गटर जनरेशन टिप्पणी मामले में अभिनेत्री कंगना को राहत:आगरा कोर्ट ने खारिज किया ने रिवीजन, कहा- सार्वजनिक विषय पर टिप्पणी अपराध नहीं
गटर जनरेशन टिप्पणी मामले में अभिनेत्री एवं सांसद कंगना रनौत को जिला अदालत से राहत मिली है। छात्र-छात्राओं के प्रति की गई कथित अमर्यादित टिप्पणी को लेकर दायर रिवीजन को जिला जज संजय कुमार मलिक ने सोमवार को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी सार्वजनिक विषय पर की गई कठोर, विवादास्पद अथवा अमर्यादित टिप्पणी नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है। इससे राजनीतिक और सामाजिक असहमति उत्पन्न हो सकती है, लेकिन इसे अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने रिवीजन को पोषणीय नहीं मानते हुए उसे प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त कर दिया। जिला जज ने अपने आदेश में कहा कि सामान्यतः किसी अपराध के संबंध में कानून को गतिमान करने का अधिकार किसी को भी हो सकता है। हालांकि, जहां विधि के तहत परिवाद के लिए व्यथित व्यक्ति का होना या शासकीय स्वीकृति आवश्यक हो, वहां इन शर्तों की पूर्ति के बिना परिवाद पोषणीय नहीं होता। परिवादी के बेटे की उम्र को भी बनाया आधार अदालत ने परिवादी की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके पुत्र ध्रुव शर्मा के हाईस्कूल परीक्षा 2026 के प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि पेश की गई है। इसमें जन्मतिथि 31 अक्टूबर 2009 अंकित है। ऐसे में 27 जुलाई 2026 को कंगना रनौत की ओर से की गई टिप्पणी के समय परिवादी का पुत्र अवयस्क था। अदालत ने कहा कि उसके नीट परीक्षा में शामिल होने अथवा नीट के अभ्यर्थियों के संबंध में की गई टिप्पणी से उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचने का आधार नहीं बनता। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि परिवादी ने ऐसा कोई कथन नहीं किया कि घटना के समय वह या उसका पुत्र मौके पर मौजूद थे। अदालत के अनुसार, यदि टिप्पणी की गई थी तो वह वहां उपस्थित छात्रों के संदर्भ में थी। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक विषय पर की गई कठोर या विवादास्पद टिप्पणी मात्र से अपराध गठित नहीं होता। इन्हीं आधारों पर रिवीजन को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया गया और प्रकरण को प्रकीर्ण वाद के रूप में दर्ज किया गया। परिवादी बोले- फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाएंगे राजीव गांधी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने अदालत के फैसले पर असहमति जताई है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि कानून दो तरह के मापदंड अपना रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विपक्षी नेताओं राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और अन्य नेताओं की ओर से प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के संबंध में दिए गए बयानों पर भी विभिन्न स्थानों पर ऐसे लोगों ने परिवाद या एफआईआर दर्ज कराई, जो सीधे तौर पर पीड़ित या व्यथित नहीं थे। शर्मा ने राहुल गांधी और बिहार के सांसद पप्पू यादव की ओर से दिल्ली में संसद के बाहर चंदा चोरी के मुद्दे पर किए गए प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मामले में बनारस में भी परिवाद दर्ज कराया गया था, जबकि परिवादी सीधे तौर पर प्रभावित नहीं था। उन्होंने कहा कि वह छात्रों के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि रिवीजन में भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 और धारा 356 के प्रावधानों का उल्लेख किया गया था। उनके अनुसार, धारा 152 राष्ट्रीय एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाले कृत्यों से संबंधित है, जबकि धारा 356 मानहानि से संबंधित है। शर्मा का कहना है कि अदालत ने उनके द्वारा प्रस्तुत कानूनी प्रावधानों और रूलिंग पर अपेक्षित विचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह इस निर्णय के खिलाफ जल्द ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करेंगे। उनके मुताबिक, यह मामला देश के छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों के सम्मान से जुड़ा है।
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