दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को क्यों लिखी चिट्ठी? सूचना के अधिकार से बड़ा खुलासा!
दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र भेजे थे। सूचना के अधिकार के तहत सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, कैबिनेट सचिवालय ने इन्हें व्यक्तिगत हैसियत से भेजे गए पत्र मानते हुए औपचारिक कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। इस घटनाक्रम ने निर्वाचन आयोग के आंतरिक कामकाज और शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026
दो चुनाव आयुक्तों द्वारा निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज को लेकर कैबिनेट सचिव को पत्र लिखने का मामला सामने आया है। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चला है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के खिलाफ अपनी चिंताएं जाहिर की थीं। हालांकि, कैबिनेट सचिवालय ने इन पत्रों पर औपचारिक कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। सचिवालय का कहना है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने ये पत्र अपनी व्यक्तिगत हैसियत से भेजे थे, न कि पूरे निर्वाचन आयोग की ओर से आधिकारिक संवाद के रूप में।
29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को भेजे गए थे पत्र
प्राप्त जानकारी के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र भेजे थे। इन पत्रों में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर चिंताएं जताई गई थीं। शिकायतों में आरोप लगाया गया कि गर्ग ने संबंधित अधिकारियों या निर्वाचन आयोग से आवश्यक सलाह लिए बिना ही अधिकारियों के बीच कामकाज के बंटवारे में बदलाव कर दिया था। इस मामले ने निर्वाचन आयोग के भीतर प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे पर उठी आपत्ति
पत्रों में कथित तौर पर वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशकों और समान पदों पर कार्यरत अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के वितरण में बदलाव का मुद्दा उठाया गया था। शिकायत के अनुसार, यह बदलाव संबंधित अधिकारियों और आयोग के साथ पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना किया गया। हालांकि, ये आरोप शिकायतों में लगाए गए हैं और इन्हें किसी अंतिम जांच या आधिकारिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस मामले में सामने आए दस्तावेज प्रशासनिक प्रक्रिया और आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर चर्चा का विषय बन गए हैं।
सूचना के अधिकार से सामने आई जानकारी
इस पूरे मामले का खुलासा सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी कमोडोर लोकेश के. बत्रा द्वारा दायर सूचना के अधिकार आवेदन के जवाब में हुआ। आवेदन के उत्तर में कैबिनेट सचिवालय ने स्पष्ट किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन इन्हें पूरे निर्वाचन आयोग का औपचारिक पक्ष नहीं माना जा सकता। सचिवालय के अनुसार, पत्र व्यक्तिगत हैसियत से भेजे गए थे। इसी आधार पर उसने कहा कि आयोग की ओर से औपचारिक संवाद प्राप्त हुए बिना कार्रवाई करना उचित नहीं होगा।
कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई से क्यों किया इनकार
कैबिनेट सचिवालय का तर्क है कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के आंतरिक मामलों में बिना औपचारिक संवाद के हस्तक्षेप करना उचित नहीं हो सकता। सचिवालय ने दोनों पत्रों की प्राप्ति स्वीकार करने और उनकी प्रतियां जानकारी के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रधान निजी सचिव को भेजने का सुझाव दिया। इसके अतिरिक्त, पत्रों को अभिलेख में रखने की बात भी कही गई, ताकि भविष्य में संबंधित अधिकारी से जुड़े निर्णय लेते समय इन पर विचार किया जा सके। इस तरह शिकायतों को दर्ज तो किया गया, लेकिन उनके आधार पर तत्काल औपचारिक कार्रवाई नहीं की गई।
चुनाव आयुक्तों के पत्रों से उठे कई सवाल
कैबिनेट सचिवालय के रुख के बाद यह सवाल उठने लगा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के आंतरिक तंत्र के माध्यम से मामला सुलझाने के बजाय सीधे कैबिनेट सचिव से संपर्क क्यों किया। इसके साथ ही यह भी चर्चा हो रही है कि क्या पत्रों को व्यक्तिगत हैसियत से भेजे जाने के आधार पर औपचारिक कार्रवाई से बचा जा सकता है। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं होता कि आयोग के भीतर इस मामले पर आगे कोई निर्णय लिया गया है या नहीं। आने वाले समय में इस प्रकरण से जुड़े नए दस्तावेज या आधिकारिक बयान सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
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