सुप्रीम कोर्ट की दोटूक, सार्वजनिक जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते प्रदर्शनकारी!
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता। अदालत ने प्रदर्शन के अधिकार के साथ आम लोगों की रोजी-रोटी और व्यापारियों के हितों का ध्यान रखने की जरूरत बताई। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन करने को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी भी प्रदर्शनकारी समूह को सार्वजनिक जगह पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। प्रदर्शन के अधिकार के साथ आम लोगों और दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी का ध्यान रखना भी जरूरी है।
जंतर-मंतर को लेकर उठाया गया मुद्दा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अक्टूबर में हुए प्रदर्शनों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का विरोध किया। वहीं, व्यापारिक संगठनों ने लगातार आंदोलनों के कारण कारोबार प्रभावित होने की बात कही।
17 दिनों तक जारी रहा था प्रदर्शन
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जुलाई में हुए एक प्रदर्शन का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि प्रदर्शन के लिए केवल एक दिन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक वहां बैठे रहे। इसके बाद उन्होंने बिना अनुमति संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन करने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
एक ही समूह का सार्वजनिक जगह पर कब्जा नहीं हो सकता
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि प्रदर्शन के लिए एक या दो स्थान निर्धारित किए जा सकते हैं, लेकिन वहां सभी संगठनों को बारी-बारी से अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। किसी एक समूह को हमेशा के लिए उस जगह पर कब्जा करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसान, मजदूर, श्रमिक संगठन और बेघर लोग अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना चाहें तो वे कहां जाएंगे?
प्रदर्शनों से कारोबार को 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान
व्यापारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि लगातार प्रदर्शनों के कारण कारोबार को करीब 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि त्योहारों के मौसम में बाजार बंद रहने से व्यापारियों के अलावा वाहन चालकों, मजदूरों और सामान ढोने वाले कर्मचारियों की कमाई भी प्रभावित होती है।हालांकि, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि कारोबार में गिरावट के लिए केवल प्रदर्शनकारियों को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रशासन की ओर से लगाई गई बैरिकेडिंग और दुकानों को बंद कराने जैसे कदम भी व्यापार प्रभावित होने की वजह हो सकते हैं।
नौ श्रेणियों में बांटी गईं याचिकाएं
3 नवंबर को हुई सुनवाई में महिला पत्रकारों की सुरक्षा, प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल और प्रदर्शन के दौरान मेट्रो, सड़क तथा इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने जैसे मुद्दे उठाए गए। अदालत ने बताया कि मामले से जुड़ी याचिकाओं को नौ श्रेणियों में बांटा गया है। प्रत्येक श्रेणी पर अलग-अलग सुनवाई होगी और वकीलों के पक्ष रखने का क्रम भी निर्धारित किया जाएगा।
विपक्ष के मार्च से जुड़े मामले पर 23 नवंबर को सुनवाई
सुनवाई के दौरान विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के दौरान बनी स्थिति और राहुल गांधी पर एक गर्भवती महिला पत्रकार को धक्का देने के आरोप का मुद्दा भी उठा। अदालत ने इस मामले पर अगली सुनवाई 23 नवंबर को तय की है। याचिकाकर्ता को सभी प्रतिवादियों को याचिका की प्रति देने का निर्देश भी दिया गया है, ताकि वे अपना जवाब दाखिल कर सकें।
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