राम वन गमन पथ यात्रा, भाग-3; चित्रकूट से भरतकूप:वो शिलाएं... जो राम-भरत के मिलन पर पिघल गईं, वो कुआं जिसमें समाया तीर्थों का जल

Nov 04, 2026 - 04:40
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राम वन गमन पथ यात्रा, भाग-3; चित्रकूट से भरतकूप:वो शिलाएं... जो राम-भरत के मिलन पर पिघल गईं, वो कुआं जिसमें समाया तीर्थों का जल
राम वन गमन पथ यात्रा के तीसरे भाग में हम चित्रकूट के उन स्थानों पर पहुंचे, जहां भगवान राम के वनवास, भरत के त्याग और सीता-लक्ष्मण से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं आज भी जीवित हैं। कामदगिरि पर्वत पर राम-भरत के मिलाप की निशानी माने जाने वाले चरणचिह्न हैं। करीब 5 किमी की परिक्रमा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश, दोनों राज्यों से होकर गुजरती है। यहां से 18 किमी दूर गुप्त गोदावरी की दो गुफाएं हैं, जहां राम-लक्ष्मण का दरबार लगने की मान्यता है। सितंबर में चट्टानें गिरने के बाद इन गुफाओं में श्रद्धालुओं का प्रवेश बंद कर दिया गया था। इस पड़ाव में कामतानाथ मंदिर, लक्ष्मण पहाड़ी, भरत मिलाप, स्फटिक शिला और भरतकूप से जुड़ी रामायण की कथाओं को समझिए। कामतानाथ मंदिर: पर्वत के चारों ओर भगवान के चार मुखारविंद, यहां करीब 11 साल रहे थे श्रीराम चित्रकूट के कामदगिरि पर्वत की तलहटी में कामतानाथ मंदिर है। भगवान कामतानाथ को चित्रकूट का प्रमुख आराध्य माना जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीराम ने 14 साल के वनवास का करीब 11 साल का समय चित्रकूट क्षेत्र में बिताया था। कामदगिरि का अर्थ है मनोकामनाएं पूरी करने वाला पर्वत। मान्यता है कि श्रीराम के निवास के कारण इस पर्वत को यह महत्व मिला। कामदगिरि मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, पर्वत की चारों दिशाओं में कामतानाथ के चार मुखारविंद हैं। उत्तर दिशा का प्रमुख द्वार सबसे महत्वपूर्ण है। यहां कामतानाथ के साथ हनुमानजी और श्रीराम दरबार के दर्शन होते हैं। परिक्रमा पथ: 5 किमी की परिक्रमा में पार होती है दो राज्यों की सीमा कामदगिरि पर्वत की करीब 5 किमी लंबी परिक्रमा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के हिस्सों से गुजरती है। धार्मिक मान्यता है कि वनवास के दौरान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण इस पर्वत पर भ्रमण करते थे। इसी कारण श्रद्धालु यहां नंगे पैर परिक्रमा करते हैं। कुछ भक्त दंडवत होकर भी पूरे पर्वत की परिक्रमा करते हैं। रास्ते में कामतानाथ के अलग-अलग मुखारविंद, भरत मिलाप मंदिर, हनुमान मंदिर और दूसरे छोटे-बड़े मंदिर हैं। कामदगिरि के मुख्य द्वार से शुरू होने वाली इस परिक्रमा में श्रद्धालु पर्वत को अपनी दाईं ओर रखते हुए पूरा चक्कर लगाते हैं। हर अमावस्या को बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लक्ष्मण पहाड़ी: जहां धनुष-बाण लेकर रातभर पहरा देते थे लक्ष्मण, पहाड़ी पर आज भी एक कुआं कामदगिरि परिक्रमा मार्ग के दक्षिणी हिस्से में लक्ष्मण पहाड़ी है। मान्यता है कि जब राम और सीता विश्राम करते थे, तब लक्ष्मण इसी ऊंचे स्थान पर धनुष-बाण लेकर पहरा देते थे। रामचरितमानस में भी लक्ष्मण के धनुष-बाण लेकर वीरासन में बैठकर जागने का वर्णन है। पहाड़ी के ऊपर लक्ष्मणजी का मंदिर है। यहां मंदिर के सामने एक पुराना कुआं भी है, जिसमें ऊंचाई पर स्थित होने के बावजूद पानी रहने की बात मंदिर ट्रस्ट बताता है। पहले श्रद्धालु सीढ़ियां चढ़कर यहां पहुंचते थे। अब रोपवे की सुविधा भी है, जिससे कुछ मिनट में पहाड़ी के ऊपर पहुंचा जा सकता है। यहां से कामदगिरि और आसपास का क्षेत्र दिखाई देता है। भरत मिलाप मंदिर: चार भाइयों का प्रेम देखकर पिघल गए थे पत्थर, शिलाओं पर चरणचिह्न कामदगिरि परिक्रमा मार्ग पर भरत मिलाप मंदिर है। रामायण की कथा के अनुसार, पिता दशरथ की मृत्यु और श्रीराम के वनवास का समाचार मिलने पर भरत उन्हें अयोध्या वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुंचे थे। उनके साथ गुरु वशिष्ठ, माताएं, शत्रुघ्न और अयोध्या के लोग भी आए थे। श्रीराम और भरत के मिलन से जुड़ी स्थानीय मान्यता है कि दोनों भाइयों का प्रेम देखकर यहां की कठोर शिलाएं भी पिघल गई थीं। इन पर श्रीराम, भरत और उनके भाइयों के चरणचिह्न बन गए। मंदिर परिसर में आज भी शिलाओं पर बने इन चिह्नों के दर्शन कराए जाते हैं। कामदगिरि मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, यहां तीन छतरियों के नीचे इन चरणचिह्नों को संरक्षित रखा गया है। भरत-जनक मिलाप: श्रीराम को अयोध्या लौटाने की कोशिश के बीच चित्रकूट पहुंचे थे राजा जनक भरत के चित्रकूट पहुंचने के बाद मिथिला के राजा जनक भी यहां आए थे। रामचरितमानस के अयोध्याकांड में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। जनक के साथ मिथिला के लोग भी चित्रकूट पहुंचे। वहां अयोध्या और मिथिला के दोनों राजपरिवारों का मिलन हुआ। श्रीराम को वापस अयोध्या ले जाने पर विचार हुआ, लेकिन श्रीराम पिता की आज्ञा के अनुसार 14 साल का वनवास पूरा करने के निर्णय पर अडिग रहे। राजा जनक ने भरत के त्याग और श्रीराम के प्रति उनके प्रेम की सराहना की। चित्रकूट की यह कथा केवल दो भाइयों के मिलन की नहीं, बल्कि दोनों राजपरिवारों के सामने धर्म और कर्तव्य के निर्णय की भी है। मत्तगजेंद्रनाथ मंदिर: चित्रकूट में रहने से पहले श्रीराम ने की थी शिव पूजा, यहां चार शिवलिंग चित्रकूट के रामघाट पर मंदाकिनी नदी के किनारे मत्तगजेंद्रनाथ शिव मंदिर है। यहां चार शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर की परंपरा के अनुसार, सबसे पहले ब्रह्माजी के यज्ञ से यहां शिवलिंग प्रकट हुआ था। मत्तगजेंद्रनाथ को चित्रकूट का क्षेत्रपाल यानी रक्षक देवता माना जाता है। मान्यता है कि वनवास के दौरान श्रीराम जब चित्रकूट पहुंचे, तो उन्होंने यहां शिवजी का जलाभिषेक किया और क्षेत्र में निवास करने की अनुमति मांगी। इसके बाद वे कामदगिरि में रहने गए। आज भी श्रद्धालु मंदाकिनी में स्नान करने के बाद मत्तगजेंद्रनाथ के दर्शन और जलाभिषेक करते हैं। पर्णकुटी मंदिर: घास-फूस और पत्तों से लक्ष्मण ने बनाया था राम-सीता का घर चित्रकूट के रामघाट क्षेत्र में पर्णकुटी से जुड़ा धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि वनवास में श्रीराम और सीता के रहने के लिए लक्ष्मण ने पेड़ों की लकड़ियों, पत्तों और घास-फूस से कुटिया बनाई थी। वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में चित्रकूट पहुंचने के बाद लक्ष्मण द्वारा पत्तों की कुटिया बनाने का वर्णन है। इसी तरह की कुटिया में रहकर श्रीराम ने चित्रकूट में वनवासी जीवन बिताया। यहां ऋषि-मुनियों का आना-जाना होता था और श्रीराम उनसे धर्म तथा वनवास से जुड़े विषयों पर चर्चा करते थे। स्थानीय परंपरा में इस स्थान को उसी पर्णकुटी की स्मृति से जोड़ा जाता है। तुलसीदास मंदिर: जहां दो बालकों को चंदन लगाया, बाद में पता चला वे राम-लक्ष्मण थे चित्रकूट के रामघाट के पास गोस्वामी तुलसीदास से जुड़ी तुलसी गुफा और मंदिर है। धार्मिक मान्यता है कि तुलसीदास भगवान राम के दर्शन पाने के लिए चित्रकूट आए थे। हनुमानजी की कृपा से उन्हें रामघाट पर दो सुंदर बालकों के दर्शन हुए। कथा के अनुसार, तुलसीदास चंदन घिस रहे थे और उन्होंने दोनों बालकों को तिलक लगाया। तभी तोते के रूप में हनुमानजी ने संकेत दिया कि ये राम और लक्ष्मण हैं। इसी प्रसंग से प्रसिद्ध पंक्ति जुड़ी है— 'चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर।' इस कथा के कारण रामघाट तुलसीदास की भक्ति और रामदर्शन की परंपरा का प्रमुख स्थान है। भरत मंदिर: श्रीराम की चरण पादुकाएं लेकर लौटे थे भरत, 14 साल राजा की तरह नहीं रहे रामघाट पर भरतजी को समर्पित मंदिर भी है। भरत के त्याग की कथा चित्रकूट से जुड़ी है। श्रीराम ने जब पिता की आज्ञा पूरी होने से पहले अयोध्या लौटने से इनकार किया, तो भरत ने उनसे चरण पादुकाएं मांगीं। वे पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटे और नंदीग्राम में उन्हें राजसिंहासन पर स्थापित करके श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का काम संभाला। स्वयं राजसी सुख छोड़कर तपस्वी की तरह रहे। रामायण के अनुसार, भरत ने श्रीराम की अनुपस्थिति में खुद को राजा नहीं माना। चित्रकूट का भरत मंदिर इसी त्याग और भाई के प्रति समर्पण की भावना से जुड़ा है। गुप्त गोदावरी: गुफा के भीतर राम-लक्ष्मण के दो सिंहासन, चट्टानें गिरने के बाद प्रवेश बंद चित्रकूट से करीब 18 किमी दूर विंध्य पर्वत की चट्टानों के बीच गुप्त गोदावरी की दो प्राकृतिक गुफाएं हैं। एक गुफा अपेक्षाकृत सूखी है, जबकि दूसरी में पानी की धारा बहती है। यहां कई जगह पानी घुटनों तक पहुंच जाता है। बड़ी गुफा में पत्थर के दो सिंहासन हैं। मान्यता है कि वनवास के दौरान श्रीराम और लक्ष्मण यहां सभा लगाते थे। गुफा में सीता कुंड, धनुष कुंड और राम दरबार जैसे धार्मिक स्थल हैं। सीता कुंड से माता सीता के स्नान की मान्यता जुड़ी है। यहां बहने वाली जलधारा को गोदावरी का गुप्त रूप माना जाता है। अगस्त-सितंबर 2026 में भारी बारिश और बाढ़ के बाद गुफाओं की चट्टानों में दरारें आईं। कुछ स्थानों पर पत्थर भी गिरे। खटखटा चोर के पास पत्थर गिरने से एक पंचमुखी शिवलिंग क्षतिग्रस्त हुआ। हादसे का खतरा देखते हुए प्रशासन ने सितंबर के आखिरी सप्ताह में श्रद्धालुओं का प्रवेश बंद कर दिया। 24 अक्टूबर तक दोनों गुफाएं बंद थीं। भूवैज्ञानिक जांच और जरूरी सुरक्षा कार्य के बाद ही दोबारा प्रवेश देने की बात कही गई है। स्फटिक शिला: श्रीराम ने फूलों के गहनों से किया था सीता का श्रृंगार, यहीं कौए को दिया दंड चित्रकूट में मंदाकिनी नदी के किनारे स्फटिक शिला है। रामचरितमानस के अरण्यकांड की शुरुआत में इस स्थान से जुड़ा सुंदर प्रसंग मिलता है। एक दिन श्रीराम ने फूल चुनकर अपने हाथों से सीता के लिए गहने बनाए और स्फटिक शिला पर बैठकर उन्हें पहनाए। उसी समय इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण कर श्रीराम की शक्ति परखने की कोशिश की। उसने सीता के चरण में चोंच मारी। श्रीराम ने एक सींक को मंत्र से अस्त्र बनाकर उस पर छोड़ दिया। जयंत तीनों लोकों में बचने का स्थान खोजता रहा। आखिर श्रीराम की शरण में आने पर उसके प्राण बच गए, लेकिन एक आंख चली गई। इस शिला पर श्रीराम के चरणचिह्न होने की भी मान्यता है। भरतकूप मंदिर: राम के राज्याभिषेक के लिए लाया तीर्थों का जल, 20 किमी दूर कुएं में रखा चित्रकूट से करीब 20 किमी पश्चिम में भरतकूप है। भरत श्रीराम को अयोध्या लौटाकर उनका राज्याभिषेक करना चाहते थे। इसके लिए वे अलग-अलग पवित्र तीर्थों का जल लेकर चित्रकूट पहुंचे थे। लेकिन श्रीराम ने वनवास पूरा होने से पहले लौटने से इनकार कर दिया। इसके बाद महर्षि अत्रि ने भरत से कहा कि यह पवित्र जल पर्वत के पास स्थित एक कुएं में रख दें। भरत ने अपने साथ लाया तीर्थों का जल उसी कुएं में अर्पित कर दिया। रामचरितमानस के अयोध्याकांड के दोहा 309 और उसके बाद की चौपाइयों में इस घटना का उल्लेख है। इसी कारण यह स्थान भरतकूप कहलाया। यहां बने मंदिर में श्रीराम परिवार के साथ भरत और उनकी पत्नी मांडवी की प्रतिमाएं भी हैं। धार्मिक मान्यता है कि भरतकूप के जल में अनेक तीर्थों का पुण्य समाया है।

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