सोने की बढ़ती चमक से बदल रहा वैश्विक वित्तीय संतुलन

दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर सोने की खरीदारी की है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार अब केंद्रीय बैंकों के पास अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से अधिक सोना मौजूद है। विशेषज्ञ इसे डॉलर पर निर्भरता कम होने और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़े बदलाव का संकेत मान रहे हैं।

सोने की बढ़ती चमक से बदल रहा वैश्विक वित्तीय संतुलन

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 15 जून 2026

केंद्रीय बैंकों का बढ़ा सोने पर भरोसा

दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक लगातार अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि कर रहे हैं और अब स्थिति ऐसी हो गई है कि उनके पास अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की तुलना में अधिक सोना मौजूद है। एक अंतरराष्ट्रीय निवेश रिपोर्ट में यह दावा किया गया है, जिसे वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। यह केवल निवेश का रुझान नहीं बल्कि डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था पर बढ़ती चिंताओं का परिणाम है। कई देश अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अधिक सुरक्षित और विविध बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर बढ़ी चिंताएं

रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका पर बढ़ता कर्ज और उसकी वित्तीय स्थिति को लेकर निवेशकों की चिंता लगातार बढ़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका का वार्षिक शुद्ध ब्याज भुगतान एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक पहुंच चुका है, जो संघीय सरकार की कुल आय का बड़ा हिस्सा है। सरकारी योजनाओं और ब्याज भुगतान पर होने वाला खर्च अमेरिकी राजस्व का अधिकांश भाग खा रहा है। ऐसे में वैश्विक निवेशकों और केंद्रीय बैंकों के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि लंबे समय में अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर की मजबूती पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

सोना बन रहा सुरक्षित विकल्प

आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और प्रतिबंधों के बढ़ते जोखिम के बीच सोना फिर से सबसे भरोसेमंद संपत्ति के रूप में उभर रहा है। केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने के लिए सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं। सोना किसी भी सरकार या मुद्रा पर निर्भर नहीं होता, इसलिए संकट के समय यह सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। यही कारण है कि कई देशों ने पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड मात्रा में सोने की खरीदारी की है।

अमेरिकी ट्रेजरी में विदेशी निवेश घटा

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विदेशी निवेशकों की अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में रुचि कम होती दिखाई दे रही है। हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी में उल्लेखनीय कमी की है। यह गिरावट इस बात का संकेत मानी जा रही है कि कई देश और संस्थान अब अपने निवेश को केवल डॉलर आधारित परिसंपत्तियों तक सीमित नहीं रखना चाहते।

दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण भंडार वाले देश

विश्व गोल्ड परिषद और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के ताजा आंकड़ों के अनुसार अमेरिका अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार रखने वाला देश बना हुआ है। उसके पास आठ हजार टन से अधिक सोना मौजूद है। इसके बाद जर्मनी, इटली और फ्रांस का स्थान आता है। रूस और चीन ने भी हाल के वर्षों में तेजी से अपने स्वर्ण भंडार को बढ़ाया है और दोनों देशों के पास दो हजार तीन सौ टन से अधिक सोना मौजूद है। भारत भी दुनिया के प्रमुख स्वर्ण भंडार वाले देशों में शामिल है। भारत के पास लगभग आठ सौ अस्सी टन सोना है, जो उसके कुल विदेशी मुद्रा भंडार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

उभरते देशों की रणनीति में बदलाव

 उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब अपनी वित्तीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सोने पर अधिक भरोसा कर रही हैं। डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और वैश्विक आर्थिक झटकों से बचाव के लिए सोने को एक प्रभावी विकल्प माना जा रहा है। कई देशों ने पिछले वर्षों में अपने रिजर्व पोर्टफोलियो का पुनर्गठन किया है और उसमें सोने का हिस्सा बढ़ाया है। यह रणनीति आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सकती है।

वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन

आर्थिक जानकारों का कहना है कि केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की बढ़ती खरीद केवल एक अस्थायी प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में गहरे बदलाव का संकेत है। हालांकि डॉलर अभी भी दुनिया की प्रमुख आरक्षित मुद्रा बना हुआ है, लेकिन मूल्य संरक्षण के साधन के रूप में सोने की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।  यदि यही रुझान जारी रहता है तो आने वाले वर्षों में वैश्विक रिजर्व प्रबंधन की रणनीतियों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों, मुद्रा विनिमय दरों और वैश्विक निवेश प्रवाह पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।