अखिलेश की PDA रणनीति में क्यों ‘अनफिट’ हुए स्वामी प्रसाद:रामचरितमानस से लेकर डिंपल पर टिप्पणी की; विवादित बयानों के पीछे का पूरा सच
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नेताओं के पाला बदलने का खेल कोई नया नहीं है। लेकिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव और स्वामी प्रसाद मौर्य के बीच रिश्तों की कड़वाहट अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां से वापसी के रास्ते पूरी तरह बंद दिखाई देते हैं। अखिलेश यादव ने हाल ही में स्वामी प्रसाद के लिए पार्टी और गठबंधन के दरवाजे हमेशा के लिए बंद करने के संकेत दे दिए। अखिलेश का कहना है- स्वामी प्रसाद मौर्य अब उनके गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। लगभग 45 साल का राजनीतिक सफर तय करने वाले स्वामी प्रसाद अब भले ही कांग्रेस की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हों। लेकिन, सपा की चुनावी धुरी ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और अखिलेश की व्यक्तिगत नाराजगी के चलते वे इस समीकरण में पूरी तरह 'अनफिट' साबित होते दिख रहे हैं। दोनों बड़े नेताओं के बीच बने इस राजनीतिक तनाव और रिश्ते टूटने के पीछे 3 कारण सामने आए हैं- अखिलेश 'पॉलिटिकल अनफिट' और गुंडाराज के समर्थक 2024 के आम चुनावों के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व पर सबसे ज्यादा आक्रामक दिखाई दिए। उन्होंने एक पॉडकास्ट में अखिलेश पर तीखा हमला बोला था। जब उनसे पूछा गया कि भारतीय राजनीति में ऐसा कौन-सा प्रमुख चेहरा है, जो राजनीति में बिल्कुल फिट नहीं बैठता? तब स्वामी प्रसाद ने बिना झिझक अखिलेश यादव का नाम लिया था। उन्होंने दावा किया कि अखिलेश के हाव-भाव और फैसलों से साफ लगता है कि वे गलत फील्ड में आ गए हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपनी आक्रामकता यहीं नहीं रोकी। उन्होंने अखिलेश यादव की राजनीतिक विचारधारा पर सवाल उठाते हुए कहा था- अखिलेश यादव पूरी तरह कन्फ्यूज्ड नेता हैं। वे न तो लोहियावादी हैं और न ही सच्चे अर्थों में समाजवादी। बड़े दुख की बात है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेटे होने के बावजूद 'मुलायमवादी' भी नहीं बन पाए। वे बना-बनाया राजनीतिक गेम बिगाड़ने में माहिर हैं। आजकल वे सिर्फ ब्राह्मण वर्ग को खुश करने में लगे हैं, क्योंकि किसी ब्राह्मण ने उनके मुख्यमंत्री बनने की भविष्यवाणी कर दी है। सच तो यह है कि अखिलेश यादव ‘गुंडाराज’ के पक्षधर हैं। PDA के 'D' का मतलब 'डिंपल', व्यक्तिगत तंज से बिगड़ी बात यूपी के राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि अखिलेश अपने ऊपर होने वाले राजनीतिक हमलों को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन, जब बात उनके परिवार, पत्नी या बच्चों पर आती है, तो वे इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करते। 2 फरवरी, 2026 को लखीमपुर खीरी जिले में हुई 'संविधान सम्मान और जनहित हुंकार यात्रा' के दौरान स्वामी प्रसाद ने अखिलेश के सबसे बड़े राजनीतिक कार्ड 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) पर सीधा तंज कसा था। स्वामी ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि अखिलेश का PDA फॉर्मूला खुद उन्हें ही क्लियर नहीं है। इसमें 'D' का मतलब मौका देखकर कभी ‘दलित’, तो कभी 'डिंपल' हो जाता है। उन्होंने आरोप लगाया था कि अखिलेश कभी भी पिछड़े और दलितों के मुद्दों पर खुलकर बात नहीं करते। वे कभी 'P' से पिछड़ा कहते हैं, कभी पंडित कहते हैं। कभी कहते हैं कि जो पीड़ित है, वही PDA है। इससे पहले 20 फरवरी, 2024 को जब स्वामी प्रसाद ने सपा और एमएलसी पद से इस्तीफा दिया था, तब भी उन्होंने यही कहा था कि अखिलेश ने खुद अपने फैसलों से PDA की हवा निकाल दी है। सपा को कमजोर करने के लिए कोई बाहरी नहीं, बल्कि पार्टी के मुखिया खुद जिम्मेदार हैं। हिंदू धर्म, रामचरितमानस और देवी-देवताओं पर लगातार विवादित टिप्पणियां 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक स्वामी प्रसाद मौर्य ने धार्मिक मुद्दों पर ज्यादा बयानबाजी नहीं की थी। लेकिन कुशीनगर की फाजिलनगर सीट से खुद चुनाव हारने के बाद उनकी बयानबाजी का तरीका पूरी तरह बदल गया। चुनाव हारने के तुरंत बाद उन्होंने बयान दिया- “दुनिया में सबसे पुराना धर्म बौद्ध धर्म है। उसके बाद ईसाई और फिर इस्लाम धर्म अस्तित्व में आया।” इस बयान में उन्होंने जानबूझकर हिंदू धर्म का कोई जिक्र नहीं किया। इसके बाद 2023 में वे जहां भी गए, हिंदू मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों की आलोचना करते रहे। स्वामी प्रसाद मौर्य के 4 सबसे विवादित बयान जिन्होंने बवंडर खड़ा किया- 'बयान निजी कैसे', इसी बात पर सपा छोड़ी स्वामी प्रसाद की इस लगातार बयानबाजी के कारण सपा राजनीतिक असहजता का सामना कर रही थी। जब भी सपा के प्रवक्ता टीवी डिबेट्स में हिंदुत्व, विकास या रोजगार पर भाजपा को घेरने की कोशिश करते, तो भाजपा नेता तुरंत स्वामी प्रसाद के बयानों को उछालकर सपा को कटघरे में खड़ा कर देते थे। धीरे-धीरे खुद सपा के अंदर स्वामी प्रसाद के खिलाफ असंतोष पनपने लगा। रायबरेली में एक कार्यक्रम के दौरान एक युवक ने स्वामी को थप्पड़ तक मार दिया था। दो अलग-अलग मौकों पर उन पर जूते फेंके गए। जब मीडिया ने अखिलेश यादव से स्वामी के बयानों पर सवाल पूछे, तो उन्होंने मौर्य के बयानों को पार्टी का स्टैंड न मानकर उनका 'निजी बयान' करार दे दिया। अखिलेश का यह रुख स्वामी प्रसाद मौर्य को नागवार गुजरा। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा- जब मैं पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव हूं, तो मेरे बयान 'निजी' कैसे हो सकते हैं? इसके बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। अखिलेश यादव ने बिना किसी मान-मनौव्वल के तुरंत उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया और सपा के दरवाजे उनके लिए हमेशा के लिए बंद हो गए। बड़बोलेपन ने चौपट किया सियासी करियर लखनऊ के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार राजकुमार सिंह के अनुसार, स्वामी प्रसाद मौर्य का यह बड़बोलापन और विवादित बयानबाजी कोई नई बात नहीं है। यह बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल से ही चली आ रही है। तब राज्य में मायावती की मजबूत सरकार थी, इसलिए उनके खिलाफ खुलकर माहौल नहीं बन पाता था। 2017 में जब वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए, तब उनके बयानों पर थोड़ा अंकुश जरूर लगा। लेकिन 2022 में समाजवादी पार्टी में आने और चुनाव हारने के बाद उनका राजनीतिक हताशा खुलकर बाहर आने लगा। अपनी अनियंत्रित भाषा और बयानों की वजह से वे न सिर्फ खुद फाजिलनगर से चुनाव हारे, बल्कि भाजपा में सांसद रही अपनी बेटी संघमित्रा मौर्य के राजनीतिक करियर को भी भारी नुकसान पहुंचाया। अंदेशा- बार्गेनिंग पावर बढ़ाने के लिए कांग्रेस स्वामी को लाई अब उन्हें कांग्रेस में थोड़ी उम्मीद दिख रही है, इसलिए वे वहां चले गए हैं। लेकिन अखिलेश यादव और उनके परिवार पर जिस तरह के व्यक्तिगत हमले उन्होंने किए हैं, उसके बाद अखिलेश उन्हें कभी वापस अपने साथ नहीं लेंगे। डिंपल यादव पर टिप्पणी करके स्वामी प्रसाद ने बातचीत के सारे दरवाजे खुद अपने हाथों से बंद कर लिए हैं। आगामी चुनावों से पहले ऐसे साफ संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी बार्गेनिंग पावर बढ़ाने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य को साथ लाई है। हालांकि, स्वामी के लगातार आ रहे बयानों पर कांग्रेस भी बचती नजर आ रही है। उसके प्रदेश प्रभारी रामजी लाल ने भी उनके बयानों को 'निजी' बता दिया है। स्वामी प्रसाद पिछले साढ़े चार दशकों से उत्तर प्रदेश की सत्ता और विपक्ष की राजनीति में एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। हालांकि, पिछले 5 सालों में उनका राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड पूरी तरह से उथल-पुथल भरा रहा है- ---------------------------- यह खबर भी पढ़ें - भाजपा से कम सीटें जीतकर भी सपा ने कैसे चौंकाया, MLC चुनाव का वोटिंग पैटर्न 2027 विधानसभा में भी रहा तो किसे नुकसान उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव में भाजपा से 1 सीट कम जीतकर भी सपा ने सबको चौंका दिया। इसकी वजह स्नातक खंड सीटों के नतीजों में छिपा है। इसमें सपा ने 5 में से 3 सीटें जीत लीं। शिक्षक खंड के प्रत्याशियों को सिर्फ शिक्षक चुनते हैं, लेकिन स्नातक खंड के चुनाव में युवा वोटरों की अहम भूमिका होती है। चुनाव नतीजों से संकेत मिल रहे हैं कि युवा वोटरों की पसंद बदल रही है। पढ़िए पूरी खबर…
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