कीटनाशक के जहर से खतरे में किसानों की जिंदगी
देश में प्रतिबंधित और अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों के उपयोग को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। कई राज्यों में किसानों की मौत, गंभीर बीमारियों और स्वास्थ्य संकट के मामलों के बीच पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे रसायनों पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग तेज हो गई है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 10 जून 2026
देश में खतरनाक और प्रतिबंधित कीटनाशकों के उपयोग को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। विभिन्न राज्यों से सामने आए आंकड़ों और घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसे रसायनों के इस्तेमाल पर अब तक प्रभावी रोक क्यों नहीं लगाई गई। किसानों और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कई जहरीले रसायन खेती के साथ-साथ किसानों के जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बन चुके हैं।
दो वर्षों में सैकड़ों किसानों की मौत
राजस्थान विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दो वर्षों में कीटनाशकों के प्रभाव से 535 किसानों की मौत दर्ज की गई है। यह आंकड़ा कृषि क्षेत्र में रसायनों के बढ़ते खतरे की ओर इशारा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक राज्य की स्थिति है जबकि देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे मामले लगातार सामने आते रहे हैं।
पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर बढ़ा विवाद
पैराक्वाट डाइक्लोराइड को दुनिया के सबसे खतरनाक खरपतवारनाशक रसायनों में गिना जाता है। यह रसायन मानव शरीर के लिए अत्यधिक विषैला माना जाता है और इसका कोई प्रभावी विषनाशक उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद भारत में इसका उपयोग जारी है। दुनिया के 74 से अधिक देशों ने इस रसायन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इनमें फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, चीन, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देश शामिल हैं। इसके बावजूद भारतीय कृषि में इसका इस्तेमाल जारी रहने पर सवाल उठ रहे हैं।
कई राज्यों ने लगाई अस्थायी रोक
आंध्र प्रदेश सरकार ने हाल ही में पैराक्वाट डाइक्लोराइड के उपयोग पर 60 दिनों की रोक लगाई है। इससे पहले तेलंगाना, ओडिशा और केरल भी इस रसायन पर अस्थायी प्रतिबंध लगा चुके हैं। किसान संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि अब केंद्र सरकार को पूरे देश में स्थायी प्रतिबंध लगाने पर विचार करना चाहिए।
किसान संगठनों ने उठाई मांग
किसान महापंचायत सहित कई किसान संगठनों ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है। उनका कहना है कि खेती का उद्देश्य लोगों को सुरक्षित और स्वस्थ भोजन उपलब्ध कराना है, न कि ऐसे रसायनों का उपयोग करना जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाएं। संगठनों के अनुसार इस रसायन के संपर्क में आने से फेफड़े, गुर्दे और यकृत को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। लंबे समय तक संपर्क रहने पर तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
मानव स्वास्थ्य पर गंभीर असर
पैराक्वाट शरीर में पहुंचने के बाद कोशिकाओं को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर देता है। यह रसायन फेफड़ों, गुर्दों और यकृत को तेजी से नुकसान पहुंचाता है। कई मामलों में पीड़ित को बचाना बेहद कठिन हो जाता है क्योंकि इसका कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है। चिकित्सकों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में मरीजों को दी जाने वाली ऑक्सीजन भी पैराक्वाट विषाक्तता के मामलों में नुकसान बढ़ा सकती है। यही कारण है कि इसे अत्यंत घातक रसायन माना जाता है।
कानूनी लड़ाई अब भी जारी
देश में खतरनाक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही है। सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका लंबित है जिसमें पैराक्वाट डाइक्लोराइड सहित 99 खतरनाक कीटनाशकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। विशेषज्ञ समिति और कई कृषि वैज्ञानिक भी सरकार को इस रसायन पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने की सिफारिश कर चुके हैं। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
किसानों तक नहीं पहुंची सुरक्षा जानकारी
कीटनाशक बनाने वाली कंपनियां अपने उत्पादों की बिक्री से भारी मुनाफा कमाती हैं लेकिन सुरक्षित उपयोग को लेकर किसानों के बीच पर्याप्त जागरूकता अभियान नहीं चलाए जाते। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश किसान बिना सुरक्षात्मक पोशाक, दस्ताने और मास्क के इन रसायनों का छिड़काव करते हैं। इससे उनके शरीर पर सीधा दुष्प्रभाव पड़ता है और कई बार जान तक चली जाती है।
खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण पर भी असर
खतरनाक रसायनों का अत्यधिक उपयोग केवल किसानों को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि इसका असर खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण पर भी पड़ता है। रसायनों के अवशेष मिट्टी, जल स्रोतों और खाद्य पदार्थों में पहुंचकर लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
बढ़ रही है स्थायी प्रतिबंध की मांग
किसान संगठनों, पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है। देशभर में अब ऐसे जहरीले कीटनाशकों पर स्थायी प्रतिबंध लगाने और किसानों को सुरक्षित खेती के लिए प्रशिक्षित करने की मांग तेज होती जा रही है।