महाराष्ट्र का 74% हिस्सा सूखे की चपेट में, कमजोर मानसून ने कैसे खड़ा किया 25 साल का सबसे बड़ा संकट

महाराष्ट्र सरकार ने बारिश की कमी और सूखा संबंधी मानकों के आधार पर 358 में से 265 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। राज्य के लगभग 74 प्रतिशत हिस्से में सूखे की स्थिति बताई गई है। मराठवाड़ा, विदर्भ और अन्य कृषि क्षेत्रों में फसल, पेयजल और पशु चारे पर इसका असर पड़ा है। सरकार ने ऋण पुनर्गठन, बिजली बिल में रियायत, भू-राजस्व राहत, पानी और रोजगार सहित 12 उपायों की घोषणा की है।

Sep 28, 2026 - 12:44
0
महाराष्ट्र का 74% हिस्सा सूखे की चपेट में, कमजोर मानसून ने कैसे खड़ा किया 25 साल का सबसे बड़ा संकट

दि राइजिंग न्यूज़ | महाराष्ट्र | 28 सितंबर 2026

महाराष्ट्र में इस साल मानसून की बेरुखी ने खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। राज्य सरकार ने 358 में से 265 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। यह राज्य के लगभग 74 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित करता है। सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए राहत उपाय लागू करने की घोषणा की है।

महाराष्ट्र में क्यों गहराया सूखे का संकट

महाराष्ट्र में जून से सितंबर 2026 के दौरान सामान्य से काफी कम बारिश हुई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में बारिश की कमी लगभग 18.8 प्रतिशत रही है। कई इलाकों में बारिश के बीच लंबे अंतराल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया, जिससे वर्षा पर निर्भर खेती वाले क्षेत्रों में फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिल सका।

265 तहसीलों को घोषित किया गया सूखाग्रस्त

महाराष्ट्र सरकार ने 26 सितंबर को राज्य की 358 तहसीलों में से 265 तहसीलों में सूखे की स्थिति घोषित की। यह निर्णय सूखा प्रबंधन व्यवस्था के पहले चरण के मानकों के आधार पर लिया गया है। इन क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश की कमी और अन्य सूखा संकेतकों को ध्यान में रखा गया है।

मराठवाड़ा और विदर्भ पर ज्यादा असर

सूखे का प्रभाव महाराष्ट्र के कई कृषि प्रधान क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। मराठवाड़ा, विदर्भ, उत्तर महाराष्ट्र और पश्चिमी महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बारिश की कमी से खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचा है। सोयाबीन, कपास, अरहर और अन्य फसलों पर इसका सीधा असर पड़ा है, जिससे किसानों की आमदनी प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

सोलापुर सहित कई जिलों में बारिश की भारी कमी

महाराष्ट्र के कुछ जिलों में सामान्य बारिश की तुलना में बहुत बड़ी कमी दर्ज की गई है। भारतीय मौसम संबंधी आंकड़ों के अनुसार सोलापुर में सितंबर के अंतिम सप्ताह तक मौसमी बारिश में लगभग 57 प्रतिशत की कमी बताई गई थी। अहिल्यानगर में भी लगभग 42 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई, जिससे जल और कृषि संकट बढ़ा है।

लंबे सूखे अंतराल ने बढ़ाई किसानों की परेशानी

सिर्फ कुल बारिश में कमी ही समस्या नहीं है, बल्कि बारिश के बीच लंबे सूखे अंतराल ने भी फसलों को नुकसान पहुंचाया। कई क्षेत्रों में लगातार कई सप्ताह तक पर्याप्त वर्षा नहीं हुई। ऐसे क्षेत्रों में किसान बारिश आधारित खेती पर निर्भर हैं, इसलिए लंबे अंतराल के कारण फसलों की वृद्धि प्रभावित हुई और खेतों में नमी बनाए रखना मुश्किल हो गया।

पानी और चारे का भी संकट

बारिश की कमी का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में पेयजल और पशुओं के लिए चारे की समस्या भी सामने आ रही है। महाराष्ट्र सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में पानी के टैंकर और पशुओं के लिए चारे जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं को राहत योजना में शामिल किया है।

सरकार ने घोषित किए 12 राहत उपाय

राज्य सरकार ने सूखाग्रस्त तहसीलों के लिए 12 राहत उपायों की घोषणा की है। इनमें फसल ऋण के पुनर्गठन, कृषि ऋण की वसूली को टालने, भू-राजस्व में रियायत और कृषि पंपों के बिजली बिल में राहत जैसे कदम शामिल हैं। प्रभावित ग्रामीण परिवारों और किसानों को राहत पहुंचाने के लिए प्रशासन को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

फसल नुकसान का कराया जाएगा आकलन

सरकार ने प्रभावित तहसीलों में फसल नुकसान का जमीनी स्तर पर आकलन शुरू करने के निर्देश दिए हैं। जिला प्रशासन को खेतों की स्थिति का सर्वेक्षण करने और नुकसान का विवरण तैयार करने को कहा गया है। वास्तविक फसल क्षति के आकलन के बाद किसानों को वित्तीय सहायता देने के संबंध में अलग निर्णय लिया जाएगा।

किसानों के कर्ज और बिजली बिल पर राहत

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों के फसल ऋण के पुनर्गठन की व्यवस्था की गई है। कृषि से जुड़े ऋणों की वसूली को आगे बढ़ाने और भू-राजस्व में राहत देने के उपाय भी घोषित किए गए हैं। कृषि पंपों के बिजली बिल में रियायत का प्रावधान भी राहत पैकेज का हिस्सा है।

रोजगार और शिक्षा से जुड़े उपाय

सूखा प्रभावित ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने पर भी सरकार ने जोर दिया है। ग्रामीण रोजगार गारंटी से जुड़े कामों को बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। प्रभावित किसानों और परिवारों के बच्चों की शिक्षा से जुड़े शुल्क में राहत देने की घोषणा भी राहत उपायों में शामिल है।

1972 के सूखे से हो रही तुलना

महाराष्ट्र में मौजूदा संकट की गंभीरता को समझाने के लिए इसकी तुलना 1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी की जा रही है। हालांकि दोनों परिस्थितियों के कारण और सामाजिक-आर्थिक संदर्भ अलग हैं, लेकिन इस वर्ष बड़ी संख्या में तहसीलों में सूखे की घोषणा ने ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बढ़ा दी है। सरकार और प्रशासन के सामने आने वाले महीनों में पानी, चारा और कृषि सहायता की व्यवस्था बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।

सूखे के बीच राजनीतिक विवाद भी तेज

सूखे की घोषणा के बाद राहत और जल प्रबंधन को लेकर राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई है। विपक्षी नेताओं ने सरकार से किसानों को तत्काल और पर्याप्त सहायता देने की मांग की है। कुछ नेताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि जल संकट के समय राज्य के सीमित जल संसाधनों का इस्तेमाल किस प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। ये विपक्षी दलों के राजनीतिक दावे हैं, जिन्हें सरकार के आधिकारिक रुख से अलग समझना चाहिए।

अगले कुछ महीने महाराष्ट्र के लिए अहम

महाराष्ट्र के लिए अब मानसून की वापसी के बाद उपलब्ध जल संसाधनों की स्थिति महत्वपूर्ण होगी। कम बारिश के कारण मिट्टी की नमी, जल स्रोतों और कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों और अधिकारियों के आकलन के अनुसार, यदि पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो ग्रामीण क्षेत्रों में पानी, चारा और कृषि आय से जुड़ी समस्याएं आगे भी बनी रह सकती हैं।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User