चीनी की बढ़ती मांग से बढ़ी चिंता

देश में गन्ने का रकबा लगभग स्थिर रहने के बावजूद चीनी की खपत लगातार बढ़ रही है। उत्पादन और मांग के बीच बढ़ते अंतर तथा घटते भंडार को देखते हुए सरकार निर्यात और इथेनॉल के लिए चीनी उपयोग पर सख्त निगरानी रख सकती है।

चीनी की बढ़ती मांग से बढ़ी चिंता

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 10 जून 2026

चीनी की बढ़ती मांग से बढ़ी चिंता

देश में वर्ष 2026-27 के लिए गन्ने की बुवाई लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। शुरुआती आंकड़ों से संकेत मिल रहे हैं कि इस बार भी गन्ने का कुल रकबा पिछले वर्ष के आसपास ही रहने वाला है। हालांकि चीनी की बढ़ती खपत और लगातार घटते समापन भंडार ने सरकार और उद्योग जगत की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्पादन और खपत के मौजूदा रुझान जारी रहे तो आने वाले समय में सरकार को निर्यात और इथेनॉल के लिए चीनी उपयोग पर कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।

गन्ने का रकबा लगभग स्थिर

जून के पहले सप्ताह तक देश में लगभग 54.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की बुवाई हो चुकी है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि के लगभग बराबर है। अनुमान है कि पूरे सीजन में गन्ने का कुल रकबा करीब 58.5 लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकता है।  वर्तमान स्थिति को देखते हुए उत्पादन क्षमता में किसी बड़े विस्तार की संभावना नहीं दिखाई दे रही है। इसका अर्थ है कि आने वाले सीजन में चीनी उत्पादन में बहुत बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती।

उत्तर प्रदेश बना हुआ है सबसे बड़ा उत्पादक

देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में इस बार भी लगभग 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होने का अनुमान है। यहां रकबे में कोई विशेष बदलाव नहीं देखा गया है। महाराष्ट्र में गन्ने का क्षेत्रफल बढ़कर लगभग 11.8 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जबकि कर्नाटक में मामूली गिरावट दर्ज की गई है और वहां गन्ने की बुवाई करीब 4.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है। कुल मिलाकर प्रमुख उत्पादक राज्यों से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है जिससे उत्पादन में बड़ी छलांग की उम्मीद की जा सके।

बढ़ती खपत बनी बड़ी चुनौती

चीनी उद्योग की सबसे बड़ी चिंता बढ़ती मांग और सीमित उत्पादन क्षमता को लेकर है। केंद्र सरकार ने चालू सीजन के शुरुआती छह महीनों में घरेलू बाजार के लिए 133 लाख टन चीनी उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया था। हालांकि मिलों से निकासी के आंकड़े बताते हैं कि वास्तविक खपत अनुमान से अधिक रही है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे सीजन में देश की कुल चीनी खपत 285 से 290 लाख टन तक पहुंच सकती है।

उत्पादन रह सकता है कम

दूसरी ओर वर्ष 2025-26 के दौरान देश का शुद्ध चीनी उत्पादन 280 लाख टन से कम रहने की संभावना जताई जा रही है। यदि यही स्थिति बनी रहती है तो मांग और उत्पादन के बीच का अंतर और बढ़ सकता है। लगातार बढ़ती खपत के सामने उत्पादन की रफ्तार पर्याप्त नहीं दिख रही है, जिससे आने वाले समय में आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।

समापन भंडार में बड़ी गिरावट की आशंका

उद्योग से जुड़े आकलनों के अनुसार यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो अगले सीजन की शुरुआत कम भंडार के साथ हो सकती है। अनुमान है कि 30 सितंबर तक देश का समापन भंडार घटकर लगभग 35 से 39 लाख टन तक रह सकता है। पिछले वर्ष यही आंकड़ा करीब 49 लाख टन था। भंडार में यह गिरावट सरकार और चीनी उद्योग दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई है क्योंकि कम भंडार का सीधा असर बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।

निर्यात पर लग सकती है लगाम

कम होते भंडार को देखते हुए सरकार की पहली प्राथमिकता घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराना होगी। पिछले कुछ समय से सरकार ने चीनी निर्यात को सीमित रखा है और निर्धारित आवंटन की तुलना में कम मात्रा में निर्यात की अनुमति दी गई है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले सीजन की शुरुआत कमजोर भंडार के साथ होती है तो निर्यात बढ़ाने की संभावना काफी कम हो जाएगी।

इथेनॉल उत्पादन पर भी रहेगा दबाव

देश में इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए चीनी और गन्ने का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। लेकिन यदि चीनी की उपलब्धता कम रहती है तो सरकार को इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के उपयोग पर भी संतुलन बनाना पड़ सकता है। घरेलू मांग को प्राथमिकता देने के लिए इथेनॉल क्षेत्र को आवंटित चीनी की मात्रा पर अतिरिक्त निगरानी रखी जा सकती है।

मानसून तय करेगा आगे की दिशा

 उत्तर प्रदेश के मध्य और पूर्वी क्षेत्रों के साथ-साथ बिहार में गन्ने की फसल काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। यदि बारिश सामान्य रहती है तो उत्पादन अनुमान स्थिर रह सकते हैं, लेकिन कमजोर मानसून की स्थिति में उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति, उत्पादन के आंकड़े और बाजार की मांग सरकार की नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

सरकार के सामने संतुलन की चुनौती

बढ़ती खपत, सीमित उत्पादन, घटते भंडार और इथेनॉल कार्यक्रम के बीच सरकार को संतुलन बनाना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सीजन में चीनी की उपलब्धता और कीमतें दोनों चर्चा का विषय बन सकती हैं। फिलहाल पूरे चीनी उद्योग की नजर मानसून, उत्पादन के अंतिम आंकड़ों और सरकार की आगामी नीतियों पर टिकी हुई है।