दवा 2700 की, मरीज से 27000! सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और मरीजों से अधिक वसूली पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने 2,700 रुपये की दवा के लिए 27,000 रुपये वसूले जाने का उदाहरण देते हुए दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल उठाए। अब 12 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में सरकार की ओर से आगे की कार्रवाई और संभावित बदलावों पर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 30 सितंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमत और मरीजों से वसूले जा रहे अत्यधिक दाम को लेकर केंद्र सरकार से सवाल किए हैं। अदालत ने एक कैंसर की दवा का उदाहरण देते हुए कहा कि जब खुदरा विक्रेता को दवा कम कीमत पर मिलती है और मरीज से कई गुना अधिक राशि वसूली जाती है, तो इस व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है। अब 12 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पर नजर है।
दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
29 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दवा कंपनियों और अस्पतालों द्वारा मरीजों से वसूले जाने वाले अत्यधिक दाम पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण सामने रखा। अदालत के मुताबिक, जिस दवा की कीमत खुदरा विक्रेता के लिए करीब 2,700 रुपये थी, उसके लिए मरीज से 27,000 रुपये तक वसूले गए। अदालत ने केंद्र से पूछा कि जब निर्धारित दवाओं पर 16 प्रतिशत खुदरा लाभ की व्यवस्था है, तो ऐसी सीमा सभी दवाओं पर क्यों नहीं लागू होनी चाहिए।
भारत में दो तरह से तय होती हैं दवाओं की कीमतें
भारत में दवाओं को मुख्य रूप से निर्धारित और गैर-निर्धारित श्रेणियों में बांटा जाता है। आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल दवाओं की कीमत पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण निगरानी रखता है। इन दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने के लिए बाजार में उपलब्ध प्रमुख ब्रांडों की कीमतों को आधार बनाया जाता है। इसके बाद निर्धारित खुदरा लाभ जोड़कर अधिकतम कीमत तय की जाती है।
निर्धारित दवाओं पर सरकार का मूल्य नियंत्रण
आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल दवाओं की कीमतों पर सरकार का अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण रहता है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण बाजार में उन प्रमुख ब्रांडों की औसत कीमत के आधार पर अधिकतम कीमत निर्धारित करता है, जिनकी बाजार हिस्सेदारी कम से कम एक प्रतिशत है। इसमें 16 प्रतिशत खुदरा लाभ भी जोड़ा जाता है। जुलाई 2026 तक प्राधिकरण ने 935 औषधि संरचनाओं के लिए अधिकतम कीमतें निर्धारित की थीं।
गैर-निर्धारित दवाओं में बड़ी समस्या
जो दवाएं आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल नहीं हैं, उनकी शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता रहती है। सरकार की ओर से मुख्य सीमा यह है कि सामान्य परिस्थितियों में एक वर्ष में अधिकतम खुदरा कीमत में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि नहीं की जा सकती। लेकिन शुरुआती कीमत तय करने की प्रक्रिया में व्यापक नियंत्रण नहीं होने के कारण कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिल सकता है। यही व्यवस्था दवाओं के व्यापारिक लाभ को लेकर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है।
लागत और अधिकतम खुदरा कीमत में बड़ा अंतर
संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में दवाओं की आपूर्ति कीमत और अधिकतम खुदरा कीमत के बीच बड़े अंतर के उदाहरण सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक सामान्य एलर्जी-रोधी गोली की अधिकतम खुदरा कीमत 21 रुपये थी, जबकि उसे थोक आपूर्तिकर्ता को करीब 1.85 रुपये में दिया जा रहा था। इसी तरह एक कैल्शियम पूरक की अधिकतम खुदरा कीमत 327 रुपये और आपूर्ति कीमत 16.95 रुपये बताई गई। ऐसे उदाहरण दवा मूल्य निर्धारण की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं।
दवा की आपूर्ति श्रृंखला में किसका कितना लाभ
दवा निर्माता से मरीज तक पहुंचने के बीच कई स्तर होते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनियां कई गैर-निर्धारित दवाओं में 40 से 60 प्रतिशत तक लाभ रखती हैं, जबकि वितरक का हिस्सा करीब 8 से 15 प्रतिशत और खुदरा विक्रेता का हिस्सा 20 से 25 प्रतिशत तक बताया गया है। निर्धारित दवाओं में औषधि मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के तहत थोक विक्रेता के लिए 8 प्रतिशत और खुदरा विक्रेता के लिए 16 प्रतिशत लाभ की सीमा तय है। गैर-निर्धारित दवाओं में ऐसी स्पष्ट सीमा का अभाव मुख्य विवाद है।
अस्पतालों में दवा खरीदने को लेकर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों की दवा बिक्री व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि कुछ बड़े अस्पताल मरीजों को अपने ही परिसर की दवा दुकानों से दवा खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। यदि मरीज बाहर से दवा खरीदकर लाता है तो इलाज की जिम्मेदारी से जुड़े सवाल खड़े किए जाने की बात सामने आई। इससे मरीज के पास कम विकल्प बचते हैं और उसे अस्पताल द्वारा तय कीमत पर दवा खरीदनी पड़ सकती है।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर भी पड़ सकता है असर
अदालत में यह मुद्दा भी सामने आया कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत होने वाले इलाज में दवाओं की ऊंची कीमत का बोझ अंततः सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस व्यवस्था में लाभ का बड़ा हिस्सा निजी अस्पतालों को मिलने की बात सामने आई है। हालांकि इस संबंध में विभिन्न पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। अदालत अब दवा मूल्य निर्धारण और अस्पतालों की भूमिका से जुड़े व्यापक मुद्दे पर विचार कर रही है।
केंद्र सरकार ने माना कि व्यवस्था में सुधार की जरूरत
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने दवाओं की कीमतों से जुड़े मुद्दे पर सुधार की जरूरत स्वीकार की। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार इस मामले में विरोधी रुख नहीं अपना रही है और समाधान के लिए संबंधित अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श करेगी। केंद्र को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए समय दिया गया है। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।
12 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी नजर
सुप्रीम कोर्ट ने अभी दवाओं की कीमतों पर कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि 16 प्रतिशत खुदरा लाभ की सीमा सभी जरूरी दवाओं पर लागू क्यों नहीं होनी चाहिए। यदि सरकार व्यापक मूल्य नियंत्रण की दिशा में कदम उठाती है तो दवाओं की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर इसका असर पड़ सकता है। 12 अक्टूबर की सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से आगे की योजना और अदालत की अगली दिशा स्पष्ट हो सकती है।
दवा मूल्य नियंत्रण का असली सवाल
दवाओं की कीमतों को लेकर विवाद केवल अधिकतम खुदरा कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्माता से लेकर मरीज तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा है। संसद की स्थायी समिति भी व्यापारिक लाभ को तर्कसंगत बनाने के लिए स्थायी व्यवस्था की जरूरत बता चुकी है। अब सवाल यह है कि सरकार गैर-निर्धारित दवाओं की कीमतों और अस्पतालों में दवा बिक्री पर किस तरह नियंत्रण करती है। आने वाले न्यायिक निर्देश इस व्यवस्था में संभावित बदलाव की दिशा तय कर सकते हैं।
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