देश की सबसे बड़ी ग्राउंड रिपोर्ट; 20 दिन, 2 देश:राम वन गमन पथ यात्रा- भाग-1: अयोध्या से प्रयागराज, 6 राज्य, 100+ जगहों का सफर
त्रेता के कालखंड से कलियुग के समयचक्र को जोड़ने वाली इस यात्रा में हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो जाइए... अयोध्या से श्रीलंका तक के इस सफर के पहले चरण में हमने गौराघाट, शृंगी आश्रम, राम चौरा घाट, राम शयन आश्रम और प्रयागराज के भारद्वाज आश्रम तक वनवासी प्रभु श्रीराम के पदचिह्नों का अनुसरण किया। अयोध्या से 20 किमी दूर है- गौराघाट यानी चकिया पुर्वा। यहीं श्रीराम ने वनवास के दौरान अयोध्या से बाहर पहला रात्रि विश्राम किया था। आज यह पौराणिक स्थान वीरान है। न साइन बोर्ड है, न पुजारी और श्रद्धालु दिखते हैं। बस एक जर्जर मंदिर और सामने वट वृक्ष के नीचे छोटा-सा शनि मंदिर है। पास में ही श्रीराम के पदचिह्न की एक शिला है। स्थानीय निवासी सुखदेव मौर्या उस रात की कहानी बताते हैं- ‘वनवास के समय कई अयोध्यावासी प्रभु के पीछे-पीछे यहां तक आ गए और लौटने से मना कर दिया, तो भोर होने से पहले ही राम, सीता और लक्ष्मण उन्हें सोता हुआ छोड़कर आगे बढ़ गए। चूंकि यहां श्रीराम ने सबको चकमा (चकिया) दिया था, इसलिए ‘चकिया पुर्वा’ नाम पड़ गया।’ यहां से करीब 4 घंटे में 160 किमी की ड्राइव के बाद हम शृंगवेरपुर पहुंचे। सबसे पहले हम निषादराज की करीब 30 फीट ऊंची प्रतिमा से रूबरू हुए। इससे महज 2 किमी दूरी पर ही है- शृंगी मंदिर। यहां शृंग ऋषि व पत्नी शांता की प्राचीन मूर्तियां हैं। गंगा घाट पर बने इस मंदिर के पुजारी आचार्य धीरेंद्र तिवारी ने बताया, ‘यह मंदिर कभी ऋषि शृंग का आश्रम था। एक बार ऋषि विभांडक की नजर अप्सरा उर्वशी पर पड़ी तो उनका वीर्य स्खलित हो गया, जिसे एक हिरणी ने ग्रहण कर लिया। इसी हिरणी के गर्भ से शृंग का जन्म हुआ, जन्म से ही उनके सिर पर सींग थे। आगे चलकर इन्हीं ऋषि शृंग ने राजा दशरथ के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया था, जिसके फलस्वरूप राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न पैदा हुए थे।’ यहां से कुछ ही दूरी पर निषादराज के महल के अवशेष दिखते हैं। वहां 250 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 20 फीट गहरा प्राचीन स्ट्रक्चर है। इसे भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) ने सहेज रखा है। खुदाई के दौरान करीब 250 मीटर लंबा बड़ी ईंटों से निर्मित तालाब मिला, जिसे पहली शताब्दी में बनाया गया था। इसमें गंगा नदी के पानी को शुद्ध करने के बाद पीने योग्य बनाया जाता था। इससे डेढ़ किमी पर ही है- राम शयन आश्रम, जहां श्रीराम गंगा पार करने से पहले एक रात्रि रुके थे। पुजारी श्री राम गोपालदास महाराज बताते हैं, ‘त्रेतायुग में यहां निषादराज की वाटिका थी। यहीं प्रभु ने वृक्ष के नीचे विश्राम किया था। यहां पांच शीशम (राम, लक्ष्मण, जानकी, निषादराज और सुमन्त्र के रूप स्वरूप) के पेड़ हैं, जो शयन अवस्था में दिखते हैं। श्रीरामचरित मानस में इसका जिक्र है।’ यहां से 500 मीटर पर ही राम चौरा घाट है, जहां से निषादराज ने श्रीराम को गंगा पार कराई थी। केवट प्रसंग भी यहीं हुआ था। भारद्वाज के कहने पर चित्रकूट गए थे श्रीराम वाल्मीकि रामायण के अनुसार, श्रीराम गंगा पार करके सबसे पहले प्रयागराज में महर्षि भारद्वाज के आश्रम गए थे। हम भी यहां पहुंच गए। दीवारों पर ऋषि-मुनियों की उपदेश देती हुई प्रतिमाएं हैं। आश्रम के पुजारी प्रशांत गोस्वामी बताते हैं- ‘वनवास के दौरान भारद्वाज ने ही श्रीराम को चित्रकूट में निवास स्थान बनाने को कहा था। पुष्पक विमान का निर्माण भी भारद्वाज जी ने किया था। वे करीब 88 हजार संत-महात्माओं को शिक्षा-दीक्षा दिया करते थे।
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