आरुषि जैसी मर्डर मिस्ट्री, फांसी रद्द- सुनिये वकील को:बदायूं केस : हाईकोर्ट में ऑनर किलिंग साबित नहीं, सवाल फिर हत्याएं किसने कीं

Oct 01, 2026 - 10:47
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आरुषि जैसी मर्डर मिस्ट्री, फांसी रद्द- सुनिये वकील को:बदायूं केस : हाईकोर्ट में ऑनर किलिंग साबित नहीं, सवाल फिर हत्याएं किसने कीं
बदायूं का बहुचर्चित डबल मर्डर (ऑनर किलिंग) का मामला एक फिर सुर्खियों में है। नोएडा के आरुषि मर्डर केस की तरफ 9 साल बाद यह मर्डर मिस्ट्री चर्चा में इसलिए है क्यों कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवार के चार लोगों को हुई फांसी की सजा रद्द कर दी। साथ ही सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। 9 साल तक फांसी की सजा के बोझ तेले दब जेल में जिंगरी गुजार रहे चारों आरोपी जेल से बाहर आ गए। हाईकोर्ट के फैसले, सबूतों, जिरह, बहस, क्रास एग्जामिनेशन आदि को लेकर वकीलों के बीच खास चर्चा का दौर है। आरुषि मर्डर केस जैसी कहानी, ऑनर किलिंग के आरोप और सभी का बाइज्जत बरी हो जाना अन्य केसों पर कितना असर डालेगा, कितना नजीर बनेगा इसे लेकर मंथन है। सबसे बड़ा सवाल : फिर दोनों का मारा किसने बचाव पक्ष के वकील इलाहाबाद हाईकोर्ट के एडवोकेट आरपीएस चौहान का कहना है कि ये हत्याकांड आरुषि मर्डर केस जैसा ही है। लड़की और लड़के की लाश लड़की के घर में मिली। ऑनर किलिंग के आरोप लगे। परिवार के ही चार लोगों को फांसी हुई। अब चारों बाइज्जत बरी हो गए। अब सबसे बड़ा सवाल तो यह बनता है कि इन्होंने नहीं तो फिर दोनों को मारा किसने। दोहरा हत्याकांड किसने किया। अधिवक्ता आरपीएस चौहान करते हैं कि ट्रालय चलते चलते जांच अधिकारी ट्रांसफर हो जाते हैं। सबूत पुराने हो जाते हैं, फिर नए सिरे से जांच में उनकी गंभीरता नहीं आ पाती। बचाव पक्ष के वकील - आरबीएस चौहान बोले - ट्रायल कोर्ट ने चारों को फांसी की सज़ा सुनाई। इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपील फाइल हुई। हाईकोर्ट एविडेंस को री-एप्रिशिएट करने के बाद फांसी की सज़ा को रद्दअ करते हुए दोषमुक्त घोषित कर दिया। वो चारों जेल से छूट गए हैं। - इस केस में अहम फैक्ट्स ये थे कि एक आई-विटनेस (चश्मदीद गवाह) थी लेडीज़ जो पड़ोसी थी। उसने प्रॉसीक्यूशन केस को एग्जामिनेशन-इन-चीफ में सपोर्ट किया, लेकिन एग्जामिनेशन-इन-क्रॉस में उसने प्रॉसीक्यूशन केस को डिमॉलिश कर दिया। - जो प्रॉसीक्यूशन ऑफिसर थे, उसको री-एग्जामिनेशन कर सकते थे एविडेंस एक्ट की धारा 137 और 138 के तहत लेकिन उन्होंने उसको री-एग्जामिनेशन नहीं किया। इसका लाभ आरोपियों को मिला। - हत्याकांड में फैक्ट को सपोर्ट करते हुए आपको साबित करना होता है कि सबकुछ कैसे हुआ। बस संदेश के आधार पर कहानी सामने रखनी चाही, जबकि साक्ष्यों का जुड़ाव फेल रहा। - इन सबके बीच यह यक्ष प्रश्न अभी भी बना है कि उन दोनों को मारा किसने? आरोप साबित नहीं हुए, चारों बरी है तो अब सवाल अपनी जगह कायम है कि उन्हें किसने मारा। चारों दोषियों की फांसी की सजा रद्द, सवाल बरकरार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बदायूं के चर्चित दोहरे हत्याकांड (ऑनर किलिंग के मामले) में सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई चार अभियुक्तों की फांसी की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा और महज संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने विजयपाल, किशनलाल, रामवीर और जलधारा की अपील पर अधिवक्ता आरपीएस चौहान व पुष्पराज सिंह और सरकारी वकील को सुनकर दिया है। ​ जानिये क्या है मामला मामला बदायूं जिले के वजीरगंज थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार 14 मई 2017 की सुबह गोविंद व आशा की धारदार व भारी हथियारों से हत्या कर दी गई थी। गोविंद के पिता पप्पू ने घटना की एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि गोविंद व आशा के बीच प्रेम संबंध थे, जिससे नाराज होकर आशा के परिजनों विजयपाल, किशनलाल, रामवीर व जलधारा ने दोनों की हत्या कर दी। चारों को फांसी की सजा हुई थी ट्रायल कोर्ट ने सितंबर 2022 में चारों अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाया था। इस फैसले के खिलाफ अभियुक्तों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। अभियोजन पक्ष की मुख्य चश्मदीद गवाह रेशमा अदालत में अपने बयान से पूरी तरह मुकर गई थी। उसने कहा कि उसने घटना देखी ही नहीं। इसके अलावा घटना के करीब दो महीने बाद उसका बयान दर्ज करने का भी कोई ठोस कारण पुलिस नहीं दे सकी। घटना सुबह के वक्त घनी आबादी वाले इलाके में हुई लेकिन जांच अधिकारी ने घटनास्थल के अगल-बगल रहने वाले किसी भी पड़ोसी के बयान दर्ज नहीं किए। साथ ही हत्या में प्रयुक्त हथियारों की जब्ती मेमो के स्वतंत्र गवाहों को अदालत में परीक्षित नहीं कराया गया। इसके अलावा वादी मुकदमा (पिता) और जांच अधिकारी के बयानों में हथियारों की बरामदगी को लेकर गंभीर विरोधाभास पाए गए। कोर्ट में फेल हुए साक्ष्य कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पुलिस मौके पर पहुंची तो घर खुला हुआ था और अभियुक्त वहां मौजूद नहीं थे। मृतक आशा का शव बाहर सड़क पर था, जबकि गोविंद का शव घर के भीतर। अभियोजन यह समझाने में असफल रहा कि अभियुक्तों ने ही हत्या की थी तो केवल एक शव बाहर फेंककर दूसरा अंदर क्यों छोड़ दिया। ​हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन की कहानी केवल संदेह पर टिकी है, जो कानूनी रूप से साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकती। खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फांसी के आदेश और रेफरेंस को खारिज कर दिया तथा किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर सभी चारों आरोपियों विजयपाल, किशनलाल, रामवीर और जलधारा को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

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