पिशाचमोचन कुंड पर इस बार ऑनलाइन श्राद्ध-पिंडदान पर रोक:तीर्थ पुरोहित बोले- सुविधा के नाम पर नहीं बदले जा सकते शास्त्र,त्रिपिंडी श्राद्ध का कुंड पर है विशेष महत्व

Sep 30, 2026 - 13:56
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पिशाचमोचन कुंड पर इस बार ऑनलाइन श्राद्ध-पिंडदान पर रोक:तीर्थ पुरोहित बोले- सुविधा के नाम पर नहीं बदले जा सकते शास्त्र,त्रिपिंडी श्राद्ध का कुंड पर है विशेष महत्व
काशी के अति प्राचीन पिशाचमोचन कुंड पर पितृपक्ष में होने वाले त्रिपिंडी श्राद्ध और पिंडदान की अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यता है। मान्यता है कि यहां विधि-विधान से श्राद्ध करने पर अकाल मृत्यु, प्रेत बाधा और पितरों से जुड़ी व्याधियों से मुक्ति मिलती है। इसी विश्वास के चलते पितृपक्ष के दौरान देशभर से बड़ी संख्या में लोग पिशाचमोचन तीर्थ पहुंचते हैं। इस बार तीर्थ पुरोहितों और महंत परिवार ने यहां ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान कराने पर पूरी तरह रोक लगा दी है। पिशाचमोचन कुंड पर इस बार स्क्रीन, वीडियो कॉल या किसी अन्य डिजिटल माध्यम से यजमान की अनुपस्थिति में श्राद्ध-पिंडदान नहीं कराया जाएगा। तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि श्राद्ध कर्म में यजमान की प्रत्यक्ष मौजूदगी, संकल्प और स्वयं पिंड अर्पित करने की परंपरा है। उनका कहना है कि सुविधा के नाम पर सनातन परंपरा की निर्धारित विधि में बदलाव नहीं किया जा सकता। क्या है पिशाचमोचन तीर्थ की मान्यता काशी के धार्मिक स्थलों में पिशाचमोचन को पितृकर्म के लिए विशेष महत्व वाला तीर्थ माना जाता है। मान्यता के अनुसार, जिन लोगों की मृत्यु अकाल, दुर्घटना, असामयिक परिस्थितियों या किसी अन्य कारण से हुई हो, उनके निमित्त यहां त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे मृतात्मा को प्रेतयोनि से मुक्ति और पितरों को शांति प्राप्त होती है। इसी कारण पितृपक्ष में यहां अलग-अलग शहरों और राज्यों से लोग अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने पहुंचते हैं। खासकर उन परिवारों की संख्या अधिक रहती है, जिनके यहां किसी सदस्य की असामयिक मृत्यु हुई हो या जिनके बारे में परिवार की धार्मिक मान्यता हो कि पितृदोष अथवा प्रेत बाधा से संबंधित कर्म कराया जाना आवश्यक है। त्रिपिंडी श्राद्ध में क्या होता है पिशाचमोचन में होने वाले त्रिपिंडी श्राद्ध में सामान्य तौर पर तीन पिंडों के माध्यम से पितरों का पूजन किया जाता है। तीर्थ पुरोहित यजमान को विधि-विधान के अनुसार संकल्प कराते हैं। इसके बाद गणेश, देवताओं और पितरों का स्मरण करते हुए निर्धारित कर्म किए जाते हैं। पिंड तैयार कर उन्हें विधिपूर्वक अर्पित किया जाता है। तर्पण, मंत्रोच्चार और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के बाद ब्राह्मण भोजन तथा दान-पुण्य की परंपरा भी निभाई जाती है। पुरोहितों के अनुसार, श्राद्ध कर्म में केवल सामग्री चढ़ाना ही महत्वपूर्ण नहीं माना जाता, बल्कि यजमान का संकल्प और उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी भी कर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी वजह से पिशाचमोचन में इस बार ऑनलाइन माध्यम से होने वाले श्राद्ध को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। पहले स्क्रीन पर होता था संकल्प बीते कुछ वर्षों में दूर रहने वाले लोगों के लिए ऑनलाइन पूजा-पाठ और वीडियो कॉल के जरिए श्राद्ध कराने का चलन बढ़ा है। इसमें यजमान अपने घर या विदेश से वीडियो कॉल के माध्यम से तीर्थ पुरोहित से जुड़ते थे और स्क्रीन पर पूजा की प्रक्रिया देखते हुए संकल्प कराते थे। कई जगह उनके नाम से पिंडदान और अन्य कर्म पुरोहित स्वयं संपन्न कराते थे। लेकिन पिशाचमोचन के तीर्थ पुरोहितों और महंत परिवार ने इस व्यवस्था को इस बार स्वीकार नहीं करने का निर्णय लिया है। पिशाचमोचन के प्राचीन महंत पं. मुन्नालाल पंडा परिवार से जुड़े नीरज पांडे ने कहा श्राद्ध की मूल परंपरा में यजमान का स्वयं उपस्थित होकर संकल्प लेना और अपने हाथों से पिंड तथा भोजन अर्पित करना शामिल है। उनका कहना है कि आस्था सुविधा के अनुसार नहीं, निर्धारित धार्मिक विधि के अनुसार निभाई जानी चाहिए। जब यजमान स्वयं तीर्थ पर मौजूद नहीं है तो ऑनलाइन माध्यम से कराया गया कर्म पारंपरिक विधि के अनुरूप नहीं माना जा सकता। पितृपक्ष में उमड़ रही भीड़ पितृपक्ष शुरू होते ही पिशाचमोचन कुंड पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई है। सुबह से ही अलग-अलग राज्यों और जिलों से आए लोग पुरोहितों के साथ श्राद्ध और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं। कुंड के आसपास धार्मिक अनुष्ठान, मंत्रोच्चार और तर्पण का क्रम चलता रहता है। तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि पिशाचमोचन केवल एक सामान्य पूजा स्थल नहीं, बल्कि पितृकर्म की प्राचीन परंपरा से जुड़ा तीर्थ है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को निर्धारित विधि से ही कर्मकांड पूरा करने की सलाह दी जा रही है।

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