सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के इंतजार में 25 केस:इनमें मुस्लिमों को 5% आरक्षण, वाट्सएप की निजता जैसे मामले भी शामिल
सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के इंतजार में 25 केस लंबित हैं। पंजाब में सिखों के अल्पसंख्यक दर्जे और राइस मिलर्स एवं एफसीआई के विवाद से जुड़े दो केस 16 साल पहले संविधान पीठ को रेफर हुए थे। लेकिन, इन पर सुनवाई के लिए आज तक संविधान पीठ गठित नहीं हुई। इनके अलावा 4 और केस भी 10 साल या इससे ज्यादा समय से लटके हैं। संविधान पीठ को रेफर किए जाने से पहले ये केस वर्षों छोटी पीठों के पास भी लंबित रह चुके हैं। संविधान पीठ के समक्ष लंबित सभी मामले व्यापक संवैधानिक महत्व से जुड़े हैं। 4 केस आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित हैं। नौकरी, चुनाव, केंद्र-राज्य अधिकार और आर्थिक विवादों से जुड़े 3-3 केस हैं। 2 मामले धर्म-संस्कृति के हैं। मुस्लिम आरक्षण, मुस्लिम विवाह, महिला के संपत्ति अधिकार, डिजिटल निजता के मुद्दे भी सुनवाई के इंतजार में हैं। संविधान पीठ को इन मामलों में आरक्षण, राज्यपाल-स्पीकर के अधिकार, निजता जैसे मुद्दों से जुड़े संवैधानिक सवालों का जवाब तय करना है। सुप्रीम कोर्ट में नियमित संविधान पीठ की मांग उठती रही है। जजों ने भी समय-समय पर इस पर जोर दिया है। 22 केस: 5 सदस्यीय बेंच के इंतजार में सिखों का अल्पसंख्यक दर्जा (16 साल से लंबित)
पंजाब सरकार बनाम साहिल मित्तल केस में कोर्ट को पंजाब सरकार की 2001 की अधिसूचना में सिख समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने की वैधता तय करनी है। भारत सरकार बनाम प्रीति अग्रवाल केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या 1944 के आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश के तहत संपत्ति कुर्क करने की शक्ति संविधान लागू होने के बाद भी वैध है?
असर: अल्पसंख्यक दर्जे से जुड़े अधिकारों पर। अंग्रेजी कानून से कुर्की (7 साल से लंबित)
भारत सरकार बनाम प्रीति अग्रवाल केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या 1944 के आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश के तहत संपत्ति कुर्क करने की शक्ति संविधान लागू होने के बाद भी वैध है?
असर: संपत्ति कुर्क करने की सरकारी शक्ति और संविधान से पहले बने कानूनों की वैधता पर असर पड़ेगा। वाट्सएप की निजता नीति (9 साल से लंबित)
कर्मण्य सिंह सरीन बनाम भारत सरकार केस में तय करना है कि क्या वॉट्सएप की निजता नीति और डेटा साझा करने की सहमति लेने का तरीका संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है?
असर: यूजर्स की डिजिटल निजता और निजी डेटा साझा करने की सहमति पर पड़ सकता है। मराठा आरक्षण समीक्षा (ढाई साल से लंबित)
मराठा-मुस्लिम आरक्षण समिति बनाम महाराष्ट्र केस में कोर्ट को महाराष्ट्र में सरकारी नौकरियों और कॉलेजों में मराठा आरक्षण के फैसले की समीक्षा करनी है।
असर: फैसले का असर आरक्षण से नौकरी और कॉलेज में प्रवेश पाने वालों पर पड़ सकता है। जल्लीकट्टू पर फैसला (3 साल से लंबित)
एनजी जयसिम्हा बनाम भारत सरकार केस में जल्लीकट्टू को अनुमति देने के खिलाफ पुनर्विचार याचिका लंबित है।
असर: तमिलनाडु में जल्लीकट्टू के आयोजनों और प्रतिभागियों पर इसका असर पड़ेगा। छोटे उद्योगों के भुगतान (करीब 2 साल से लंबित)
तमिलनाडु सीमेंट कॉरपोरेशन बनाम माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइज फैसिलिटेशन काउंसिल केस में मुद्दा है कि क्या मध्यस्थता का विकल्प होने पर भी अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जा सकती है?
असर: भुगतान विवादों में सूक्ष्म और लघु उद्यमों के कानूनी रास्ते स्पष्ट होंगे। इससे जुड़ी 33 याचिकाएं लंबित हैं। मुस्लिमों को 5% आरक्षण (11 साल से लंबित)
आंध्र प्रदेश सरकार बनाम बी. अर्चना रेड्डी केस में सुप्रीम कोर्ट को पूरे मुस्लिम समुदाय को पिछड़ा वर्ग मानकर नौकरी और शिक्षण संस्थानों में 5% आरक्षण देने की वैधता तय करनी है। मूल चुनौती 2005 में दी गई थी। फरवरी 2016 में 5 सदस्यीय पीठ ने कुछ अर्जियों को सुनवाई के लिए स्वीकार किया, लेकिन 10 साल 8 महीने बाद भी विस्तृत सुनवाई नहीं हुई।
असर: आरक्षण के आधार, नौकरी-शिक्षा में अवसरों पर पड़ सकता है। ऐसी 19 याचिकाएं हैं। आयकर निरीक्षकों की वरिष्ठता (4 साल से लंबित)
हरिहरन बनाम हर्षवर्धन सिंह राव केस में तय करना है कि आयकर निरीक्षकों की वरिष्ठता तारीख से तय होगी या नियुक्ति की तारीख से?
असर: सीधी भर्ती और पदोन्नति से आए निरीक्षकों की वरिष्ठता तय होगी। महिला का संपत्ति पर अधिकार (2 साल से लंबित)
तेजभान बनाम राम किशन केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के तहत महिला को उपहार या वसीयत से मिली संपत्ति पर पूरा मालिकाना हक मिलता है?
असर: महिलाओं के संपत्ति-अधिकार स्पष्ट होंगे। इससे जुड़े तीन अन्य मामले भी हैं। प. बंगाल भूमि सुधार कानून (12 साल से लंबित)
पश्चिम बंगाल राज्य बनाम पश्चिम बंगा बीके समिति केस में सुप्रीम कोर्ट को पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955, 1981 में हुए संशोधनों की वैधता तय करनी है। इससे जुड़े 23 मामले भी लंबित हैं। केरल की उधारी की सीमा (ढाई साल से लंबित)
केरल राज्य बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट केंद्र राज्य के समेकित कोष से ली जाने वाली उधारी की सीमा तय कर सकता है?
असर: केरल की उधारी व केंद्र-राज्य के वित्तीय संबंधों पर। एससी-एसटी आरक्षण (7 साल से लंबित)
मुकेश कुमार बनाम दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड केस में सुप्रीम कोर्ट को एससी और एसटी को आरक्षण से जुड़े अपने फैसले के खिलाफ दायर अर्जी पर सुनवाई करनी है।
असर: सरकारी सेवाओं में आरक्षण लागू करने का तरीका। लोस-विस में आरक्षण (3 साल से लंबित)
इन रे: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 334 से जुड़े केस में सुप्रीम कोर्ट को लोकसभा और विधानसभाओं में एससी-एसटी आरक्षण बढ़ाने वाले 104वें संविधान संशोधन की वैधता और एंग्लो-इंडियन आरक्षण खत्म करने के फैसले पर विचार करना है। आरक्षण बढ़ाने को चुनौती 2000 में दी गई थी। केस 2023 में संविधान पीठ को भेजा गया।
असर: संसद और विधानसभाओं में आरक्षण तथा प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। चुनाव में धर्म का इस्तेमाल (साढ़े 3 साल से लंबित)
अभिराम सिंह बनाम सीडी कॉमकचेन केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि चुनाव में वोट मांगने के लिए धर्म का इस्तेमाल जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत भ्रष्ट आचरण कैसे माना जाए। 2017 में 7 सदस्यीय पीठ के फैसले के बाद बाकी सवाल मई 2023 में पांच सदस्यीय पीठ को भेजे गए।
असर: चुनाव प्रचार में धर्म के इस्तेमाल के नियम स्पष्ट होंगे। सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय पीठें (10 साल से लंबित)
वी. वसंतकुमार बनाम एचसी भाटिया केस में सुप्रीम कोर्ट को अन्य शहरों में अपनी पीठें बनाने और हाई कोर्ट के फैसलों के खिलाफ अपीलें स्वीकार करने के चलन पर विचार करना है।
असर: सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच, अदालत के ढांचे पर। विधायकों की अयोग्यता (10 साल से लंबित)
एसए सम्पथ कुमार बनाम काले यादीह केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के लिए समय-सीमा तय कर सकते हैं?
असर: दल-बदल व विधायकों की अयोग्यता के मुद्दों पर। सैन्य कैंटीन कर्मी की नौकरी (3 साल से लंबित)
भारत सरकार बनाम विनोद कुमार केस में केंद्र ने सेना की कैंटीन में दिहाड़ी कर्मचारी को नियमित करने के फैसले को चुनौती दी है।
असर: अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण से जुड़े सेवा विवादों को प्रभावित कर सकता है। मुस्लिम विवाह-प्रथाएं (साढ़े 8 साल से लंबित)
अश्वनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत सरकार केस में कोर्ट को मुस्लिम मैरिज एक्ट, निकाह हलाला, निकाह मुताह और बहुविवाह की संवैधानिक वैधता पर विचार करना है।
असर: विवाह और इन धार्मिक प्रथाओं से जुड़े कानूनी अधिकारों पर असर संभावित है। मृत्युदंड से पहले सुनवाई (4 साल से लंबित)
मृत्युदंड से पहले दोषी को पक्ष रखने का अवसर केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि मृत्युदंड सुनाने से पहले दोषी को अपनी पृष्ठभूमि, उम्र, शिक्षा, मानसिक स्थिति और सुधार की संभावना बताने का कितना अवसर दिया जाए।
असर: मृत्युदंड से पहले सुनवाई प्रक्रिया साफ होगी। राज्यपाल की सजा माफी शक्ति (6 साल से लंबित)
प्यारे लाल बनाम हरियाणा सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट को राज्यपाल के अनुच्छेद 161 के तहत अधिकार और आजीवन कारावास में छूट से जुड़े सीआरपीसी की धारा 433ए की व्याख्या करनी है।
असर: आजीवन कारावास पाए कैदियों की रिहाई और सजा में छूट के नियम स्पष्ट होंगे। एफसीआई-मिल विवाद (16 साल से लंबित)
भारतीय खाद्य निगम बनाम नव दुर्गा राइस मिल केस धान के आवंटन, प्रसंस्करण समय-सीमा से जुड़े FCI और राइस मिलों के अनुबंधों से जुड़ा है। दिल्ली के प्रशासनिक अधिकार (3 साल से लंबित)
राजधानी क्षेत्र दिल्ली बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि दिल्ली का प्रशासनिक नियंत्रण सरकार के पास होना चाहिए या केंद्र के पास। केंद्र के अध्यादेश को चुनौती दी है।
असर: फैसले का असर दिल्ली सरकार के प्रशासनिक अधिकारों पर पड़ सकता है।
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