टीएमसी पर कब्जे की जंग तेज, चुनाव चिन्ह पर बागी गुट का दावा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी संघर्ष अब पार्टी के चुनाव चिन्ह और संगठन पर अधिकार की लड़ाई तक पहुंच गया है. बागी सांसदों ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पार्टी के चुनाव चिन्ह पर दावा करने की तैयारी शुरू कर दी है, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने इसे दल-बदल कानून के खिलाफ बताया है.

टीएमसी पर कब्जे की जंग तेज, चुनाव चिन्ह पर बागी गुट का दावा

दि राइजिंग न्यूज़ | कोलकाता | 16 जून 2026

टीएमसी में बढ़ी सत्ता और संगठन की लड़ाई

पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा राजनीतिक संघर्ष अब खुले टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है. पार्टी के बागी सांसदों ने न केवल ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर भी दावा करने की तैयारी शुरू कर दी है. बागी नेताओं का कहना है कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि वे संगठन को बचाने और सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने इस पूरे कदम को संविधान और दल-बदल विरोधी कानून के खिलाफ बताया है.

बागी सांसदों ने खुद को बताया असली टीएमसी

टीएमसी के बागी सांसद अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि उनका गुट तृणमूल कांग्रेस का ही वास्तविक प्रतिनिधित्व करता है. उनका दावा है कि पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले मुद्दों पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हो रही थी, इसलिए सुधार के लिए यह कदम उठाना पड़ा. उन्होंने कहा कि जब उनके साथ बड़ी संख्या में सांसद हैं तो चुनाव चिन्ह पर दावा करने का अधिकार भी उन्हें है. बागी गुट का कहना है कि वह अदालत में जाकर अपनी दावेदारी पेश करेगा और खुद को असली टीएमसी साबित करने की कोशिश करेगा.

एनसीपीआई में विलय की घोषणा से बढ़ा विवाद

बागी सांसदों ने हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर यह घोषणा की थी कि वे त्रिपुरा की पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर रहे हैं. इसके बाद बंगाल की राजनीति में भूचाल आ गया. टीएमसी नेतृत्व ने इस कदम को पार्टी और मतदाताओं के साथ विश्वासघात बताया है.

दल-बदल कानून को लेकर कानूनी बहस

टीएमसी का कहना है कि केवल सांसदों के समूह द्वारा अलग होने से पार्टी का विलय नहीं माना जा सकता. पार्टी नेताओं का तर्क है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार राजनीतिक दल के स्तर पर विभाजन या विलय होना आवश्यक है. राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने कहा कि कानून और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले इस विषय पर पूरी तरह स्पष्ट हैं. उनके अनुसार केवल सांसदों की संख्या के आधार पर किसी गुट को वैध राजनीतिक दल नहीं माना जा सकता.

ममता बनर्जी के नेतृत्व को खुली चुनौती

बागी नेताओं ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भी सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चर्चा का अभाव है और महत्वपूर्ण मुद्दों पर संवाद नहीं हो रहा. दूसरी ओर टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि बागी सांसदों ने व्यक्तिगत राजनीतिक हितों के लिए यह रास्ता चुना है और उनका कदम जनता के जनादेश के खिलाफ है.

चुनाव चिन्ह पर कानूनी लड़ाई की तैयारी

छह बार सांसद रह चुके सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा है कि उनका गुट अदालत में जाकर चुनाव चिन्ह पर दावा करेगा. उनका कहना है कि यदि संगठन का बड़ा हिस्सा उनके साथ है तो उन्हें पार्टी के प्रतीक और पहचान पर भी अधिकार मिलना चाहिए. इस बयान के बाद राजनीतिक और कानूनी लड़ाई के और तेज होने की संभावना जताई जा रही है.

विधानसभा में भी जारी है संघर्ष

टीएमसी का संकट केवल संसद तक सीमित नहीं है. पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के भीतर बड़ा विभाजन सामने आया है. बताया जा रहा है कि 80 में से 64 विधायकों ने अलग समूह बनाकर अपनी स्वतंत्र पहचान की मांग की है. इन विधायकों ने नया विधायी समूह बनाते हुए अपने नेता का चयन भी कर लिया है. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने इस फैसले को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी है और कानूनी लड़ाई जारी है.

पति बागी गुट में, पत्नी ममता के साथ

इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच एक दिलचस्प तस्वीर भी सामने आई है. वरिष्ठ नेता और सांसद सुदीप बंदोपाध्याय बागी गुट में शामिल हो चुके हैं, जबकि उनकी पत्नी और विधायक नयना बंदोपाध्याय अब भी ममता बनर्जी के साथ खड़ी हैं. नयना बंदोपाध्याय ने साफ कहा कि उनका राजनीतिक और वैचारिक विश्वास ममता बनर्जी के साथ जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि वह किसी भी परिस्थिति में ममता बनर्जी का साथ नहीं छोड़ेंगी.

बंगाल की राजनीति में अनोखा समीकरण

नयना बंदोपाध्याय ने कहा कि उन्होंने ममता बनर्जी को अपना नेता और प्रेरणा माना है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि कभी ममता बनर्जी उनसे दूरी बना लें तब भी वह उनका साथ नहीं छोड़ेंगी. दूसरी ओर सुदीप बंदोपाध्याय ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी पत्नी को मनाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने अपना राजनीतिक रुख नहीं बदला.

आने वाले दिनों में बढ़ सकती है सियासी गर्मी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई यह लड़ाई आने वाले दिनों में और तीखी हो सकती है. चुनाव चिन्ह, संगठनात्मक नियंत्रण और विधायी मान्यता को लेकर अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. bफिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस की असली पहचान किसके पास रहेगी और इस संघर्ष का असर आगामी चुनावों पर कितना पड़ेगा.