'जल संकट का हल सिर्फ सरकारी योजनाओं से नहीं':RSS प्रचार प्रमुख बोले- समाज की सोच और जीवनशैली में बदलाव जरूरी
जल संकट का समाधान सिर्फ सरकारी योजनाओं और तकनीकी उपायों से नहीं हो सकता। इसके लिए समाज की सोच, संस्कार और जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। पानी को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का आधार मानकर इसके संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने कही रविवार को भागीदारी भवन में राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के विशेषांक ‘जल है तो कल है’ के विमोचन समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जल संकट प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा है। मनुष्य सृष्टि का स्वामी नहीं, बल्कि उसका हिस्सा है। इसलिए विकास के साथ पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदियों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा। जखनी और हिवरे बाजार से सीखने की जरूरत आम्बेकर ने बुंदेलखंड के जखनी और महाराष्ट्र के हिवरे बाजार का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों की भागीदारी और लगातार प्रयासों से जल संकट का समाधान संभव है। युवाओं को अपने क्षेत्रों में ऐसे प्रयास शुरू कर सफल मॉडलों को दूसरे गांवों तक पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पानी किसी एक राज्य या वर्ग का विषय नहीं, बल्कि पूरे देश की जिम्मेदारी है। शहरों की योजना बनाते समय बारिश, आबादी, पानी की उपलब्धता और प्राकृतिक संसाधनों की क्षमता का ध्यान रखना होगा। अनियोजित शहरीकरण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जल संकट बढ़ रहा है। सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता संरक्षण कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने की। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण का काम केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। समाज को आगे आकर पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करना होगा। पद्मश्री डॉ. पोपटराव पवार ने हिवरे बाजार का उदाहरण देते हुए बताया कि जल प्रबंधन, फसल नियोजन और सामुदायिक अनुशासन से सूखे की समस्या कम की जा सकती है। उन्होंने ग्राम पंचायत स्तर पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जल संरक्षण योजना बनाने और ग्रामसभा की भागीदारी से उसे लागू करने पर जोर दिया।
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