रामकथा: भाग-3- अद्भुत रामायण:मंदोदरी के गर्भ से पैदा हुईं थीं सीता, रावण के बड़े भाई सहस्रमुख रावण का वध किया सीता ने
भास्कर सीरीज; 7 दिन... 7 रामायण अपनी-अपनी रामकथा के भाग-3 में पढ़िए- अद्भुत रामायण। इसकी रचना 14वीं से 15वीं शताब्दी की गई। इसमें कुल 27 सर्ग हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता माता सीता को आद्याशक्ति के रूप में प्रस्तुत करना और सहस्रमुख रावण-वध कथा है… प्रसंग-1: गर्भपात करके धरती में गाड़ा था दशानन रावण ने दंडकारण्य में तेजस्वी ऋषियों को देखकर सोचा कि इन्हें जीते बिना मैं त्रिलोकपति कैसे बन सकता हूं। उसने उन्हें बाण से घायल करके उनके रक्त को एक कलश में एकत्र किया। दैवयोग से यह वही कलश था, जिसमें सौ पुत्रों के पिता गृत्समद पुत्री की कामना के लिए रोज मंत्रोच्चार सहित कुशाग्र से दूध डालते थे। रावण ने यह कलश मंदोदरी को यह कहकर सौंप दिया कि इसमें जो रक्त है, वह विष से भी तीक्ष्ण है। फिर वह सुंदर कन्याओं का हरण करके रमण करने लगा। पति को खुद से दूर देख दुखी मंदोदरी ने प्राण देने के लिए वह रक्त पी लिया। इससे वे गर्भवती हो गईं। चूंकि एक साल से पति से दूर थीं, इसलिए उन्होंने डर से कुरुक्षेत्र में गर्भपात करके बच्ची को गाड़ दिया। बाद में जब राजा जनक ने यहां यज्ञ किया तो हल जोतने के दौरान यही कन्या मिली।
(अष्टम सर्ग से) प्रसंग-2: सहस्रमुख रावण कहां से आया? दशानन रावण के वध के बाद कई ऋषि-मुनि श्रीराम का अभिनंदन करके उनका गुणगान करने आते थे। एक बार यह प्रशंसा सुनकर सीता जी हंस पड़ीं। मुनियों ने इसका कारण पूछा तो वे बोलीं- विवाह से पहले मेरे घर पर एक ब्राह्मण आए थे, जो 4 महीने तक रहे थे। उन्होंने बताया था कि कैकसी ने दो रावणों को जन्म दिया था। एक सहस्रमुख और दूसरा दस मुखवाला। सहस्रमुख पुष्कर द्वीप में रहता था। वहां एक रम्य इंद्रपुरी है, जो देवताओं के स्वर्ग से भी सुंदर और संपन्न है। सहस्रमुख रावण 12 सूर्यों के समान तेजवान है। उसके हजारों मुख, दो हजार भुजाएं और दो हजार नेत्र हैं। वह सूर्य और चंद्र को पकड़कर कंदुकलीला कर सकता है। उसने जब सभी लोकों को त्रास देना शुरू किया तो ब्रह्माजी, पितामह पुलस्त्य और पिता विश्ववा को उसे समझा-बुझाकर शांत करना पड़ा।
(17वें और 18वें सर्ग से) प्रसंग-3: पुष्कर द्वीप पर राम की चढ़ाई सीताजी के मुख से सहस्रमुख रावण का वृत्तांत सुन श्रीराम ने कहा- हे मुनियों! आज ही उस रावण को जीतने के लिए जाना चाहिए और पुष्पक का आह्वान कर सेना समेत पुष्कर द्वीप पर धावा बोल दिया। क्रोध से आग उगलता हुआ-सा सहस्रमुख रावण बोला- 'हे राम! न यह लंका पुरी है, न तो मैं दसमुख रावण हूं। मैं तुम्हारे मस्तक के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।' दोनों में भीषण युद्ध छिड़ गया। लंका में रावण वध के लिए श्रीराम ने जो बाण छोड़ा था, वही बाण सहस्रमुख पर चलाया। मगर इस महाशक्तिशाली बाण को उसने बाएं हाथ से पकड़ लिया और तोड़ डाला। फिर क्रोधित राक्षस ने तीक्ष्ण बाण लेकर अपनी सारी शक्ति लगाकर राम की छाती में मारा। छाती को भेदकर बाण पृथ्वी को आर-पार करके पाताल के तल में घुस गया और महाबाहु राम मूर्छित होकर पुष्पक से गिर पड़े।
(21वें और 22वें सर्ग से) प्रसंग-4: क्षणभर में सभी राक्षस मार डाले श्रीराम को मूर्छित देखकर मुनि हाहाकार करने लगे। वशिष्ठ आदि महर्षि सीताजी से कहने लगे- आपने प्रभु राम को रावण की बात क्यों सुनाई? तभी महाबली सहस्रमुख रावण को शोर मचाते हुए देखकर सीता ने ऊंचे स्वर में अट्टहास करके अपना वर्तमान स्वरूप छोड़ दिया और दिव्य रूप धारण कर लिया। वे पुष्पक से उतरकर खड्ग-खर्पर धारण किए वाजिनी के समान क्षणभर में रावण के रथ पर टूट पड़ीं। एक निमेष-मात्र में ही लीलापूर्वक रावण के सहस्र सिर खड्ग से काट डाले। कई वीर योद्धाओं के सिर अपने नाखूनों से उखाड़ दिए। कई को समुद्र में डुबो दिया। कई को चीरकर दो टुकड़े कर दिए। श्री जानकी ने क्षण भर में ही सभी राक्षसों को मार डाला। ब्रह्मा समेत सभी देवताओं ने 1008 नामों से स्तुति करके उन्हें शांत किया। श्रीराम भी उनका ये रूप देख बहुत आश्चर्यचकित हुए।
(23वें-24वें सर्ग से) रामकथा के पिछले भाग पढ़ने के लिए नीचे रिलेटेड आर्टिकल में दी गई लिंक पर क्लिक करें…
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