्याधुनिक सैन्य तकनीक के हस्तांतरण को लेकर अमेरिकी प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि संवेदनशील जानकारी और प्रणालियों की सुरक्षा बनी रहे। अंतिम निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सऊदी अरब को इन विमानों की वास्तविक आपूर्ति किस समय और किन शर्तों पर होगी।

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