हाईकोर्ट बोला- डॉक्टरों की लापरवाही की शिकायत को एसओपी बनाएं:कोर्ट ने कहा तय प्रक्रिया नहीं इसलिए पीड़ित दर दर भटकता है, सरकार बताए
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में पीड़ित व्यक्ति के लिए शिकायत की कोई स्पष्ट व्यवस्था न होने पर चिंता जताई है। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने राज्य सरकार को इस संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया तैयार कर अदालत के सामने रखने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर 2026 को होगी। एकांश वर्मा की ओर से दाखिल याचिका में प्रमुख सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सहित छह अन्य को प्रतिवादी बनाया गया है। पिछले आदेश के अनुपालन में अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष अदालत में उपस्थित हुए। अपर महाधिवक्ता ने पेश किया हलफनामा अपर महाधिवक्ता कार्तिकेय सरन ने डॉ. अभिषेक सिंह (उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी, प्रयागराज) का हलफनामा पेश किया। उन्होंने कहा कि राज्य ने 19.अगस्त.2010 को क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 अधिसूचित किया, जिसकी धारा 33 में पंजीकृत क्लिनिकल संस्थान की जांच का अधिकार दिया गया है।
इसके बाद उत्तर प्रदेश क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स नियम, 2019 बनाए गए, जिनके नियम 13, 14, 31 और 32 सक्षम प्राधिकारी पर नियमों के अनुसार कार्य करना अनिवार्य करते हैं। चिकित्सकीय लापरवाही के आरोपों की जांच सक्षम चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा होनी चाहिए। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने दिशानिर्देश जारी किए हैं, और लापरवाही या आपराधिक उतावलेपन की जांच जिला मेडिकल बोर्ड करता है, जबकि उपयुक्त मामलों में राज्य मेडिकल बोर्ड विचार कर सकता है। पुलिस महानिदेशक के 25.मई.2022 के परिपत्र में ऐसे मामलों में जांच एजेंसी के लिए निर्देश दिए गए हैं। तय प्रक्रिया न होने पर कोर्ट नाराज खंडपीठ ने पाया कि अपर महाधिवक्ता ऐसी कोई स्थायी प्रक्रिया या निर्देश नहीं बता सके, जिसमें यह तय हो कि चिकित्सकीय लापरवाही से पीड़ित व्यक्ति सबसे पहले किस प्राधिकारी के पास शिकायत करे। हलफनामे में भी ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं दिखाई गई। अपर महाधिवक्ता ने बताया कि पुलिस में शिकायत होने पर जांच अधिकारी मामला मुख्य चिकित्सा अधिकारी को भेजता है, या जिलाधिकारी भी जांच का निर्देश दे सकते हैं। उन्होंने निष्पक्षता से स्वीकार किया कि पीड़ित के किसी विशेष नामित अधिकारी के पास जाने की कोई बाध्यकारी व्यवस्था नहीं है। पीड़ित को दर-दर भटकना पड़ता है कोर्ट ने कहा कि ऐसी नामित या सक्षम अधिकारी के अभाव में पीड़ित को "दर-दर भटकना" पड़ता है और अंततः न्याय के लिए हाईकोर्ट आना पड़ता है। कोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार कोई स्थायी प्रक्रिया तय कर दे तो यह स्थिति आसानी से दूर हो सकती है और जैकब मैथ्यू में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन भी सुनिश्चित होगा। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि समिति द्वारा निकाला गया निष्कर्ष अस्पष्ट है और उसे रद्द किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि राज्य के अधिवक्ता अगली तिथि पर इस पहलू पर भी अपना पक्ष रखें।
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