यूपी 69000 शिक्षक भर्ती- सुप्रीम कोर्ट में 3 घंटे सुनवाई:कहा- एक ही बात बार-बार न दोहराएं, सभी पक्षों को सुनेंगे तो केस 5 साल चलेगा
69000 सहायक शिक्षक भर्ती में आरक्षण से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को करीब तीन घंटे सुनवाई हुई। जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं को बार-बार दोहराव से बचने की हिदायत दी। कोर्ट ने कहा कि यदि हर अधिवक्ता एक ही बिंदु को दोहराता रहा और सभी को विस्तार से सुना गया तो मामला पांच साल तक चल सकता है। सुनवाई सुबह 11:45 बजे शुरू हुई और शाम 3:50 बजे तक चली। कोर्ट ने कहा कि वह सभी जरूरी पक्षों को सुनकर राज्य सरकार का पक्ष देखना चाहता है। बेंच ने यह भी कहा कि उसके पास संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार हैं और वह इस पर विचार कर सकती है। ‘आपका मामला हो चुका है, अब पुश न करें’ सुनवाई के दौरान चयनित अभ्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता पुरुषोत्तम शर्मा ने अपनी दलील रखने के लिए कुछ और समय मांगा। इस पर बेंच ने कहा- “आपका मामला हो चुका है, कृपया अब पुश न करें।” अधिवक्ता ने दोबारा अनुरोध किया तो कोर्ट ने कहा कि वर्किंग कैंडिडेट का पक्ष पहले ही सुना जा चुका है। इसके बाद पुरुषोत्तम शर्मा ने लखनऊ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के आदेश, भर्ती में शामिल अभ्यर्थियों की संख्या और चयनित पक्ष के लिए आदेश को सही बताए जाने से जुड़े तर्क रखे। इस पर बेंच ने कहा कि वह अब नया पर्सपेक्टिव सुनने की इच्छुक नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि इसी तरह सुनवाई चलती रही तो मामला जनवरी तक चलता रहेगा। ‘एक ही बात गोल-गोल घुमाकर न कहें’ बेंच ने कहा कि हर अधिवक्ता को अपनी बहस में सिर्फ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर एक ही वकील अपनी दलीलों में बिंदुओं को दोहराता रहेगा और दूसरे अधिवक्ता को बोलने का मौका नहीं मिलेगा तो सभी पक्षों को सुनने में पांच साल लग सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि “हमारे पास अनुच्छेद 142 का अधिकार है, हम उस पर विचार कर सकते हैं। लेकिन पहले कुछ पक्षों को सुनकर राज्य का पक्ष देखना होगा।” बेंच ने कहा कि कोर्ट की भी एक सीमा है और वह इस मामले को ऐसी नजीर नहीं बनाना चाहती, जिसके चलते भविष्य में इसी तरह के मामले सामने आएं। इसलिए मामले की ‘आउटर और इनर लिमिट’ को ध्यान में रखकर सुनवाई की जा रही है। अमित भदौरिया ने भर्ती प्रक्रिया और उत्तर कुंजी पर रखी दलील भोजनावकाश के बाद अधिवक्ता अमित भदौरिया ने अपनी दलील रखी। उन्होंने 69000 शिक्षक भर्ती का विज्ञापन जारी होने से लेकर पूरी चयन प्रक्रिया, परीक्षा और परिणाम तक की जानकारी कोर्ट के सामने रखी। इस दौरान आरक्षित वर्ग की ओर से आपत्ति जताई गई कि अमित भदौरिया रेस्पोंडेंट साइड से हैं, फिर पेटीशनर्स की तरफ से कैसे दलील रख सकते हैं। इस पर अमित भदौरिया ने कहा कि उन्होंने ‘परमिशन टू फाइल’ लिया है और इसी आधार पर उत्तर कुंजी से जुड़ा पक्ष रख रहे हैं। उन्होंने कहा कि लखनऊ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के आदेश में कहा गया है कि जिन अभ्यर्थियों ने ATRE में 65% से कम अंक हासिल किए हैं, उन्हें माइग्रेट नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक चयनित पक्ष भी इसी बात को आधार बना रहा है। ‘आरक्षित वर्ग ने पांच स्तर पर आरक्षण का लाभ लिया’ अमित भदौरिया ने आरक्षित वर्ग को भर्ती प्रक्रिया में मिले लाभों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस वर्ग को पांच स्तर पर छूट का लाभ मिला। उनके मुताबिक इसमें TET, ATRE, आयु सीमा, शिक्षा मित्र के रूप में लाभ और पासिंग मार्क्स में छूट शामिल है। उन्होंने कहा कि फीस में छूट देने पर उन्हें आपत्ति नहीं है, लेकिन अन्य स्तरों पर छूट देने से भर्ती की प्रक्रिया प्रभावित होती है। उन्होंने कोर्ट के सामने यह भी सुझाव रखा कि आरक्षित वर्ग के जो अभ्यर्थी चयन से वंचित रह गए हैं, उनके लिए सुपरन्यूमेरिक पद सृजित किए जा सकते हैं। बहस के दौरान अमित भदौरिया की आवाज ऊंची होने पर बेंच ने टिप्पणी की कि ऊंची आवाज होने पर माइक बंद कर दिया जाता है और यही ध्वनि नियंत्रण का तरीका है। अचयनित अनारक्षित वर्ग ने कहा- छूट की सीमा तय हो अचयनित अनारक्षित वर्ग की ओर से दलील दी गई कि भर्ती में फीस और उम्र में छूट का प्रावधान था, लेकिन इसी के आधार पर TET और ATRE समेत अन्य स्तरों पर भी छूट दी गई, जो उनके अनुसार नियमों के विपरीत है। दलील दी गई कि शासनादेश में ‘आदि’ और ‘इत्यादि’ जैसे शब्दों के आधार पर असीमित छूट नहीं दी जा सकती। छूट की एक स्पष्ट सीमा होनी चाहिए। यह भी कहा गया कि किसी भी स्तर पर छूट लेने वाले अभ्यर्थी को उसी कैटेगरी में रखा जाना चाहिए। लखनऊ हाईकोर्ट की डबल बेंच ने चयर सूची रद्द करने का दिया था निर्णय मामले में 13 अगस्त 2024 को लखनऊ हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 69000 शिक्षक भर्ती की चयन सूची को रद्द कर दिया था। कोर्ट के सामने यह दलील थी कि भर्ती में बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 और आरक्षण नियमावली 1994 के प्रावधानों का पालन नहीं हुआ। दलील के अनुसार OBC वर्ग को निर्धारित 27% की जगह 3.86% और SC वर्ग को 21% की जगह 16.2% आरक्षण दिया गया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मूल चयन सूची तैयार करने का निर्देश दिया था, जिसमें अभ्यर्थियों के गुणांक, कैटेगरी और सब-कैटेगरी समेत पूरा विवरण हो। सरकार के पुराने एफिडेविट से कटऑफ पर भी विवाद राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में पहले दाखिल एफिडेविट में बता चुकी है कि वर्ष 2020 में भर्ती का परिणाम जारी होने के समय अनारक्षित वर्ग की कटऑफ 67.11 थी, जो संशोधित सूची के बाद 69.46 हो गई। वहीं OBC की कटऑफ 66.73 से घटकर 65.92 बताई गई है। विवादित पक्षों की ओर से सवाल उठाया जा रहा है कि जब कटऑफ में बदलाव का विवरण एफिडेविट में दिया गया है तो मूल चयन सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही। 69000 सहायक शिक्षक भर्ती बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 और आरक्षण नियमावली 1994 के तहत हुई थी। भर्ती का विज्ञापन प्रदेश स्तर से जारी हुआ था। आवेदन, कटऑफ निर्धारण, परीक्षा और परिणाम की प्रक्रिया भी प्रदेश स्तर पर हुई, जबकि अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के लिए जिलावार सूची भेजी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
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