यूपी की राजनीति में खलबली! संभल दंगे के आरोपियों पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
उत्तर प्रदेश की राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल दंगा मामले के आरोपियों से जुड़ी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है और मामले को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
दि राइजिंग न्यूज | प्रयागराज | 13 जून 2026
उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित और बेहद संवेदनशील संभल हिंसा मामले में माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत बड़ा, चौकाने वाला और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. उच्च न्यायालय ने शाही जामा मस्जिद के अदालती सर्वेक्षण के दौरान भड़की भीषण हिंसा के बाईस प्रमुख आरोपियों के खिलाफ स्थानीय निचली अदालत में चल रहे आपराधिक मुकदमे की पूरी कार्यवाही पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है. न्यायमूर्ति वाणी रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपियों द्वारा दायर याचिका पर यह अंतरिम आदेश पारित किया है, जिससे प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन को एक बहुत बड़ा कानूनी झटका लगा है. अदालत ने इस पूरे मामले में उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य संबंधित प्रतिवादियों को अपना लिखित जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश जारी किया है तथा इस महा-संग्राम की अगली सुनवाई चार सप्ताह के बाद निर्धारित की है.
दमनकारी पुलिसिया कार्रवाई और मनगढ़ंत प्राथमिकियों पर लगा तगड़ा कानूनी ग्रहण
संभल शहर में चौबीस नवंबर दो हजार चौबीस को ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान अचानक एक भीषण हिंसा और दंगा भड़क उठा था, जिसके तुरंत बाद स्थानीय पुलिस प्रशासन ने दमनकारी रुख अपनाते हुए सैकड़ों लोगों को नामजद कर दिया था. इस घटना के तत्काल बाद कोतवाली थाने में तैनात एक पुलिस उपनिरीक्षक ने अपनी मनगढ़ंत कहानी के आधार पर दंगा भड़काने, राजकार्य में बाधा डालने और लोक व्यवस्था को बिगाड़ने के गंभीर आरोपों में भारी प्राथमिकी दर्ज कराई थी. इस तथाकथित कानूनी कार्रवाई की आड़ में पुलिस ने सुभान सहित बाईस स्थानीय नागरिकों को मुख्य आरोपी बनाकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था. आरोपियों ने इस तानाशाही और एकतरफा कार्रवाई के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा पांच सौ अट्ठाइस के तहत उच्च न्यायालय की शरण ली थी, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पुलिसिया दावों की हवा निकाल दी है.
निचली अदालत के संज्ञान और मनमाने आरोप तय करने वाले आदेशों को दी गई खुली चुनौती
उच्च न्यायालय में दायर इस महत्वपूर्ण याचिका के माध्यम से याचिकाकर्ताओं ने संभल के अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत द्वारा पारित किए गए उन तमाम आदेशों को पूरी तरह से खारिज करने का पुरजोर अनुरोध किया है, जिसके तहत उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा रहा था. आरोपियों ने विशेष रूप से बीस फरवरी दो हजार पच्चीस और पंद्रह मई दो हजार पच्चीस के उन विवादित आदेशों को उच्च न्यायालय में खुली चुनौती दी है, जिनके तहत निचली अदालत ने पुलिस की चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए आनन-फानन में अभियोग तय कर दिए थे. याचिकाकर्ताओं का स्पष्ट रूप से आरोप है कि निचली अदालत ने मामले के जमीनी तथ्यों, परिस्थितियों और सबूतों की कमी पर रत्ती भर भी विचार नहीं किया और राजनीतिक व प्रशासनिक दबाव में आकर यह दमनकारी फैसला सुनाया था, जिसे अब उच्च न्यायालय ने पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया है.
फर्जी वीडियो और बिना किसी ठोस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के फंसाने की साजिश उजागर
अदालत के भीतर हुई बेहद तीखी और मैराथन सुनवाई के दौरान आरोपियों के विद्वान अधिवक्ता ने पुलिसिया तफ्तीश की धज्जियां उड़ाते हुए कई बेहद चौंकाने वाले तर्क पेश किए. अधिवक्ता ने दलील दी कि चौबीस नवंबर दो हजार चौबीस को पुलिस उपनिरीक्षक द्वारा इक्कीस नामजद और आठ सौ से नौ सौ अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कराई गई पूरी की पूरी प्राथमिकी पूरी तरह से झूठे, निराधार और मनगढ़ंत आरोपों पर टिकी हुई है, जिसका एकमात्र उद्देश्य कुछ विशेष नागरिकों को मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित करना है. अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पुलिस ने कुछ कथित तौर पर प्रसारित हुए फर्जी वीडियो के आधार पर इन लोगों के नाम मुकदमे में जोड़ दिए, जबकि पूरी केस डायरी में ऐसा एक भी विश्वसनीय इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे घटना स्थल पर उनकी वास्तविक उपस्थिति या दंगे में उनकी संलिप्तता तनिक भी सिद्ध हो सके.
पूर्व में मिली राहत को आधार मानकर उच्च न्यायालय ने दिया आरोपियों को बड़ा जीवनदान
आरोपियों के कानूनी सलाहकारों ने अदालत के समक्ष यह बेहद मजबूत और अकाट्य तथ्य भी रखा कि इसी समान मामले में उच्च न्यायालय की एक अन्य खंडपीठ ने पूर्व में यानी तेरह मई दो हजार छब्बीस को चार अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ जारी दमनकारी कार्यवाही पर पहले ही रोक लगा दी थी. ऐसे में समानता के सिद्धांत के आधार पर इन बाईस नागरिकों को भी तुरंत राहत मिलनी अत्यंत आवश्यक थी ताकि उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जा सके. दोनों पक्षों की दलीलें और पुलिस की कमजोर कहानी को सुनने के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि प्रथम दृष्टया यह पूरा मामला गहराई से विचार करने योग्य है. अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में साफ कहा कि अगली सुनवाई तक इन सभी बाईस लोगों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जाएगी, जिससे पीड़ित परिवारों ने बड़ी राहत की सांस ली है.