बिना जुर्म 6 साल जेल में रखने पर सुप्रीम-कोर्ट सख्त:यूपी सरकार को आगरा के युवक को 6 लाख क्षतिपूर्ति देने के आदेश

Oct 27, 2026 - 14:20
0
बिना जुर्म 6 साल जेल में रखने पर सुप्रीम-कोर्ट सख्त:यूपी सरकार को आगरा के युवक को 6 लाख क्षतिपूर्ति देने के आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण और हत्या के एक मामले में जांच में गंभीर लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए छह साल विचाराधीन कैदी की तरह जेल काटने वाले बाद में बरी हो गए व्यक्ति को छह लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने का उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है। प्रदेश सरकार को एक महीने के भीतर यह रकम देनी होगी और ऐसा नहीं होने पर 18 प्रतिशत की दर से ब्याज भी देना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी को छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहना पड़ा जबकि उसके खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य ही नहीं थे। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को अपने अधिकारियों को जांच की सही प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करने की सलाह दी है। ये आदेश न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने आगरा जिले के अछनेरा थाने के 2019 में दर्ज अपहरण और हत्या के एक मामले में दिए। याचिकाकर्ता अरुण उर्फ दीपक 14 नवंबर 2019 से जेल में बंद था। सुप्रीम कोर्ट दिया था तीन महीने में सुनवाई पूरी करने का निर्देश 23 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट को तीन महीने में मामले की सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सुनवाई पूरी हुई और आरोपी बरी हो गया। उस फैसले को देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि आरोपी का नाम न तो शुरुआती एफआईआर में था और न ही पुलिस के समक्ष दर्ज बयान में। उसे सीसीटीवी फुटेज और सहआरोपी के कथित इकबालिया बयान के आधार पर आरोपी बनाया गया था। फैसले में कहा गया है कि पुलिस ने घटनास्थल के पास से जली हुई हड्डियां बरामद करने का दावा किया, लेकिन यह साबित नहीं किया जा सका कि हड्डियां लापता (जिसके अपहरण और हत्या का आरोप था) व्यक्ति की थीं। डीएनए मिलान के नतीजे भी केस में पेश नहीं किये गए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल फोन के कॉल डिटेल रिकॉर्ड को कानून के मुताबिक प्रमाणित नहीं किया गया। कथित फिरौती की मांग की सूचना भी पुलिस को नहीं दी गई थी। पेट्रोल खरीदने, शव जलाने और बरामद वस्तुओं को आरोपियों द्वारा छिपाए जाने के दावों के समर्थन में भी पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सतही जांच और अव्यवस्थित अभियोजन के कारण एक व्यक्ति के जीवन के छह वर्ष नष्ट हो गए। कोर्ट ने फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को भेजने के निर्देश दिये हैं। ताकि पुलिस अधिकारियों को जांच की सही प्रक्रिया के प्रति प्रशिक्षित किया जा सके। पीठ ने कहा कि यह मामला उस व्यक्ति को क्षतिपूर्ति देने की मांग करता है, जो न्याय व्यवस्था की खामियों का शिकार बना।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User