भाजपा से अयोध्या मंदिर का मुद्दा छीनेगी सपा:केदारेश्वर में पूजा के बाद रामलला के दर्शन करेंगे अखिलेश; 2027 के लिए सनातन की तरफ चले
अखिलेश यादव यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अयोध्या जाकर राम मंदिर में दर्शन करेंगे। इससे पहले इटावा के केदारेश्वर मंदिर में भगवान शिव की पूजा करेंगे। दोनों धार्मिक कार्यक्रम दिवाली के बाद नवंबर में होंगे। ये सनातन आस्था के लिए है या सियासी फायदे के लिए? इसे समझने के लिए हमें 2024 के लोकसभा चुनाव पर जाना होगा। फरवरी- 2024 में नेपाल से लाई गई शालिग्राम शिला लखनऊ में सपा कार्यालय पहुंची थी। यहां अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल ने वैदिक रीति-रिवाज से पूजा की थी। बाद में इस शिला को इटावा ले जाया गया और केदारेश्वर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया गया। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को 15.64% वोट शेयर का फायदा हुआ। 2014 और 2019 में पांच-पांच सीटें जीतने वाली सपा 2024 में सीधे 37 सीटों पर पहुंच गई। अखिलेश अब समझ रहे हैं कि सिर्फ PDA (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) के सहारे चुनाव जीतना संभव नहीं है। सवर्णों का साथ भी चाहिए। यही वजह है कि उनकी राजनीति में धार्मिक रंग पहले से ज्यादा नजर आने लगा है। कभी वह शंकराचार्य और संतों से आशीर्वाद लेते दिखते हैं, तो कभी ब्राह्मण सम्मेलन करते हैं। इसके अलावा पीले कपड़ों में त्रिशूल, डमरू और चक्र के साथ उनकी तस्वीरें भी सामने आ चुकी हैंं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा की बदली हुई राजनीतिक रणनीति पर रिपोर्ट पढ़िए… सपा की राजनीति लंबे समय तक M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण तक सिमटी रही। 2024 लोकसभा चुनाव ने सपा को अपना आधार बढ़ाने का मौका दिया। पहली बार अति-पिछड़े वर्गों के साथ दलितों का भी सपा को समर्थन मिला। अब अखिलेश 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इस आधार को सवर्णों तक बढ़ाना चाहते हैं। उनके फोकस में ब्राह्मण समाज है, जिसकी आबादी प्रदेश में लगभग 12% है। पिछले 4 चुनावों में ब्राह्मण समाज भाजपा के कोर वोटर रहे हैं। अखिलेश इसके साथ सपा पर लगे सनातन विरोध का दाग भी धोना चाहते हैं। यही वजह है कि 2024 के बाद से उनके आचरण में सॉफ्ट हिंदुत्व की झलक दिखने लगी है। अब सपा पार्टी की गतिविधियों में ब्राह्मणों, संतों और धार्मिक आयोजनों की संख्या बढ़ती दिखेगी। पार्टी ने अयोध्या से तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय को प्रत्याशी घोषित किया है। ब्राह्मण सम्मेलन में अखिलेश ने उनकी उम्मीदवारी का ऐलान किया था। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर तैनाती की बात आई, तो उन्होंने पूर्वांचल से आने वाले ब्राह्मण नेता माता प्रसाद पांडेय को चुना। 5 अगस्त को उन्होंने जनेश्वर मिश्र की जयंती पर प्रबुद्ध वर्ग से जुड़े कार्यक्रम कराए। अखिलेश संदेश देना चाहते हैं कि PDA में सामाजिक न्याय के साथ अगड़े वर्गों, खासकर ब्राह्मणों के लिए भी जगह है। श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता का संदर्भ देकर वे खुद सामाजिक बराबरी और सम्मान की बात कर चुके हैं। अखिलेश क्यों सनातन विरोधी होने की छवि तोड़ना चाहते हैं वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- सपा का यूपी में जिस भाजपा से मुकाबला है, उसकी पूरी राजनीति ही हिंदुत्व के इर्द-गिर्द चलती है। उसकी सफलता सामाजिक ध्रुवीकरण पर टिकी रहती है। इसमें वह विकास का छाैंक लगाकर अपना आधार वोटबैंक बढ़ाती रही है। यही वजह है कि सपा को अपनी पुरानी छवि बदलनी पड़ रही है। मुस्लिम उनके साथ आज भी मजबूती से खड़ा है, लेकिन अखिलेश खुद को मुस्लिम हितैषी की तरह नहीं दिखना चाहते हैं। अखिलेश की असली परीक्षा 3 मोर्चों पर होगी केदारेश्वर मंदिर लोकार्पण से अखिलेश तोड़ेंगे सनातन विरोधी छवि अखिलेश ने सनातन विरोधी होने की छवि तोड़ने का प्रयास 2024 लोकसभा में जीत के बाद से शुरू कर दिया था। इसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रयागराज में हुए महाकुंभ में डुबकी लगाने से दे चुके हैं। जबकि उनके महागठबंधन के साथी राहुल और प्रियंका सहित अन्य प्रमुख नेताओं ने इससे पूरे समय दूरी बनाए रखी। फिर जब शंकराचार्य के अपमान का मामला सामने आया तो तुरंत उसे लपक लिया। उन्होंने शंकराचार्य से बात कर उनके सम्मान में साथ खड़े होने की बात कही। बाद में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से पहले उनकी पत्नी डिंपल यादव और बाद में वे खुद मुलाकात करने पहुंचे। शंकराचार्य जब भी लखनऊ आए, वो उनका आशीर्वाद लेते दिखे। अब यूपी 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश इटावा में बने केदारेश्वर महादेव मंदिर का भव्य लोकार्पण करने की तैयारी में हैं। इसके बाद वे अयोध्या में श्रीराम मंदिर में दर्शन करने भी जाएंगे। बता दें, अखिलेश इसी महीने 8 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचे थे। सपा नेता नेता पवन पांडेय के घर में हुई श्रीमद्भागवत कथा में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने कहा था कि मैं इटावा में केदारेश्वर धाम बन जाने के बाद ही राम मंदिर जाऊंगा। संकल्प बार-बार नहीं लिया जाता। राजनीतिक जानकार बोले- ये अखिलेश का “नियो-सोशलिज्म” वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं कि भाजपा ने राम मंदिर को अपनी राजनीति का बड़ा मुद्दा बनाया है। ऐसे में सपा के सामने चुनौती है कि वह पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को साथ रखते हुए हिंदू धर्म से दूरी के आरोपों का जवाब कैसे दे? उनके मुताबिक, भाजपा के हिंदुत्व को उसी के मैदान में चुनौती देने के लिए सपा राम मंदिर में चंदा चोरी जैसे मुद्दों पर सवाल उठाती रही है। इसके साथ ही पार्टी मंदिर निर्माण, संतों से मुलाकात, पीले वस्त्र पहनने और हनुमान चालीसा जैसे धार्मिक प्रतीकों से हिंदू मतदाताओं को भरोसा दिलाने में जुटी है कि वह सनातन धर्म के खिलाफ नहीं है। अखिलेश यादव का विश्वकर्मा मंदिर बनवाने का वादा, गोवंश से जुड़ी योजनाएं, दलित संतों के साथ बैठक इसी का हिस्सा है। साथ ही ‘समाजवाद ही रामराज्य है’ और ‘जो सनातन है, वही समाजवाद’ जैसे बयान इसी कोशिश का हिस्सा माने जा रहे हैं। हालांकि, भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति को चुनौती देना और उसके समर्थक मतदाताओं को अपने साथ जोड़ना दो अलग बातें हैं। धार्मिक गतिविधियों से अखिलेश की छवि में बदलाव आ सकता है। लेकिन इसका चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह मतदाताओं की सोच पर निर्भर करेगा। वे इन कदमों को सच्ची धार्मिक आस्था मानते हैं या चुनाव से पहले की राजनीतिक कोशिश, यही सबसे अहम होगा। शिव स्थापना के बाद श्रीराम दर्शन करने की क्या कोई धार्मिक मान्यता है… अखिलेश के इस संकल्प को समझने के लिए हमें शिव और राम के संबंध से जुड़ी धार्मिक परंपरा को समझना होगा। रामचरितमानस में भगवान राम कहते हैं- शिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर मोहि सपनेहुं नहि भावा॥ इसका अर्थ है शिव से द्वेष रखने वाला व्यक्ति राम का भक्त कहलाने योग्य नहीं है। धार्मिक मान्यताओं में भगवान राम और शिव की भक्ति को एक-दूसरे के प्रति श्रद्धा और समन्वय का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि लंका की ओर प्रस्थान से पहले भगवान राम ने शिव की आराधना की थी। रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। नंदी की स्थापना कैसे मंदिर बनाने तक पहुंची इटावा जिले में लायन सफारी के सामने शीतलपुर गांव में तैयार केदारेश्वर महादेव मंदिर पहली नजर में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की याद दिलाता है। करीब 11 एकड़ क्षेत्र में विकसित हो रही इस परियोजना की शुरुआत काले ग्रेनाइट से तैयार नंदी की एक विशाल प्रतिमा से हुई थी। मंदिर निर्माण से जुड़े आंध्र प्रदेश के वास्तुकार और कंपनी निदेशक मधु बोट्टा के मुताबिक, 2009 में दिल्ली में उनकी अखिलेश यादव से मुलाकात हुई थी। मैसूर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान अखिलेश को चामुंडेश्वरी मंदिर में स्थापित नंदी ने प्रभावित किया था। वैसी ही विशाल नंदी प्रतिमा की आकृति वो इटावा में स्थापित कराना चाहते थे। 2017 में नंदी की आकृति इटावा लाई गई थी। इसे देखने के बाद अखिलेश ने यहां एक भव्य शिव मंदिर बनाने की बात कही। 2018 में मंदिर के लिए जमीन खरीदी गई और 7 मार्च, 2021 को निर्माण का भूमिपूजन हुआ था। इस मंदिर में उत्तर-दक्षिण दोनों की परंपरा और वास्तुकला दिखाई देती है। मंदिर का गर्भगृह उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर से प्रेरित है। जबकि परिसर में दक्षिण भारतीय द्रविड़ स्थापत्य शैली में विशेष ग्रेनाइट और पारंपरिक पत्थर जोड़ने की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। -------------------------- यह खबर भी पढ़ें- राहुल-अखिलेश जोड़ी की काट निकालने लखनऊ आ रहे अमित शाह, सीट बंटवारा बड़ी चुनौती; 2027 के लिए क्या होगी स्ट्रैटजी विधानसभा चुनावों को लेकर अमित शाह की एक सेट रणनीति रही है। वे चुनाव से 4 से 6 महीने पहले एक्टिव होते हैं और भाजपा के खिलाफ चल रही हवा को पलटकर रख देते हैं। हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और हालिया पश्चिम बंगाल इसके उदाहरण हैं। यूपी विधानसभा चुनाव में करीब 4 महीने बाकी हैं। राहुल-अखिलेश की जोड़ी ने इस चुनाव को मुश्किल बना दिया है। अब अमित शाह 30-31 अक्टूबर को लखनऊ आ रहे हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
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