यूरिया से दूरी बढ़ा रहे किसान

भारत में खादों के उपयोग का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। किसान अब केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित पोषण देने वाले एनपीके खादों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे मिट्टी की सेहत सुधारने और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

यूरिया से दूरी बढ़ा रहे किसान

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 11 जून 2026

खादों के इस्तेमाल में बड़ा बदलाव

भारत में खादों की खपत का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। लंबे समय तक खेती में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले यूरिया की तुलना में अब संतुलित पोषण देने वाले एनपीके खादों की मांग बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और कृषि उत्पादन बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

एनपीके खादों की मांग में तेज उछाल

हालिया आंकड़ों के अनुसार मई महीने में यूरिया और डीएपी की खपत नियंत्रित रही और पिछले वर्ष की तुलना में गिरावट भी दर्ज की गई। इसके विपरीत कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर यानी एनपीके खादों की बिक्री में लगभग 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। इससे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि किसान अब संतुलित पोषण वाली खादों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

मिट्टी की सेहत सुधारने पर जोर

कई दशकों तक खेती में यूरिया के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई। लगातार नाइट्रोजन आधारित खादों के प्रयोग से भूमि की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ा। इसी समस्या को देखते हुए सरकार ने किसानों को संतुलित खाद उपयोग के लिए जागरूक करने की पहल शुरू की है।

सॉइल हेल्थ कार्ड योजना का असर

सॉइल हेल्थ कार्ड योजना के माध्यम से किसानों को उनकी जमीन की स्थिति के अनुसार खादों के उपयोग की सलाह दी जा रही है। इससे किसानों में यह समझ विकसित हुई है कि केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग भी आवश्यक है।

बागवानी और नकदी फसलों ने बढ़ाई मांग

देश में बागवानी, सब्जियों और नकदी फसलों का क्षेत्र बढ़ रहा है। इन फसलों को केवल नाइट्रोजन ही नहीं बल्कि फॉस्फोरस और पोटाश की भी आवश्यकता होती है। यही कारण है कि एनपीके आधारित खादों की मांग लगातार बढ़ रही है और किसान बेहतर उत्पादन के लिए इनका उपयोग कर रहे हैं।

सरकारी योजनाओं से मिला प्रोत्साहन

न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी योजना के तहत फॉस्फेट और पोटाश आधारित खादों पर सहायता दी जाती है। इसके अलावा पीएम प्रणाम जैसी योजनाओं के जरिए रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग को कम करने और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।

घरेलू उत्पादन भी बढ़ा

पिछले एक दशक में भारत में फॉस्फेट और पोटाश आधारित खादों का घरेलू उत्पादन 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। मांग को पूरा करने के लिए बड़े स्तर पर आयात भी किया जा रहा है ताकि किसानों को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध हो सकें।

कृषि क्षेत्र में सकारात्मक संकेत

विशेषज्ञों का मानना है कि यूरिया आधारित खेती से संतुलित पोषण आधारित खेती की ओर बढ़ता रुझान भारतीय कृषि के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे मिट्टी की सेहत बेहतर होगी, उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और किसानों को लंबे समय में अधिक लाभ मिलने की संभावना है।