रामनगर की रामलीला में बारिश के बीच हुआ श्रीराम जन्म:काशी नरेश ने वाहन से पहुंचकर देखी लीला, मंगलगीतों पर झूमे श्रद्धालु
रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला के दूसरे दिन शनिवार को बारिश के बीच भी लीला का मंचन जारी रहा। मौसम खराब होने के बावजूद रामलीला में आस्था और परंपरा का उत्साह कम नहीं हुआ। हालांकि दूसरे दिन काशी नरेश हाथी पर सवार होकर लीला स्थल नहीं पहुंचे। वह अपने वाहन से रामलीला स्थल पहुंचे और वहीं से लीला का दर्शन किया। परंपरा के अनुसार काशी नरेश के लीला स्थल पर पहुंचने के बाद ही रामलीला शुरू होती है। पहले देखें 2 तस्वीर… रामलीला के दूसरे दिन रामनगर के मुक्ताकाशीय मंच पर भगवान श्रीराम के जन्म का प्रसंग मंचित किया गया। श्रीराम जन्म का समाचार मिलते ही अयोध्या में उत्सव का माहौल दिखाई दिया। रामचरितमानस की चौपाइयों और मंगल गीतों के बीच श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के उद्घोष किए। घर-घर बधाई गीत गूंजने का दृश्य रामजन्मोत्सव की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत करता नजर आया। बारिश के बीच भी नहीं थमी रामलीला बारिश के कारण रामलीला मैदान में कुछ अव्यवस्था जरूर हुई, लेकिन लीला प्रेमियों का उत्साह कम नहीं हुआ। दर्शकों का कहना था कि रामनगर की रामलीला में बारिश कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई बार तेज बारिश के बीच लीला का आयोजन हुआ है। उनका कहना था कि परिस्थितियां कैसी भी हों, रामलीला में आरती और प्रमुख परंपराएं निभाई जाती हैं। लीला देखने पहुंचे लोगों ने कहा कि बारिश की वजह से मैदान में परेशानी जरूर हुई, लेकिन उनके लिए आस्था सबसे ऊपर है। इसी विश्वास के साथ बड़ी संख्या में लोग रामजन्म का प्रसंग देखने पहुंचे। श्रद्धालुओं के अनुसार कभी-कभी मौसम की वजह से प्रसंगों के समय में आगे-पीछे जरूर बदलाव होता है, लेकिन रामनगर की रामलीला की परंपरा लगातार चलती रही है। दशरथ की व्यथा से शुरू हुआ प्रसंग दूसरे दिन की लीला में अयोध्या के राजा दशरथ की पुत्र प्राप्ति की इच्छा और उनकी व्यथा का मंचन किया गया। राजा दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ के पास पहुंचकर मन की पीड़ा बताते हैं। वह कहते हैं कि राज-पाट और सभी सुख होने के बावजूद उनके जीवन में पुत्र का अभाव उन्हें दुखी करता है। गुरु वशिष्ठ राजा दशरथ को धैर्य रखने का आश्वासन देते हैं। लीला में बताया जाता है कि पूर्व जन्म में दशरथ का नाम मनु और कौशल्या का नाम सतरूपा था। दोनों ने भगवान की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी और भगवान से पुत्र रूप में प्राप्त होने का वर मांगा था। गुरु वशिष्ठ उन्हें बताते हैं कि उनकी तपस्या के फलस्वरूप उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति होगी। पुत्रेष्टि यज्ञ के बाद हुआ श्रीराम का जन्म इसके बाद गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन में राजा दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कराते हैं। यज्ञ से प्रसन्न होकर अग्निदेव प्रकट होते हैं और राजा दशरथ को दिव्य द्रव्य प्रदान करते हैं। अग्निदेव राजा से उस द्रव्य को अपनी रानियों में उचित अनुपात में बांटने के लिए कहते हैं। राजा दशरथ द्रव्य का आधा भाग महारानी कौशल्या को देते हैं। शेष आधे भाग को कैकेयी और सुमित्रा के बीच बांट दिया जाता है। इसके बाद अयोध्या में चारों भाइयों के जन्म का प्रसंग सामने आता है। श्रीराम के जन्म के साथ ही पूरी अयोध्या आनंद और उल्लास में डूब जाती है। मंगल गीतों, बधाइयों और जय श्रीराम के उद्घोष से लीला स्थल गूंज उठता है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)