लोकतंत्र और न्याय के लिए सांस्कृतिक आंदोलन पर सेमिनार:लखनऊ में जसम के 41वें स्थापना दिवस पर आयोजन, लोकतंत्र के हक में चर्चा
लखनऊ के हजरतगंज स्थित प्रेस क्लब में रविवार कों जन संस्कृति मंच (जसम) का 41वां स्थापना दिवस मनाया गया। इस मौके पर ‘न्याय और लोकतंत्र के हक में सांस्कृतिक आंदोलन’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। लोकतंत्र, संविधान और न्याय व्यवस्था के सामने मौजूदा चुनौतियों के बीच सांस्कृतिक आंदोलन को मजबूत करने पर विशेष चर्चा हुईं। कार्यक्रम की अध्यक्षता जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, कवि और लेखक कौशल किशोर ने की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में लोक प्रमुख होता है, लेकिन आज उसके अधिकारों पर संकट है। बुलडोजर न्याय का प्रतीक बन गया है। नागरिक अधिकार और बौद्धिक गतिविधियां मौजूदा सत्ता को पसंद नहीं हैं। उन्होंने कहा कि दमन है तो प्रतिरोध भी है। अपने वक्तव्य का समापन उन्होंने ब्रेख्त की पंक्तियों से किया- जुल्मतों के दौर में क्या गीत गाए जाएंगे, हां, जुल्मतों के बारे में भी गीत गाए जाएंगे। 'डर और विभाजन का माहौल' मुख्य अतिथि जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज कुमार सिंह ने कहा कि युवा उभार ने सत्ता का वास्तविक चेहरा सामने ला दिया है। डर और विभाजन का माहौल बदल रहा है। महिलाएं, आदिवासी, मजदूर-किसान और बुद्धिजीवी संघर्ष के मैदान में हैं। न्याय और लोकतंत्र के लिए संघर्ष तेज हुआ है। उन्होंने प्रगतिशील और जनवादी संस्कृति कर्मियों की एकता को और मजबूत करने की जरूरत बताई। इप्टा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा ने कहा कि आंदोलन तेज होने पर संस्कृति कर्म को नई ऊर्जा मिलती है। लखनऊ की इसमें ऐतिहासिक भूमिका है। उन्होंने कहा कि ऐसा रंगमंच चाहिए, जो सच के साथ खड़ा हो। संस्कृति को प्रतिरोध का माध्यम बनाना होगा। 'लोकतंत्र की अवधारणा कमजोर हो रही है' जलेस के युवा आलोचक डॉ. विभु प्रकाश सिंह ने कहा कि पूंजी के बढ़ते प्रभाव से न्याय और लोकतंत्र की अवधारणा कमजोर हो रही है। प्रगतिशील शक्तियों को एक मंच पर आकर संघर्ष करना होगा।वरिष्ठ साहित्यकार शकील सिद्दीकी ने 1936 में प्रेमचंद की अध्यक्षता में शुरू हुए प्रगतिशील आंदोलन का उल्लेख किया। उन्होंने लखनऊ से अयोध्या तक निकले सांस्कृतिक मार्च की भी चर्चा की। संचालन जसम लखनऊ की सचिव फरजाना मेहंदी ने किया।
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