दि राइजिंग न्यूज़ डेस्क | 17 अप्रैल 2026
सुप्रीम कोर्ट में समान नागरिक संहिता को लेकर एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता संविधान का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है और इसका किसी भी धर्म से कोई संबंध नहीं है। यह टिप्पणी उस समय आई जब मुस्लिम पर्सनल लॉ और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों से जुड़े एक मामले पर सुनवाई चल रही थी।
मुस्लिम पर्सनल लॉ और महिलाओं के अधिकारों पर बहस
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि सभी नागरिकों के लिए समान दीवानी कानून होना चाहिए, लेकिन मुस्लिम समुदाय में समान नागरिक संहिता को लेकर यह डर है कि कहीं यह "हिंदू सिविल कोड" के रूप में लागू न हो जाए।
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि समान नागरिक संहिता पूरी तरह संवैधानिक दृष्टि से जुड़ी अवधारणा है और इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।
"महिलाओं के अधिकार किसी धर्म की अनिवार्य प्रथा नहीं हो सकते"
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि महिलाओं के संपत्ति अधिकार किसी भी धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं माने जा सकते। ऐसे मामलों में संवैधानिक अधिकार सर्वोपरि होते हैं और अनुच्छेद 25 के तहत इन्हें संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट की अहम टिप्पणी: कानून बनाना संसद का काम
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत कानून नहीं बना सकती और न ही उसमें संशोधन कर सकती है। व्यक्तिगत कानूनों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से बदलना विधायी क्षेत्र में हस्तक्षेप माना जाएगा, जो संसद का अधिकार क्षेत्र है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि इस मुद्दे से प्रभावित लोगों की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए पीड़ित पक्ष को सामने आना चाहिए।
मामला आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीर और महत्वपूर्ण मानते हुए अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद निर्धारित की है। अदालत ने संकेत दिया है कि यह विषय संवैधानिक दृष्टि से बेहद अहम है और इस पर गहन विचार की आवश्यकता है।
संवैधानिक संदर्भ
समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। यही कारण है कि यह मुद्दा समय-समय पर न्यायपालिका और विधायिका दोनों के बीच चर्चा का विषय बनता रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम, 1937 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें महिलाओं के विरासत अधिकारों को लेकर भेदभाव के आरोप लगाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि ये प्रावधान संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।