सर्दी से पहले ही 131 शहरों की हवा प्रदूषित, दिल्ली-एनसीआर में बढ़ा खतरा

सर्दियों से पहले देश के 254 निगरानी वाले शहरों में से 131 की वायु गुणवत्ता मध्यम से बेहद खराब श्रेणी में पहुंच गई है। हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक है। पराली जलाने, वाहनों के धुएं और मौसम में बदलाव के कारण आने वाले दिनों में हालात बिगड़ने की आशंका है।

Oct 23, 2026 - 17:45
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सर्दी से पहले ही 131 शहरों की हवा प्रदूषित, दिल्ली-एनसीआर में बढ़ा खतरा

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026

देश में सर्दियों ने अभी पूरी तरह दस्तक भी नहीं दी है, लेकिन कई शहरों की हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा है। हालात ऐसे हैं कि बड़ी संख्या में शहरों में लोगों के लिए स्वच्छ हवा में सांस लेना चुनौती बनता जा रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश के आधे से अधिक निगरानी वाले शहरों में वायु गुणवत्ता अच्छी स्थिति में नहीं है। दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के साथ हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में प्रदूषण का असर स्पष्ट दिखाई देने लगा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब सर्दी की शुरुआत में ही हवा इतनी प्रदूषित है, तो आने वाले हफ्तों में लोगों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

254 शहरों में से 131 की हवा प्रदूषित

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 22 अक्टूबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, देश के 254 निगरानी वाले शहरों में से केवल 25 शहरों में वायु गुणवत्ता अच्छी श्रेणी में दर्ज की गई। वहीं, 98 शहरों की हवा संतोषजनक, 111 शहरों की मध्यम, 17 शहरों की खराब और तीन शहरों की बेहद खराब श्रेणी में रही। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में शहरों में वायु प्रदूषण लोगों की चिंता बढ़ा रहा है। सर्दियों में प्रदूषक कणों के वातावरण में अधिक समय तक बने रहने की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं।

हरियाणा और उत्तर प्रदेश के शहरों में प्रदूषण का गंभीर स्तर

प्रदूषण के ताजा आंकड़ों में हरियाणा के पंचगांव की स्थिति सबसे चिंताजनक रही, जहां वायु गुणवत्ता सूचकांक 378 दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश के बड़ौत और हापुड़ में भी यह सूचकांक 328 तक पहुंच गया, जो बेहद खराब स्थिति को दर्शाता है। ऐसे स्तर पर हवा में मौजूद प्रदूषक कण लोगों की सेहत पर गंभीर असर डाल सकते हैं। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी परेशानियों से जूझ रहे लोगों को अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। इन शहरों में प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए स्थानीय स्तर पर प्रभावी कदम उठाना जरूरी हो गया है।

दिल्ली की हवा भी खराब श्रेणी में पहुंची

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी वायु प्रदूषण लगातार चिंता बढ़ा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 20 अक्टूबर को दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 179 था, जो मध्यम श्रेणी में आता है। अगले दिन 21 अक्टूबर की दोपहर तक यह बढ़कर 244 हो गया, यानी लगभग 24 घंटे में 65 अंकों की वृद्धि दर्ज की गई। 22 अक्टूबर को इसमें कुछ गिरावट आई और यह 223 पर पहुंचा, लेकिन हवा की गुणवत्ता खराब श्रेणी में बनी रही। इससे स्पष्ट है कि राजधानी में प्रदूषण का स्तर तेजी से बदल रहा है और आने वाले दिनों में स्थिति पर लगातार नजर रखने की जरूरत होगी।

दिल्ली-एनसीआर में सूक्ष्म कण बढ़ा रहे स्वास्थ्य संबंधी खतरा

दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा के भीतर मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक कण भी चिंता का बड़ा कारण बने हुए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, आनंद विहार में बड़े कणों वाले प्रदूषक पदार्थों का स्तर 488 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जबकि पंजाबी बाग में अत्यंत सूक्ष्म कणों का स्तर 305 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया। ये कण सांस के जरिए शरीर के भीतर पहुंच सकते हैं और फेफड़ों सहित हृदय तथा श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से खांसी, सांस लेने में परेशानी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई शहर प्रदूषण की चपेट में

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, क्षेत्र के नौ शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक 200 से अधिक दर्ज किया गया। इनमें हापुड़, बड़ौत, बागपत, मेरठ और नोएडा जैसे शहर शामिल हैं। दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आसपास स्थित होने और विभिन्न स्थानीय स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषण के कारण इस पूरे इलाके में हवा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। यदि समय रहते प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो सर्दियों के दौरान लोगों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए पहले चरण की पाबंदियां लागू

दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा की गुणवत्ता खराब होने के बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने प्रदूषण नियंत्रण योजना के पहले चरण को लागू कर दिया है। इस योजना के अंतर्गत वायु गुणवत्ता सूचकांक के स्तर के अनुसार प्रदूषण कम करने के लिए अलग-अलग उपाय किए जाते हैं। इसका उद्देश्य धूल, वाहनों से निकलने वाले धुएं और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों पर नियंत्रण रखना है। हालांकि, इन उपायों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित विभाग नियमों का पालन कितनी सख्ती से कराते हैं। साथ ही, प्रदूषण के स्थानीय और क्षेत्रीय स्रोतों पर एक साथ कार्रवाई करना भी जरूरी है।

पराली जलाना प्रदूषण बढ़ने की प्रमुख वजह

सर्दियों से पहले उत्तर भारत में वायु प्रदूषण बढ़ने के पीछे पराली जलाना एक प्रमुख कारण माना जाता है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में धान की कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों को जलाने की घटनाएं अक्टूबर और नवंबर के दौरान बढ़ सकती हैं। इससे निकलने वाला धुआं हवा में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ाता है और मौसम की अनुकूल परिस्थितियों में आसपास के इलाकों तक फैल सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक समय दिल्ली के सूक्ष्म कणों वाले प्रदूषण में पराली जलाने की हिस्सेदारी लगभग चार प्रतिशत थी। आने वाले हफ्तों में इसका प्रभाव बढ़ने की आशंका जताई गई है, इसलिए किसानों को पराली के वैकल्पिक निपटान के लिए पर्याप्त सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।

वाहनों का धुआं भी प्रदूषण का बड़ा कारण

वायु प्रदूषण के लिए केवल पराली जलाने को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सड़कों पर चलने वाले वाहनों से निकलने वाला धुआं भी शहरों की हवा को लगातार प्रदूषित करता है। उपलब्ध जानकारी में पर्यावरण संबंधी एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया गया है कि पराली जलाने का दौर समाप्त होने के बाद भी दिसंबर में सूक्ष्म कणों का स्तर कम नहीं हुआ था। इससे संकेत मिलता है कि वाहनों और दूसरे स्थानीय स्रोतों से होने वाला उत्सर्जन लंबे समय तक प्रदूषण बढ़ा सकता है। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना, वाहनों के उत्सर्जन पर नियंत्रण रखना और यातायात प्रबंधन में सुधार करना इस समस्या को कम करने के महत्वपूर्ण उपाय हो सकते हैं।

मौसम में बदलाव से हवा में जमा रहते हैं प्रदूषक कण

मानसून के बाद मौसम में होने वाला बदलाव भी प्रदूषण की समस्या को गंभीर बना सकता है। तापमान गिरने, हवा की गति कम होने और वातावरण की कुछ परिस्थितियों के कारण प्रदूषक कण जमीन के नजदीक अधिक समय तक जमा रह सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप कई इलाकों में धुंध जैसी परत दिखाई देने लगती है और हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है। सर्दियों के दौरान यह समस्या अधिक गंभीर हो सकती है, क्योंकि प्रदूषण फैलाने वाले कण आसानी से दूर नहीं जा पाते। इसलिए प्रदूषण नियंत्रण के उपायों के साथ मौसम के पूर्वानुमान और वायु गुणवत्ता के आंकड़ों पर भी लगातार निगरानी जरूरी है।

पटाखे, निर्माण कार्य और कचरा जलाने से भी बढ़ता है प्रदूषण

पराली और वाहनों के अलावा पटाखों का धुआं, सड़कों पर उड़ने वाली धूल, निर्माण कार्यों से निकलने वाले कण और खुले में कचरा जलाने की घटनाएं भी हवा को प्रदूषित करती हैं। त्योहारों के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं पहले से प्रदूषित वातावरण की स्थिति को और बिगाड़ सकता है। वहीं, निर्माण स्थलों पर धूल को नियंत्रित करने के उपाय नहीं अपनाए जाने से आसपास के इलाकों में प्रदूषण बढ़ता है। खुले में कचरा जलाने से भी हानिकारक पदार्थ वातावरण में फैलते हैं। इन सभी स्रोतों पर प्रभावी निगरानी और नियमों का सख्ती से पालन कराना जरूरी है।

सर्दियों में कितनी बढ़ सकती हैं लोगों की मुश्किलें

सर्दियों में यदि पराली जलाने की घटनाएं बढ़ती हैं और वाहनों तथा निर्माण कार्यों से होने वाला प्रदूषण नियंत्रित नहीं किया जाता, तो कई शहरों में वायु गुणवत्ता और खराब हो सकती है। इसका असर विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और सांस या हृदय संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर पड़ सकता है। प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहने से आंखों में जलन, खांसी, सांस फूलने और फेफड़ों से जुड़ी परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में लोगों को स्थानीय वायु गुणवत्ता की जानकारी लेते रहना चाहिए और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। वहीं, सरकारों और संबंधित विभागों के लिए प्रदूषण के सभी प्रमुख स्रोतों पर समय रहते कार्रवाई करना जरूरी है।

क्या सरकारें प्रदूषण रोकने के लिए ठोस कदम उठाएंगी

देश के 131 शहरों में मध्यम से बेहद खराब वायु गुणवत्ता दर्ज होना इस बात की ओर संकेत करता है कि प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को और प्रभावी बनाने की जरूरत है। केवल आपातकालीन पाबंदियां लागू करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। पराली के प्रबंधन, वाहनों से निकलने वाले धुएं पर नियंत्रण, निर्माण स्थलों पर धूल रोकने और खुले में कचरा जलाने के खिलाफ लगातार कार्रवाई जरूरी है। इसके साथ ही, राज्यों के बीच समन्वय और प्रदूषण के आंकड़ों की नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि संबंधित सरकारें सर्दियों के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए कितनी तेजी और गंभीरता से कदम उठाती हैं।

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