रामकथा: भाग-4; कम्ब रामायण:पराई स्त्री को जबरन स्पर्श करने से रावण के टुकड़े-टुकड़े हो जाते, फिर उसने कैसे किया सीता का हरण

Nov 05, 2026 - 08:02
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रामकथा: भाग-4; कम्ब रामायण:पराई स्त्री को जबरन स्पर्श करने से रावण के टुकड़े-टुकड़े हो जाते, फिर उसने कैसे किया सीता का हरण
भास्कर सीरीज; 7 दिन... 7 रामायण अपनी-अपनी रामकथा : भाग-4 में पढ़िए- कम्ब्र रामायण। इसे 12वीं सदी के महान तमिल कवि कंबन ने रचा। कंबन चोल साम्राज्य के काल में हुए। वे तमिल साहित्य के सबसे मूर्धन्य कवियों में हैं। उन्होंने इसे तमिल के शास्त्रीय 'विरुत्तम' छंदों में लिखा था… प्रसंग-1: रावण बोला - नर से युद्ध अपमान जब रावण सीता का हरण करने गया तो उसे नलकूबर का वह शाप स्मरण हो आया, जिसके अनुसार वह जबरन किसी परनारी का स्पर्श नहीं कर सकता था। ऐसा किया तो उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए उसने वहां की भूमि को अपने हाथों से खोद लिया, जहां सीताजी थीं। नीचे एक योजन (करीब 8 किमी) गहरी और एक योजन विस्तार की भूमि खोदकर उठा ली। उसने सीताजी को भूमिखण्ड सहित उठाकर अपने विमान में रख लिया। सीताजी यह देखकर बेहोश हो गईं। जब उन्हें होश आया तो वे विलाप करने लगीं। सीता ने कहा- यदि तुम्हारे अंदर खुद को श्रीराम से युद्ध में बचाने का सामर्थ्य है तो विमान को यहीं रोको। रावण बोला- वे दुर्बल शरीर वाले नर हैं। उनसे प्रत्यक्ष युद्ध किया तो वह मेरा अपमान होगा। सीता ने कहा- परस्त्री को हर लेना क्या तुम्हें श्रेयस्कर लगता है? (अरण्यकांड के 9वें अध्याय से) प्रसंग-2: बाली को इसलिए शाप मिला था सीताजी की खोज में जब श्रीराम सुग्रीव से मिले तो वहीं उन्होंने एक राक्षस का शव देखा। वह इतना ऊंचा था कि आकाश को छू रहा था। समुद्र के समान फैला पड़ा था। वह ऋष्यमूक पर्वत जैसा लग रहा था। श्रीराम ने पूछा- ये कौन है? तो सुग्रीव बोले- यह दुन्दुभि दानव था। उसके दो सींग थे, जो इतने ऊंचे उठे थे कि आकाश में चंद्रमा को स्पर्श कर सकते थे। युद्ध की इच्छा से उसने एकबार कैलास पर्वत को अपने सींगों से खोद दिया था। शिवजी ने उसे देवों के पास भेज दिया था और देवों ने उसे लड़ने के लिए बाली के पास भेज दिया था। बाली ने उसके दोनों सींग उखाड़ दिए और ऐसा उछाला कि वह आकाश की छत से टकराकर इस बड़े पर्वत पर आ गिरा। यहां मतंग ऋषि का आश्रम था। तभी उन्होंने बाली को शाप दिया था कि ऋष्यमूक पर्वत पर कदम रखा तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। (किष्किंधाकांड के 5वें अध्याय से) प्रसंग-3: नल ने ऐसे बनाया था राम सेतु सुग्रीव ने शिल्पी नल से कहा- समुद्र पर सेतुबंध करना है। नल ने कहा- ऐसा बांध बना दूंगा कि पर्वत और कंकड़ में फर्क न दिखाई दे यानी सब एक समान दिखें। नल ने तीन करोड़ वानरों को पर्वत लाने के लिए कहा। भूमिदेवी की पीठ पर गड्ढे बनाते हुए वानरों ने जिन पर्वतों को उखाड़ा, उनके अंदर से सांप भूमि को छूते हुए लटक रहे थे, वे सांप पर्वतों की जड़ों जैसे लग रहे थे। समुद्र में हजारों किमी की गहराई को पाटते हुए टिमिंगल मछलियां पड़ी हुई थीं, जब ये बड़े भारी पर्वत गिरे, तो छटपटाकर हटने लगीं। करोड़ों वानर छाती से लगातार पर्वत लाते रहे और फेंकते रहे। नल ने उन असंख्य पत्थरों को अपने लौहस्तंभों जैसे हाथों में पकड़ा, जो पर्वत बचकर नीचे गिरे, उन्हें अपने पैरों से रोककर पैरों पर रख लिया। तीन दिन में ही सेतु का छोर त्रिकूट पर्वत पर स्थितलंका को स्पर्श कर गया। (युद्धकांड (पूर्वार्ध) के 7वें अध्याय से) प्रसंग-4: रावण ने लक्ष्मण को मूर्छित किया युद्ध में रावण ने विभीषण पर ऐसा अस्त्र चलाया, जो ब्रह्मा द्वारा यज्ञ से रचा गया था। इसे जब छोड़ा जाता था तो लक्ष्य भेदकर ही लौटता था। रावण ने जैसे ही वो अस्त्र चलाया, विभीषण ने लक्ष्मण से कहा- यह मेरे प्राण लेकर ही छोड़ेगा। पर लक्ष्मण बोले कि मैं इसे झेल लूंगा... और अस्त्र के सामने आ गए। लक्ष्मण ने उस शक्ति को सीने में घुसने दिया और वह पीठ से बाहर चली गई। यह देखकर देवता विलाप करने लगे। विभीषण ने रावण को ललकारा और अपनी लंबी गदा से उसका रथ चलाने वाले अश्वों और सारथी को मार गिराया। रावण ने विभीषण पर दस बाण चलाए, जो उनके शरीर में चुभ गए। फिर हनुमान के शरीर में एक हजार बाण चुभा दिए और यह कहकर लंका में प्रवेश कर गया कि युद्ध का अंत हो गया। बाद में हनुमान ने संजीवनी लाकर लक्ष्मण को मूर्च्छा से निकाला। (युद्धकांड (उत्तरार्ध) के 31वें अध्याय से) रामकथा के पिछले भाग पढ़ने के लिए नीचे रिलेटेड आर्टिकल में दी गई लिंक पर क्लिक करें…

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