रामगोविन्द चौधरी का अस्थि कलश प्रयागराज रवाना:पूर्व नेता प्रतिपक्ष के संघर्ष और जनसेवा को याद कर भावुक हुए लोग
पूर्व नेता प्रतिपक्ष और पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री स्व. रामगोविन्द चौधरी का अस्थि कलश बुधवार को उनके पैतृक गांव बलिया के गोसाईपुर से प्रयागराज स्थित संगम के लिए रवाना हुआ। उनके भाई पंचदेव चौधरी, रामबचन यादव और विश्राम चौधरी अस्थि कलश लेकर गए। इस दौरान माहौल काफी भावुक रहा। परिजन, समाजवादी पार्टी के नेता-कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में क्षेत्रीय लोग गोसाईपुर पहुंचे। सभी ने नम आंखों से स्व. रामगोविन्द चौधरी को श्रद्धांजलि दी और उनके संघर्षशील जीवन, समाजवादी विचारधारा और जनसेवा को याद किया। लोगों ने कहा कि रामगोविन्द चौधरी का जीवन संघर्ष, सादगी और जनसेवा से जुड़ा रहा। उनके साथ बिताए पलों को याद करते हुए लोग भावुक नजर आए। अस्थि कलश यात्रा में उमड़ी भीड़ उनके प्रति लोगों के गहरे लगाव को दिखाती रही। इस मौके पर सपा जिलाध्यक्ष सुनील कुमार मौर्य, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हरेंद्र सिंह सहित कई नेता और बड़ी संख्या में अन्य लोग मौजूद रहे। अस्थि कलश को प्रयागराज स्थित संगम में विधि-विधान के साथ विसर्जित किया जाएगा। 9 जुलाई 1946 को जन्मे पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने 25 सितंबर, शुक्रवार की शाम करीब चार बजे लखनऊ स्थित पीजीआई में अंतिम सांस ली। शनिवार देर शाम उनका पार्थिव शरीर जिला मुख्यालय स्थित आवास और उसके बाद सपा कार्यालय लाया गया। वहां से रात में हनुमानगंज, सुखपुरा, बेरूआरबारी, बांसडीह और मनियर होते हुए उनके पैतृक गांव गोसाईपुर ले जाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव शरीर रखा गया। रविवार दोपहर बाद अंतिम यात्रा निकली, जिसमें सांसदों, विधायकों, पूर्व मंत्रियों सहित हजारों लोग शामिल हुए। इकलौते बेटे रंजीत चौधरी ने मुखाग्नि दी। करीब 3:30 बजे आठ बार विधायक, तीन बार मंत्री और एक बार नेता प्रतिपक्ष रहे रामगोविंद चौधरी पंचतत्व में विलीन हो गए। उनके निधन की खबर से प्रदेश सहित पूर्वांचल के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। छात्र राजनीति से संघर्ष की शुरुआत रामगोविंद चौधरी की राजनीतिक यात्रा किसी पद या प्रतिष्ठा की तलाश से नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने, छात्र हितों के लिए संघर्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से शुरू हुई। तीन भाइयों में सबसे बड़े रामगोविंद चौधरी ने प्रारंभिक संस्कार गांव के सामान्य परिवेश से पाए। प्राथमिक शिक्षा गांव में और स्कूली शिक्षा सिकंदरपुर में प्राप्त करने के बाद उन्होंने सतीश चंद्र कॉलेज में बीएससी में प्रवेश लिया। पढ़ाई के साथ छात्र समस्याओं को लेकर वे आंदोलनों में सक्रिय हुए। इसके चलते उन्हें महाविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया में प्रवेश लिया। यहीं से उनकी छात्र राजनीति ने व्यापक जनआंदोलन का रूप लिया। 1972 में वे टाउन कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री और 1974 में अध्यक्ष निर्वाचित हुए। आपातकाल के दौर में उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। जेपी आंदोलन के दौरान वे जनपद छात्र युवा वाहिनी के सह-संयोजक रहे। उनकी गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित किया गया और आंदोलन के दौरान टीडी कॉलेज परिसर से उन्हें गिरफ्तार किया गया। करीब 24 महीने जेल में रहने के बाद जब वे बलिया जेल से बाहर निकले, तो उनके राजनीतिक जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। रिहाई के दिन ही पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लोकसभा चुनाव के लिए बलिया कलेक्ट्रेट में नामांकन करने पहुंचे थे। रामगोविंद चौधरी के साथ उमड़े छात्रों के हुजूम को देखकर चंद्रशेखर ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया। यह मुलाकात आगे चलकर आत्मीय संबंध और राजनीतिक मार्गदर्शन का आधार बनी। विधानसभा से जनसेवा तक 1977 में उन्होंने तत्कालीन चिलकहर विधानसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने लगातार पांच बार इस क्षेत्र का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया। 1991 में मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। खाद्य प्रसंस्करण एवं उद्यान विभाग की जिम्मेदारी संभाली। 2000 में वे समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने। 2002 में उन्होंने बांसडीह विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में, समाजवादी पार्टी के समर्थन से चुनाव लड़ा और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री बच्चा पाठक को करीब 6,000 मतों से हराया। 2004 में मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में उन्हें बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2007 में वे बांसडीह से करीब 264 मतों से चुनाव हार गए। 2012 में उन्होंने फिर जीत दर्ज की और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में बेसिक शिक्षा तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के कैबिनेट मंत्री बने। बाद में समाज कल्याण और पंचायती राज जैसे विभागों की जिम्मेदारी भी संभाली। 2017 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी केतकी सिंह को करीब 1,655 मतों से पराजित किया। इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विरोधी दल की जिम्मेदारी मिली। 2022 के चुनाव में केतकी सिंह ने उन्हें पराजित किया।
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