भास्कर सीरीज; 7 दिन... 7 रामायण अपनी-अपनी रामकथा: भाग-2:अध्यात्म रामायण: रावण बिना बाधा के हवन कर लेता तो अजेय हो जाता
अध्यात्म रामायण की रचना 14वीं से 15वीं शताब्दी में की गई। धार्मिक परंपरा और रूढ़िगत मान्यताओं के अनुसार, इसे ब्रह्मांड पुराण का अंश मानते हैं और इसके रचयिता महर्षि वेद व्यास माने जाते हैं। प्रसंग-1: ऐसे रावण का हवन विफल हुआ श्रीराम से युद्ध में जब रावण हारने लगा तो शुक्राचार्य ने कहा- हे दशानन! तुम किसी एकान्त जगह हवन करो। यदि वह बिना विघ्न हो गया तो तुम अजेय हो जाओगे। रावण एक गुहा में हवन करने लगा। तभी विभीषण ने भारी धुआं उठते देखकर कहा- हे राम! देखिए, दशशीश ने हवन शुरू कर दिया है। इसे रोकना होगा। श्रीराम ने अंगद और हनुमान सहित 10 करोड़ वानरों को भेज दिया। वहां वानरगण रावण पर टूट पड़े, लेकिन उसने ध्यान नहीं छोड़ा। तभी अंगद अन्त:पुर जाकर तुरंत मन्दोदरी को चोटी पकड़कर ले आए। फिर भी रावण नहीं उठा तो मन्दोदरी बोली- तुम्हारे सामने ही शत्रुगण तुम्हारी भार्या की चोटी खींच रहे हैं और तुम हवन कर रहे हो। ऐसे जीने से तो मरना अच्छा है। यह सुनकर रावण तलवार लेकर उठा और अंगद की कमर में प्रहार किया। इससे हवन विफल हो गया।
(युद्धकाण्ड के दशम सर्ग से) प्रसंग-2: सूर्य के तेज से जले संपाती के पंख श्रीराम की वानरसेना जब समुद्र तट पर पहुंची तो वहां अंगद की भेंट जटायु के भाई संपाती से हुई। उसने बताया कि त्रिकूट पर्वत पर लंका नगरी है। वहां सीताजी अशोकवाटिका में राक्षसियों की देख-रेख में रहती हैं। यहां से लंकापुर 100 योजन दूर है। मेरे पंख नहीं रहे, अन्यथा मैं साथ चल देता। अंगद ने पूछा, ऐसा कैसे हुआ? संपाती ने बताया- एक बार मैं और जटायु जब युवा थे, तो यह देखने के लिए कि किसमें कितना बल है, हम कई सहस्त्र योजन ऊंचे चले गए, तो जटायु सूर्य की तेज रोशनी से जलने लगा। उसे बचाने के लिए मैंने पंखों से ढंक लिया तो मेरे पंख जल गए और फिर हम नीचे एक आश्रम में आ गिरे। वहां चंद्रमा नामक मुनीश्वर ने बताया कि त्रेतायुग में जब वानरगण सीताजी को खोजते हुए तुमसे मिलेंगे, तो उन्हें सीताजी का पता बता देना। उसी समय फिर से तुम्हारे नए पंख उत्पन्न हो जाएंगे।
(किष्किंधाकांड के अष्टम सर्ग से) प्रसंग-3: लक्ष्मण ने सुनी राम-गीता रावण वध के बाद अयोध्या लौटे श्रीराम का राज्याभिषेक हो चुका था। एक दिन वे एकान्त में बैठे थे, तभी लक्ष्मण आए और कहा- हे प्रभो! आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे मैं सुगमता से अज्ञानरूपी अपार समुद्र के पार हो जाऊं। श्रीराम ने कहा- यह दुनिया और संसार एक भ्रम है। जैसे अंधेरे में रस्सी को सांप समझकर डर पैदा हो जाता है, वैसे ही इस संसार रूपी माया के कारण लोग सुख-दुख के चक्कर में फंस जाते हैं। जब ज्ञान का दीपक जलता है, तब यह भ्रम दूर हो जाता है और समझ आता है कि इस जगत के पीछे एक ही सत्य परमात्मा है। मोक्ष या मुक्ति का सबसे आसान और सीधा रास्ता भक्ति है। जो निष्काम भाव से भगवान की पूजा करते हैं, वे धीरे-धीरे संसार की माया से ऊपर उठ जाते हैं। इस ज्ञान को ‘राम-गीता’ के नाम जाना जाता है।
(उत्तरकाण्ड के पंचम सर्ग से) प्रसंग-4: रामेश्वर में शिवलिंग स्थापना ऐसा माना जाता है कि वानरश्रेष्ठ नल ने पहले दिन 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवें दिन 23 योजन समुद्र पर पुल बांधा। उसी पुल से वानरगण तुरंत ही सौ योजन समुद्र के उस पार चले गए और फिर असंख्य वानरवीरों ने सुवेल पर्वत को घेर लिया। महादेव बोले- हे पार्वती! समुद्र पर सेतु निर्माण शुरू होने पर श्रीराम ने रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना की थी। उन्होंने कहा- जो भक्त रामेश्वर में इसका दर्शन कर सेतुबन्ध को प्रणाम करेगा, वह मेरी कृपा से ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाएगा। यदि कोई भक्त सेतुबन्धन में स्नान कर रामेश्वर महादेव के दर्शन करे। फिर काशी जाकर वहां से गंगाजल लाए और उससे रामेश्वर का अभिषेक कर उस जल के पात्र को समुद्र में डाल दे, तो वह निस्संदेह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
(उत्तरकाण्ड के चतुर्थ सर्ग से)
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