योगी की जनसभा से 2027 का चुनावी बिगुल:कानपुर बिठूर के वाल्मीकि आश्रम जाएंगे, UP में दलित वोट बैंक पर BJP की नजर

Oct 25, 2026 - 07:37
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योगी की जनसभा से 2027 का चुनावी बिगुल:कानपुर बिठूर के वाल्मीकि आश्रम जाएंगे, UP में दलित वोट बैंक पर BJP की नजर
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 26 अक्टूबर को कानपुर दौरा राजनीतिक नजरिए से अहम माना जा रहा है। महर्षि वाल्मीकि जयंती पर मुख्यमंत्री बिठूर स्थित महर्षि वाल्मीकि आश्रम पहुंचेगे। बिठूर के नानाराव पेशवा स्मारक स्थल से जनसभा को संबोधित करेंगे। धार्मिक आस्था, सामाजिक समीकरण और 1857 की क्रांति के इतिहास से जुड़े बिठूर को इस आयोजन के लिए चुनने के पीछे राजनीतिक संदेश भी जोड़ा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस कार्यक्रम के जरिए भाजपा दलित समाज के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, जनसभा को 2027 के चुनावी बिगुल माना जा सकता है। मुख्यमंत्री के संबोधन में संभावित घोषणाएं भी आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा सकता है। बिठूर में महर्षि वाल्मीकि आश्रम और नानाराव पेशवा स्मारक स्थल का एक साथ केंद्र में आना इस आयोजन को धार्मिक और ऐतिहासिक, दोनों को ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री के दौरे को केवल जयंती समारोह तक सीमित न मानकर उसके राजनीतिक और विकास संबंधी संदेशों के लिहाज से भी देखा जा सकता है। दलित वोट बैंक पर नजर, यूपी की राजनीति में अहम हैं ये समीकरण उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता विधानसभा चुनावों के समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक आकलनों के मुताबिक, प्रदेश की आबादी में दलितों वोटरों की हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत है। यूपी विधानसभा में लगभग 140 विधानसभा सीटों पर दलित मतदाताओं का प्रभाव चुनावी नतीजों पर पड़ता है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में भाजपा समेत सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए दलित समाज को चुनावों में अपनी वोट बैंक अपने पक्ष में लाने में जुट जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषक ने जो कहा वो पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक पंकज प्रसून त्रिपाठी ने कहा कि, कानपुर में मुख्यमंत्री की जनसभा को भाजपा की उस पहल से जोडकर देखा जा सकता है जब साल 2014 में भाजपा की केंद्र में सरकार बनने के बाद महर्षि वाल्मीकि जयंती पर बड़े स्तर के आयोजन किए जाने शुरू किए गए। उनका मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस कार्यक्रम का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। जनसभा के जरिए मुख्यमंत्री दलित समाज तक अपनी सरकार और पार्टी का संदेश पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। त्रिपाठी ने कहा, बिठूर में भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। बिठूर से अभिजीत सिंह सांगा विधायक हैं। इसी महीने हुए जिला पंचायत अध्यक्ष के उपचुनाव में भी भाजपा की जीत हुई है। इससे बिठूर में भाजपा और भी मजबूत हुई है। ऐसे में मुख्यमंत्री की जनसभा का असर केवल बिठूर तक सीमित रहने के बजाय कानपुर की सभी विधानसभा सीटों पर भी असर डालेगी। बिठूर में कॉरिडोर या रामायण सर्किट की घोषणा संभव? मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर बिठूर में विकास संबंधी घोषणाओं की उम्मीदें भी जताई जा रही हैं। चर्चा है कि महर्षि वाल्मीकि आश्रम में दर्शन और नानाराव पार्क में जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री इस धार्मिक-ऐतिहासिक क्षेत्र के विकास को लेकर कोई बड़ी घोषणा कर सकते हैं। बिठूर का संबंध महर्षि वाल्मीकि, माता सीता और उनके पुत्रों लव-कुश से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं से है। इस वजह से यहां धार्मिक पर्यटन की संभावनाओं पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। इसी संदर्भ में बिठूर को रामायण सर्किट से जोड़ने या चित्रकूट और मथुरा की तर्ज पर कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा की भी उम्मीद की जा सकती हैं। पहले ही केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार से बिठूर के महर्षि वाल्मीकि आश्रम को रामायण सर्किट से जोडे जाने को लेकर रिपोर्ट मांगी गई है। 2014 के बाद से वाल्मीकि जयंती पर बड़े आयोजन महर्षि वाल्मीकि जयंती पर भाजपा ने केंद्र 2014 में सरकार बनने के बाद बड़े आयोजन करने की शुरूआत की थी। 14 अक्टूबर 2016 को कानपुर के बृजेन्द्र स्वरूप पार्क में धम्म चेतना यात्रा का समापन कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह शामिल हुए थे। बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं की मौजूदगी ने इसे सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण आयोजन बनाया था। यूपी में 174 दिनों की यात्रा और 448 स्थानों पर यात्रा पहुंची थी, कानपुर में अमित शाह समापन कार्यक्रम में पहुंचे थे। 9 अक्टूबर 2022 को कानपुर के नानाराव पार्क में महर्षि वाल्मीकि जन्मोत्सव का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत शामिल हुए थे। उन्होंने वाल्मीकि प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी थी। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। भागवत के संबोधन को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लोग पहुंचे थे। महर्षि वाल्मीकि जयंती पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बिठूर में जनसभा को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले की राजनीतिक गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है। बिठूर ही क्यों? धार्मिक आस्था और 1857 की क्रांति का संगम गंगा किनारे बसा बिठूर उत्तर प्रदेश के उन ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है, जहां धार्मिक मान्यताओं और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का अनूठा मेल दिखाई देता है। मुख्यमंत्री के प्रस्तावित दौरे में भी यही दोनों पहलू प्रमुख हैं। 1. महर्षि वाल्मीकि आश्रम और रामायण से जुड़ी मान्यताएं त्रेता युग से बिठूर की धरती का जुड़ाव हिन्दू धर्म की मन्याताओं में बताया जाता है। बिठूर स्थित महर्षि वाल्मीकि आश्रम जहां रामायण की रचना और माता सीता के वनवास काल से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान राम से अलग होने के बाद माता सीता ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शरण ली थी। इसी स्थान को लव-कुश की जन्मस्थली और उनकी शिक्षा-दीक्षा भी हुई । धार्मिक कथाओं के अनुसार, दोनों ने महर्षि वाल्मीकि के मार्गदर्शन में शास्त्रों और शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था। आश्रम परिसर में सीता रसोई और सीता कुंड जैसे स्थान भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं। ये स्थल माता सीता के जीवन से जुड़ी स्थानीय धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं का हिस्सा हैं। रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बनने की कथा भी इस क्षेत्र की लोकमान्यताओं में प्रचलित है। 2. नाना साहब पेशवा और 1857 की क्रांति बिठूर का ऐतिहासिक महत्व केवल धार्मिक विरासत तक सीमित नहीं है। 1857 के विद्रोह के दौरान यह नाना साहब पेशवा की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा था। मराठा साम्राज्य के अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब ने बिठूर को अपना निवास बनाया था। अंग्रेजों द्वारा उनकी पेंशन बंद किए जाने के बाद ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनका विरोध तेज हुआ और 1857 के विद्रोह में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तात्या टोपे और अजीमुल्लाह खान जैसे क्रांतिकारी भी नाना साहब से जुड़े थे। बिठूर इस दौर में राजनीतिक गतिविधियों और विद्रोह की रणनीतियों का अहम केंद्र बना। 3. रानी लक्ष्मीबाई का बचपन भी बिठूर से जुड़ा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का बचपन भी बिठूर में बीता था। बचपन में मनु के नाम से जानी जाने वाली लक्ष्मीबाई का नाना साहेब और तात्या टोपे से परिचय इसी क्षेत्र में हुआ था। बिठूर से जुड़ी उनकी स्मृतियां और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका इस स्थान को ऐतिहासिक बना देती है। ब्रिटिश सेना ने विद्रोह के दौरान बिठूर पर हमला किया उस दौरान अग्रेजों का विरोध और क्रांति की धरती बिठूर बनी।

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