नेपाल बाढ़ में साड़ी बनी 21 तीर्थयात्रियों की जीवनरेखा, ऐसे बची जान
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बाढ़ और भूस्खलन में फंसे चेन्नई के 21 बुजुर्ग तीर्थयात्रियों की जान एक साड़ी और तार के सहारे बची। यात्रियों ने खतरनाक पहाड़ी चढ़कर अपनी जान बचाई और बाद में सैन्य हेलीकॉप्टर से सुरक्षित निकाले गए।
दि राइजिंग न्यूज | नेपाल | 30 अगस्त 2026
नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बीच चेन्नई के 21 बुजुर्ग तीर्थयात्रियों के बचने की कहानी सामने आई है। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास यात्रा कर रहे इन लोगों को अचानक बाढ़ और पहाड़ से गिरते पत्थरों का सामना करना पड़ा। हालात इतने खतरनाक हो गए कि यात्रियों को अपनी बस छोड़कर जान बचाने के लिए पहाड़ी की ओर भागना पड़ा।करीब डेढ़ दिन तक मुश्किल परिस्थितियों में फंसे रहने के बाद इन यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। शुक्रवार रात काठमांडू से चेन्नई पहुंचे यात्रियों ने अपने भयावह अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि अगर उस समय कुछ मिनट की भी देरी होती, तो शायद उनकी जान बचाना बेहद मुश्किल हो जाता।
‘बम फटने जैसी तेज आवाज आई’
तीर्थयात्रियों ने बताया कि हादसे से पहले अचानक बहुत तेज आवाज सुनाई दी। आवाज इतनी भयावह थी कि उन्हें लगा जैसे कहीं बम फट गया हो। इसके तुरंत बाद पहाड़ से पत्थर गिरने लगे और देखते ही देखते बाढ़ का पानी तेजी से उनकी गाड़ी की ओर बढ़ने लगा।यात्रियों के अनुसार पानी की रफ्तार इतनी तेज थी जैसे किसी बांध के अचानक खुल जाने के बाद पानी नीचे की ओर बह रहा हो। नेपाली चालक ने खतरे को तुरंत भांप लिया और सभी यात्रियों को वाहन से बाहर निकलकर ऊंचाई की ओर भागने के लिए कहा। चालक के इस फैसले ने यात्रियों को समय रहते वाहन से बाहर निकलने का मौका दिया।
कीचड़ भरी ढलान पर फिसल रहे थे यात्री
वाहन से बाहर निकलने के बाद 21 यात्रियों को पहाड़ की ओर चढ़ना पड़ा। समूह में अधिकतर लोगों की उम्र 50 वर्ष से अधिक थी, जिसके कारण उनके लिए कीचड़ भरी खड़ी ढलान पर चढ़ना बेहद मुश्किल था। यात्री बार-बार फिसलकर नीचे गिर रहे थे और हर कदम पर जान का खतरा बना हुआ था।पहाड़ पर चढ़ने के लिए कोई सुरक्षित रास्ता भी मौजूद नहीं था। यात्रियों के मुताबिक वे कुछ कदम ऊपर चढ़ते और फिर कई फीट नीचे फिसल जाते थे। नीचे बाढ़ का पानी और ऊपर से गिरते पत्थर लगातार खतरा बने हुए थे, ऐसे में हर व्यक्ति किसी तरह अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहा था।
एक साड़ी ने बना दी जिंदगी की राह
मुश्किल हालात के बीच समूह की एक महिला पूंगोडी ने अपनी साड़ी उतारकर उसे नीचे फंसे लोगों की ओर लटका दिया। इसके बाद यात्रियों ने साड़ी और वहां मौजूद एक तार को मजबूती से पकड़कर पहाड़ी पर चढ़ना शुरू किया। यही साड़ी उनके लिए उस समय जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा सहारा बन गई।यात्रियों ने बताया कि अंत में समूह की एक महिला अकेले ऊपर नहीं चढ़ पा रही थी। तब उसे साड़ी अपनी कमर से बांधने के लिए कहा गया। ऊपर मौजूद लोगों ने साड़ी को पकड़कर उसे पूरी ताकत से ऊपर खींच लिया और इस तरह वह भी सुरक्षित स्थान तक पहुंच गई।
70 से 80 फीट ऊंची लहर की तरह बढ़ा मलबा
कांचीपुरम के एक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका सत्या भी इस समूह में शामिल थीं। उन्होंने बताया कि तीर्थयात्री सुबह करीब आठ बजे चीनी सीमा पर स्थित आव्रजन केंद्र की ओर रवाना हुए थे। यात्रा के दौरान अचानक उन्हें धूल का एक बड़ा गुबार दिखाई दिया और कुछ ही देर में पत्थर तथा कीचड़ तेजी से उनकी ओर बढ़ने लगे।सत्या के अनुसार मलबे और पानी का बहाव सुनामी की लहर जैसा दिखाई दे रहा था। इसकी ऊंचाई करीब 70 से 80 फीट तक महसूस हो रही थी। उनके सामने पहाड़ पर चढ़ने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं था, फिर भी यात्रियों ने अपनी जान बचाने के लिए जोखिम उठाकर ऊंचाई की ओर बढ़ना जारी रखा।
सुरक्षित होने का प्रमाण परिवार तक भेजा
काफी मुश्किल के बाद यात्री सशस्त्र पुलिस बल के शिविर तक पहुंचने में सफल हुए। वहां उन्हें पानी और बिस्कुट दिए गए, जिससे उन्हें कुछ राहत मिली। जिन यात्रियों के मोबाइल में संपर्क सुविधा उपलब्ध थी, उन्होंने उसका इस्तेमाल कर तमिलनाडु में अपने परिवारों तक तस्वीर भेजी।परिवार को तस्वीर भेजने का उद्देश्य यह बताना था कि वे अभी सुरक्षित हैं। हालांकि रास्ते में यात्रियों ने एक व्यक्ति को कीचड़ में फंसा हुआ भी देखा, जो मदद के लिए हाथ हिला रहा था। इस दृश्य ने उनकी मुश्किल यात्रा को और भी भयावह बना दिया।
सही रास्ता दिखाने के लिए नेपाली व्यक्ति ने की मदद
अगले दिन यात्रियों को हेलीकॉप्टर तक पहुंचने के लिए करीब तीन घंटे तक झाड़ियों और बेहद संकरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ा। इस दौरान एक जगह समूह गलत रास्ते पर चला गया था। तभी एक नेपाली व्यक्ति ने उन्हें सही रास्ता बताया और यात्रियों को आगे बढ़ने में मदद मिली।यात्रियों के मुताबिक कई स्थानों पर नीचे गिरने का खतरा इतना अधिक था कि छोटी सी गलती भी जानलेवा साबित हो सकती थी। एक स्थान पर उन्हें करीब 50 फीट नीचे गिरने का खतरा था। सही रास्ते की जानकारी मिलने के बाद उन्हें पहले नीचे उतरना पड़ा और फिर दूसरी दिशा से पहाड़ पर चढ़ना पड़ा।
सैन्य हेलीकॉप्टर से निकाला गया
कठिन रास्ते को पार करने के बाद आखिरकार तीर्थयात्री उस स्थान तक पहुंचे जहां से उन्हें सुरक्षित निकाला जा सकता था। इसके बाद उन्हें सैन्य हेलीकॉप्टर की मदद से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। वहां से उनकी आगे की यात्रा की व्यवस्था की गई और वे काठमांडू पहुंचे।काठमांडू से वे नई दिल्ली होते हुए चेन्नई पहुंचे। घर पहुंचने के बाद यात्रियों ने राहत की सांस ली और अपने भयावह अनुभव साझा किए। हालांकि इस पूरी यात्रा के दौरान कुछ यात्रियों के पासपोर्ट और अन्य जरूरी दस्तावेज भी खो गए।
बाकी यात्रियों की तलाश जारी
यह समूह तीन बसों में यात्रा कर रहे 57 लोगों के बड़े दल का हिस्सा था। हादसे के बाद इस दल में शामिल अन्य यात्रियों की स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई थी। शनिवार तक तीन बसों में यात्रा कर रहे बाकी लोगों के बारे में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई थी।चेन्नई के ही 49 तीर्थयात्रियों के एक अन्य समूह का भी पता नहीं चल पाया था। ऐसे में बचाए गए 21 यात्रियों की कहानी जहां राहत देती है, वहीं बाकी लोगों की सुरक्षित वापसी को लेकर चिंता भी बढ़ाती है। प्रशासन और बचाव दलों की कार्रवाई पर सभी की नजर बनी हुई है।
महत्वपूर्ण बिंदु
- नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बाढ़ और भूस्खलन के बीच 21 बुजुर्ग तीर्थयात्री फंस गए थे।
- खतरा बढ़ने पर यात्रियों को अपनी बस छोड़कर पहाड़ी की ओर भागना पड़ा।
- अधिकतर यात्रियों की उम्र 50 वर्ष से अधिक बताई गई है।
- कीचड़ भरी ढलान पर चढ़ने के दौरान यात्रियों को बार-बार फिसलना पड़ा।
- समूह की एक महिला ने अपनी साड़ी उतारकर उसे नीचे फंसे यात्रियों तक पहुंचाया।
- साड़ी और एक तार के सहारे यात्रियों ने पहाड़ी पर चढ़कर अपनी जान बचाई।
- बाद में यात्रियों को सैन्य हेलीकॉप्टर से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया।
- काठमांडू और नई दिल्ली के रास्ते सभी 21 यात्री चेन्नई पहुंचे।
- कुछ यात्रियों के पासपोर्ट और जरूरी दस्तावेज रास्ते में खो गए।
- तीन बसों में यात्रा कर रहे अन्य यात्रियों की स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है।
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