विरासत ही सच्ची श्रद्धांजलि:दयानंद गुप्त के आदर्शों को जीवित रख रहा परिवार
मुरादाबाद। पितृ पक्ष सिर्फ तर्पण, श्राद्ध और कर्मकांड तक सीमित नहीं है। यह पूर्वजों को याद करने के साथ उनके संस्कारों, आदर्शों और समाज के लिए किए गए योगदान को आगे बढ़ाने का भी मौका है। मुरादाबाद के सिविल लाइंस में रहने वाला गुप्त परिवार इस भावना को अपने जीवन में उतार रहा है। परिवार अपने पूर्वज, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी स्वर्गीय दयानंद गुप्त की विरासत को आज भी संभालकर उनके बताए रास्ते पर चल रहा है। दयानंद गुप्त का जन्म 1912 में हुआ था। उन्होंने शिक्षा और समाजसेवा को अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य बनाया। उनका मानना था कि समाज से मिली सुविधाओं और संसाधनों का इस्तेमाल सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के जरूरतमंद लोगों के लिए भी होना चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई जरूरी काम किए। बल्देव आर्य कन्या इंटर कॉलेज और दयानंद आर्य कन्या डिग्री कॉलेज समेत कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना में उनकी बड़ी भूमिका रही। इन संस्थाओं के जरिए उन्होंने बेटियों की शिक्षा और समाज में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम किया। दयानंद गुप्त का निधन 1982 में हो गया था। लेकिन उनके विचार और सामाजिक सरोकार आज भी परिवार के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। उनके बेटे उमाकांत गुप्त ने पिता से जुड़ी पुरानी यादें, पत्र और दस्तावेज संभालकर रखे हैं। वह उन संस्थाओं के संचालन में भी योगदान दे रहे हैं, जिनकी नींव उनके पिता ने समाज की सेवा के मकसद से रखी थी। उमाकांत का कहना है कि पिता की विरासत सिर्फ संपत्ति या संस्थाओं तक सीमित नहीं है। उनके विचारों और सामाजिक जिम्मेदारी को आगे बढ़ाना ही असली विरासत है। पितृ पक्ष के मौके पर उमाकांत गुप्त ने बताया कि पूर्वजों की याद में किए जाने वाले धार्मिक कर्मकांड अपनी जगह जरूरी हैं। लेकिन उनके आदर्शों को जीवन में अपनाना भी उतना ही अहम है। जरूरतमंदों की मदद करना, गरीब बच्चों की पढ़ाई में सहयोग देना और समाज के लिए कुछ करना ही पूर्वजों के प्रति सच्ची कृतज्ञता है।
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