हाईकोर्ट में मामला लंबित और निचली अदालत ने दी जमानत:कोर्ट ने नाराजगी जताई, कहा यह चिंताजनक और गंभीर, मांगा जवाब

Sep 29, 2026 - 17:42
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हाईकोर्ट में मामला लंबित और निचली अदालत ने दी जमानत:कोर्ट ने नाराजगी जताई, कहा यह चिंताजनक और गंभीर, मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत प्रार्थना-पत्र लंबित होने के बावजूद विचारण न्यायालय द्वारा उसी अभियुक्त को जमानत दे दी गई। मामले पर हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाते हुए संबंधित पीठासीन अधिकारी से विस्तृत स्पष्टीकरण तलब किया है। साथ ही जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रयागराज से भी पूरे प्रकरण पर रिपोर्ट मांगी है। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति समित गोपाल ने क्रिमिनल मिस. बेल एप्लीकेशन संख्या 35295/2025, नन्हे निषाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में पारित किया। मामले में अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता तथा प्रथम सूचनाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष कुमार श्रीवास्तव उपस्थित हुए और न्यायालय ने पक्षकारों को सुनने के बाद अभिलेखों का अवलोकन किया। कोर्ट ने सीमित अंतरिम जमानत दी थी मामले की विशेषता यह है कि हाईकोर्ट ने इससे पूर्व 20 मई 2026 को अभियुक्त नन्हे निषाद को चार माह की सीमित अवधि के लिए अंतरिम जमानत प्रदान की थी। आदेश में स्पष्ट निर्देश था कि चार माह की अवधि समाप्त होने पर अभियुक्त संबंधित न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करेगा। इसके साथ ही मूल जमानत प्रार्थना-पत्र हाईकोर्ट के समक्ष लंबित रखा गया था। सरेंडर किया और मिल गई जमानत अंतरिम जमानत की अवधि समाप्त होने से पूर्व अभियुक्त 18 सितंबर 2026 को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या 16, प्रयागराज के समक्ष उपस्थित हुआ और आत्मसमर्पण का प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया। न्यायालय ने उसे अभिरक्षा में लिया। इसके पश्चात उसी दिन अभियुक्त की ओर से जमानत प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसे उसी न्यायालय ने स्वीकार करते हुए अभियुक्त को पुनः जमानत पर रिहा कर दिया। इसके आधार पर हाईकोर्ट में यह तर्क दिया गया कि अभियुक्त को अधीनस्थ न्यायालय से जमानत मिल चुकी है, अतः हाईकोर्ट में लंबित जमानत प्रार्थना-पत्र निष्प्रभावी हो गया है। अधिकार-क्षेत्र का गंभीर प्रश्न इसी बिंदु पर प्रथम सूचनाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष कुमार श्रीवास्तव ने अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाही पर गंभीर विधिक आपत्ति दर्ज कराई। हाईकोर्ट के आदेश में दर्ज है कि प्रथम सूचनाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब अभियुक्त का जमानत प्रार्थना-पत्र स्वयं हाईकोर्ट के समक्ष लंबित था और चार माह की अंतरिम जमानत भी हाईकोर्ट के विशिष्ट आदेश से प्रदान की गई थी, तब विचारण न्यायालय द्वारा उसी अभियुक्त की जमानत अर्जी पर विचार कर उसे जमानत प्रदान करना उसके अधिकार-क्षेत्र से आगे बढ़कर किया गया कृत्य है। यह भी इंगित किया गया कि 18 सितंबर 2026 के आदेश में अधीनस्थ न्यायालय ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार तक नहीं किया कि अभियुक्त की जमानत अर्जी हाईकोर्ट में अभी लंबित है अथवा उसका निस्तारण हो चुका है। उसी आदेश में पहले अभियुक्त का आत्मसमर्पण स्वीकार कर उसे अभिरक्षा में लिया गया और तत्पश्चात उसे जमानत भी प्रदान कर दी गई। हाईकोर्ट ने कहा अत्यंत चिंताजनक और गंभीर प्रथम सूचनाकर्ता की ओर से उठाई गई आपत्ति तथा न्यायालय के समक्ष उपलब्ध अभिलेखों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने परिस्थितियों को अत्यंत गंभीरता से लिया। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभिलेखों से सामने आई वर्तमान स्थिति “अत्यंत चिंताजनक और गंभीर” है। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से यह तथ्य दर्ज किया कि संबंधित अपर सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को जमानत देते समय अपने आदेश में यह तक उल्लेख नहीं किया कि हाईकोर्ट के समक्ष अभियुक्त का जमानत प्रार्थना-पत्र लंबित है, उसका निस्तारण हो चुका है अथवा उस पर कोई निर्णय दिया जा चुका है। इसके बावजूद उसी आदेश के माध्यम से आत्मसमर्पण स्वीकार करते हुए अभियुक्त को जमानत प्रदान कर दी गई। अपर सत्र न्यायाधीश से चार दिन में विस्तृत स्पष्टीकरण मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी अपर सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या 16 प्रयागराज से आदेश में उल्लिखित परिस्थितियों के संबंध में चार दिन के भीतर विस्तृत स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश/प्रभारी जिला एवं सत्र न्यायाधीश, प्रयागराज को भी निर्देशित किया कि वे पूरे घटनाक्रम के संबंध में अपनी रिपोर्ट चार दिन के भीतर हाईकोर्ट को भेजें। कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्रार (अनुपालन) को हाईकोर्ट का आदेश संबंधित अपर सत्र न्यायाधीश तथा जिला एवं सत्र न्यायाधीश तक 24 घंटे के भीतर पहुंचाने का निर्देश दिया गया। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है। न्यायिक अनुशासन और अधिकार-क्षेत्र पर प्रश्न यह मामला केवल एक अभियुक्त की जमानत तक सीमित न रहकर न्यायिक अनुशासन, न्यायालयों के पदानुक्रम तथा अधीनस्थ न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न सामने लाता है। विशेष रूप से विचारणीय प्रश्न यह है कि जब किसी अभियुक्त का मूल जमानत प्रार्थना-पत्र हाईकोर्ट के समक्ष लंबित हो और हाईकोर्ट ने स्वयं उसे केवल निश्चित अवधि के लिए अंतरिम जमानत देकर अवधि समाप्त होने पर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया हो, तब क्या अधीनस्थ न्यायालय उस आत्मसमर्पण के तुरंत बाद उसी अभियुक्त की नई जमानत अर्जी स्वीकार कर उसे नियमित जमानत प्रदान कर सकता है? प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अधिकार-क्षेत्र और न्यायिक अनुशासन से संबंधित इस प्रश्न को प्रथम सूचनाकर्ता के अधिवक्ता श्री आशीष कुमार श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट के समक्ष विशेष रूप से उठाया, जिसके बाद हाईकोर्ट ने परिस्थितियों का संज्ञान लेते हुए संबंधित जिला न्यायाधीश से रिपोर्ट तलब की हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हाईकोर्ट ने 25 सितंबर के इस आदेश में संबंधित न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध किसी प्रकार के न्यायिक कदाचार अथवा अनुशासनहीनता का अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं दिया है। न्यायालय ने फिलहाल सामने आए तथ्यों को गंभीर और चिंताजनक मानते हुए स्पष्टीकरण तथा रिपोर्ट मांगी है। आगे की न्यायिक स्थिति संबंधित अधिकारी के स्पष्टीकरण, जिला न्यायाधीश की रिपोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा उनकी समीक्षा के बाद स्पष्ट होगी। इसके बावजूद, यह आदेश अधीनस्थ न्यायपालिका और उच्च न्यायालय के मध्य न्यायिक अनुशासन, जमानत संबंधी अधिकार-क्षेत्र तथा उच्च न्यायालय के लंबित आदेशों और कार्यवाहियों के प्रति संस्थागत मर्यादा के प्रश्न पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम के रूप में देखा जा सकता है।

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