3 सेकेंड में हथेली पर फटा पटाखा, कटकर गिरीं उंगलियां:बेटे का सदमा मां बर्दाश्त नहीं कर सकीं; पटाखे दगाएं, लेकिन सावधानी से

Nov 08, 2026 - 10:38
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3 सेकेंड में हथेली पर फटा पटाखा, कटकर गिरीं उंगलियां:बेटे का सदमा मां बर्दाश्त नहीं कर सकीं; पटाखे दगाएं, लेकिन सावधानी से
उस साल दिवाली 14 नवंबर को थी। दिन बुधवार था। शाम को देशी पटाखा दगाने के लिए मैं भी निकला था। एक हाथ में जलती मोमबत्ती थी और दूसरे हाथ में पटाखा। तभी अचानक ध्यान भटका और मोमबत्ती-पटाखा एक ही हाथ में आ गए। कुछ समझ पाता, इससे पहले ही तेज धमाका हुआ। पटाखा हाथ में ही फट गया। बायां हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। हथेली का मांस उड़ गया और तीन उंगलियां कटकर नीचे गिर गईं। महज तीन सेकेंड में उस धमाके ने मुझे दिव्यांग बना दिया। मेरी जिंदगी बदल चुकी थी। इस हादसे का सदमा सिर्फ मुझे नहीं, पूरे परिवार को लगा। मां यह दर्द सह नहीं पाईं। हादसे के चार-छह महीने बाद 2002 में होली के दिन उनका निधन हो गया। यही वजह है कि दिवाली पर पटाखे जलाने में लापरवाही न बरतने की बात पर मैं खूब जोर देता हूं। ये दर्द बयां करते हुए लखनऊ के अमित श्रीवास्तव भावुक हो गए। दैनिक भास्कर ने रोशनी के इस विशेष पर्व पर उनके साथ 25 साल पहले हुई इस घटना को विस्तार से जाना। पढ़िए ये रिपोर्ट.. धमाका ऐसा कि हथेली उड़ी, तीन सेकेंड में जिंदगी बदल गई गोमतीनगर के विशेष खंड निवाल अमित ने बताया कि घटना के समय छोटा भाई अनूप घर के अंदर बाउंड्री वॉल के पास खड़ा था। पड़ोसी भी अपने घरों से पटाखे जलाते देख रहे थे। अमित कहते हैं, 'पता नहीं कैसे ध्यान भटक गया और दोनों चीजें एक ही हाथ में आ गईं। मुझे लगा कुछ सरसराहट हो रही है। जब तक समझ पाता कि मोमबत्ती कहां गई, तब तक धमाका हो चुका था। तीन सेकेंड से भी कम समय में सब हो गया।' धमाके का असर इतना तेज था कि उनका हाथ हवा में उछलकर नीचे आया। हथेली फट गई। तीन उंगलियां कटकर नीचे गिर गईं। इनमें दो पूरी तरह कट गई थीं, जबकि एक आधी कट गई थी। अंगूठा और एक उंगली बची थी। हथेली का काफी मांस भी उड़ गया था। होश में था, हाथ से खून की धार बह रही थी अमित बताते हैं कि अचानक हुए हादसे के बाद घर में अफरा-तफरी मच गई। पिता के मुंह से चीख निकल गई। वह कुछ समझ ही नहीं पाए। हाथ से लगातार ब्लड बह रहा था। मां तक बात पहुंचती, इससे पहले सामने रहने वाले पड़ोसी पांडेय जी ने तुरंत कार निकाली और अस्पताल लेकर भागे। डॉक्टरों ने हाथ की हालत देखी तो तुरंत इलाज शुरू किया। प्राथमिक उपचार के बाद हाथ को लकड़ी का सहारा देकर ऊपर की ओर बांधा, ताकि ब्लड का बहाव कम हो सके। इसके बाद ऑपरेशन किया गया। अमित बताते हैं कि वह ऑपरेशन होने तक होश में थे। ऑपरेशन के बाद अंगूठा भी काटना पड़ा अमित ने बताया कि कटी हुई उंगलियों को उठाकर बर्फ में रखा जाता तो संभव था कि प्लास्टिक सर्जरी के दौरान उनका इस्तेमाल हो पाता। लेकिन हादसे के वक्त परिवार इतना घबरा गया था कि किसी को यह समझ नहीं आया। बाद में घर पर उंगलियां पड़ी मिलीं। अंगूठे को बचाने की कोशिश भी हुई। डॉक्टरों ने परिवार को बताया था कि इसे काटना पड़ सकता है। पिता ने डॉक्टरों से कहा कि आप अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए जो बेहतर करते, वही उनके बेटे के लिए करें। डॉक्टरों ने अंगूठा बचाने की कोशिश की, लेकिन उसमें रिकवरी नहीं हुई और वह काला पड़ने लगा। बाद में दोबारा जांच और ऑपरेशन के बाद अंगूठा भी काटना पड़ा। मां को लगा सदमा, चार-छह महीने बाद हो गया निधन अमित बताते हैं कि हादसे के बाद उनकी जिंदगी ही बदल गई। पहले वह ड्राइविंग करते थे, लेकिन डॉक्टरों ने मना कर दिया। उनकी मोबिलिटी कम हो गई। वह कहते हैं, 'मुझे लंबे समय तक हीनभावना रहती थी। लोगों से अपना हाथ छिपाकर चलता था। कोई पूछता था तो हादसे के बारे में बताना पड़ता था। दिव्यांग होने के बाद जिंदगी में जो योजनाएं बनाई थीं, उन पर भी असर पड़ा।' इस हादसे का असर उनके माता-पिता पर भी पड़ा। अमित के मुताबिक, पिता को तो सदमा लगा ही, मां भी बेटे की हालत देखकर काफी दुखी रहने लगी थीं। उन्हें लगता है कि मां अपने बड़े बेटे के भविष्य को लेकर जो सपने देखती थीं, वे टूट गए। हादसे के बाद मां को गहरा सदमा लगा अमित कहते हैं, ‘नवंबर में मेरे साथ हादसा हुआ था। इसके चार-छह महीने बाद 2002 में होली के दिन मां का निधन हो गया। उन्हें कोई बीमारी नहीं थी। मैंने महसूस किया कि मेरे हादसे से उन्हें बहुत सदमा लगा था। परिवार को जितना कष्ट हुआ, उसे देखकर मुझे अपना दर्द छोटा लगने लगा।’ अब पटाखों से दूर रहने की देते हैं सलाह अमित बताते हैं कि हादसे के बाद उन्होंने तय किया कि अपने जानने वालों को पटाखों से होने वाले नुकसान के बारे में जरूर बताएंगे। उनका कहना है कि पटाखे जलाने में थोड़ी सी लापरवाही भी जिंदगीभर का दर्द दे सकती है। वह कहते हैं, 'पटाखे जलाने के लिए मन का शांत और फोकस होना जरूरी है। एक हाथ में मोमबत्ती और दूसरे में पटाखा लेकर कभी आग नहीं लगानी चाहिए। पटाखा जलाने के बाद उसके पास बार-बार झांकना भी खतरनाक है। बेहतर है कि पटाखे न जलाएं। अगर लोग जलाते हैं तो खुले मैदान में पूरी सावधानी के साथ जलाएं।' अमित सामूहिक रूप से आतिशबाजी का आयोजन करने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि पार्क या खुले मैदान में किसी पेशेवर आतिशबाज से आतिशबाजी कराई जाए तो लोग सुरक्षित दूरी से इसका आनंद ले सकते हैं। इससे हादसों का खतरा कम होगा। भतीजे के चेहरे पर भी फटा पटाखा अमित के परिवार में पटाखे से जुड़ा एक और हादसा हुआ। करीब 2019-20 में उनके छोटे भाई का बेटा दिवाली पर छत पर पटाखे जला रहा था। अमित के मुताबिक, शाम करीब सात बजे पटाखों का गत्ता छत पर रख दिया गया था। तीन-चार घंटे तक पटाखे नहीं जले। काफी कोशिश के बाद कुछ पटाखे जले। इसके बाद बच्चा चकरघिन्नी जला रहा था। काफी देर कोशिश के बाद भी जब पटाखा नहीं जला तो उसने उसे पलटकर दोबारा आग लगाने की कोशिश की। तभी पटाखा सीधे उसके चेहरे पर फट गया। चेहरे और आंखों के आसपास जलन होने लगी। सूजन आ गई और छाले पड़ने लगे। परिवार उसे नीचे लेकर आया और फैमिली डॉक्टर से सलाह ली। अमित कहते हैं कि एक छोटी सी लापरवाही उनके लिए जिंदगीभर का दर्द बन गई। अब वह चाहते हैं कि उनके परिवार या किसी दूसरे घर में ऐसा हादसा दोबारा न हो।

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