अब एआई बताएगा खेतों का भविष्य
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडल विकसित किया है, जो उपग्रह डेटा, मौसम संबंधी जानकारी और पुराने कृषि रिकॉर्ड के आधार पर फसलों की संभावित पैदावार का सटीक अनुमान लगाने में सक्षम है। यह तकनीक किसानों, सरकार और कृषि संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 29 जून 2026
एआई से खेती में नई क्रांति
कृषि क्षेत्र में तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉडल विकसित किया है, जो किसानों को पहले ही फसल की पैदावार का सटीक अनुमान उपलब्ध करा सकता है। यह मॉडल उपग्रह चित्रों, मौसम संबंधी आंकड़ों और पुराने कृषि रिकॉर्ड का विश्लेषण करके संभावित उत्पादन की जानकारी देता है।
उपग्रह डेटा से करेगा विश्लेषण
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग विभाग की शोध टीम द्वारा तैयार किया गया यह मॉडल यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 और सेंटिनल-2 उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग करता है। इन आंकड़ों के माध्यम से खेतों की स्थिति, फसलों की वृद्धि, मिट्टी में नमी की मात्रा और पौधों के स्वास्थ्य का आकलन किया जाता है।इसके साथ ही वर्षा, तापमान और पूर्व वर्षों के उत्पादन रिकॉर्ड को जोड़कर एआई मॉडल फसल उत्पादन का अनुमान तैयार करता है। इससे खेती से जुड़े निर्णय अधिक वैज्ञानिक और सटीक बन सकते हैं।
पुराने तरीकों से अधिक प्रभावी
फसल उत्पादन का अनुमान लगाने के लिए पहले बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण और मैदानी निरीक्षण किए जाते थे, जिनमें समय और संसाधनों की अधिक आवश्यकता होती थी। वैज्ञानिकों के अनुसार यह नया मॉडल कम समय में बड़े क्षेत्र का विश्लेषण कर सकता है और अधिक सटीक परिणाम प्रदान करता है।पंजाब के लुधियाना जिले में वर्ष 2019 से 2023 तक के आंकड़ों पर किए गए परीक्षण में इस मॉडल ने धान, मक्का, मूंग और गन्ने जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन अनुमान में बेहतर प्रदर्शन किया। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह मॉडल रैंडम फॉरेस्ट और एलएसटीएम जैसे पुराने मॉडलों की तुलना में अधिक प्रभावी साबित हुआ है।
किसानों को होंगे कई लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को पहले से फसल उत्पादन का अनुमान मिल जाए तो वे बीज, उर्वरक, सिंचाई और अन्य संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कर सकेंगे। इससे लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिलेगी।इसके अलावा सरकार को भी फसल बीमा योजनाओं, कृषि बाजार प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी रणनीतियों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी। यह तकनीक खेती से जुड़े जोखिमों को कम करने और किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कम संसाधनों में बेहतर परिणाम
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस एआई मॉडल को इस प्रकार विकसित किया गया है कि इसे चलाने के लिए अपेक्षाकृत कम कंप्यूटिंग संसाधनों की आवश्यकता होती है। यह पारंपरिक ट्रांसफॉर्मर मॉडल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत कम पैरामीटर का उपयोग करता है, जिससे बड़े स्तर पर कृषि निगरानी करना आसान हो जाता है।
रियल टाइम जानकारी की तैयारी
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी की शोध टीम अब इस तकनीक को क्लाउड आधारित प्लेटफॉर्म से जोड़ने पर काम कर रही है। इसके माध्यम से किसानों और कृषि संस्थानों को लगभग वास्तविक समय में फसलों की स्थिति और संभावित उत्पादन की जानकारी उपलब्ध कराई जा सकेगी। कृषि क्षेत्र में एआई और उपग्रह तकनीक का यह संयोजन भविष्य में खेती को अधिक आधुनिक, सटीक और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।