रामकथा भाग-7 - जैन रामायण:रावण के प्राण बचाने के लिए विभीषण ने दशरथ-जनक को मारने की प्रतिज्ञा ली थी

Nov 08, 2026 - 09:38
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रामकथा भाग-7 - जैन रामायण:रावण के प्राण बचाने के लिए विभीषण ने दशरथ-जनक को मारने की प्रतिज्ञा ली थी
भास्कर सीरीज; 7 दिन... 7 रामायण अपनी-अपनी रामकथा भाग-7 में पढ़िए जैन रामायण... इस ग्रंथ 'पउमचरिय' (पद्मचरित) की रचना महान जैन आचार्य विमलसूरि जी ने लगभग तीसरी से चौथी सदी में की थी। इसमें सीताजी के दीक्षा लेने जैसे कई नए प्रसंग हैं... प्रसंग-1: सीता का जुड़वां भाई था भामंडल राजा जनक की पत्नी विदेही ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। पुत्र का नाम भामंडल और पुत्री का सीता रखा गया। मगर पुत्र को हर लिया गया, जो दैवयोग से चंद्रपुर के राजा चंद्रध्वज के घर पहुंच गया। जब सीता विवाह योग्य हुईं तो जनक को उनके लिए वर की चिंता सताने लगी। तभी जनक के राज्य पर दैत्यों ने हमला कर दिया। जनक ने राजा दशरथ की मदद मांगी। तब श्रीराम ने उन दैत्यों का नाश किया। यह देख जनक ने अपनी पुत्री का विवाह राम से करने का प्रस्ताव रख दिया। उधर, नारद ने भामंडल को सीता का चित्र दिखाकर उससे विवाह के लिए आतुर कर दिया। चंद्रध्वज ने जनक को हर लिया और सीता से अपने पुत्र के विवाह का प्रस्ताव रखा। जनक ने कहा कि मैं राम को वचन दे चुका हूं। तब चंद्रध्वज ने उन्हें दो धनुष दिए और कहा कि यदि राम प्रत्यंचा चढ़ा दें, तभी विवाह कर सकते हैं। (चौथे सर्ग में इसका वर्णन मिलता है।) प्रसंग-2: दशरथ की मूर्ति का सिर काटा रावण ने एक बार सभा में बैठे हुए किसी ज्योतिषाचार्य से पूछा- मेरी मृत्यु कैसे होगी? उसने कहा- भविष्य में होने वाली जनक राजा की कन्या जानकी और भविष्य में होने वाले राजा दशरथ के पुत्र राम के हाथ से तुम्हारी मृत्यु होगी। तभी विभीषण ने कहा- मैं जनक और दशरथ को मार डालूंगा। सभा में बैठे नारद ने यह वृत्तांत जाकर दशरथ को बता दिया। दशरथ और जनक राज्य का भार मंत्रियों को सौंपकर योगी की तरह समय बिताने के लिए जंगलों में चले गए। शत्रु को धोखे में डालने के लिए मंत्रियों ने दशरथ की एक मूर्ति बनवाकर एक अंधेरी जगह में रखवा दी। क्रोधग्रस्त विभीषण जब अयोध्या आए, तो उन्होंने दशरथ समझकर अपनी तलवार से उस मूर्ति का सिर अलग कर दिया। दशरथ को मरा समझकर विभीषण यह सोचकर लंका लौट गया कि अकेले जनक से क्या हो सकता है? (चौथे सर्ग में इसका उल्लेख किया गया है।) प्रसंग-3: जब सीताजी ने दीक्षा ग्रहण की अग्निपरीक्षा के लिए सीता जैसे ही अग्निकुंड में कूदीं तो आग बुझ गई और वह कुंड स्वच्छ जल से भर गया। उस समय लक्ष्मण, विभीषण और सुग्रीव आदि वीरों ने आकर सीता को नमस्कार किया। श्रीराम भी उनके पास आए और हाथ जोड़कर कहा- हे देवी! मुझे क्षमा करें। सीताजी ने कहा- इसमें आपका कोई दोष नहीं, ये मेरे पूर्व कर्मों का ही दोष है। अतः दुख के चक्कर में डालने वाले कर्मों से छुटकारा पाने के लिए मैं दीक्षा ग्रहण करूंगी। सीता ने अपने हाथों से अपने केश निकालकर राम को दे दिए। यह देखकर राम को मूर्च्छा आ गई। जब वे मूर्च्छा से उठे तो लक्ष्मण ने बताया कि आपकी प्रिया सीता ने यहां से जाकर जयभूषण मुनि के पास दीक्षा ले ली। यह सुनकर राम ने कहा- सीता ने यह बहुत उत्तम कार्य किया। तत्पश्चात राम जयभूषण मुनि के पास गए और दीक्षा का ज्ञान लिया। (9वें व 10वें सर्ग में जैसा वर्णन है।) रामकथा के पिछले भाग पढ़ने के लिए नीचे रिलेटेड आर्टिकल में दी गई लिंक पर क्लिक करें…

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