सुप्रीम कोर्ट बोला-मीडिया यौन अपराधों की रिपोर्टिंग पर संयम रखे:सनसनीखेज भाषा से पीड़ितों को दोबारा ट्रॉमा, पहचान उजागर न करें

Sep 28, 2026 - 19:43
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सुप्रीम कोर्ट बोला-मीडिया यौन अपराधों की रिपोर्टिंग पर संयम रखे:सनसनीखेज भाषा से पीड़ितों को दोबारा ट्रॉमा, पहचान उजागर न करें
नई दिल्ली में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों की रिपोर्टिंग पर मीडिया को जिम्मेदारी बरतने को कहा। कोर्ट ने जिम्मेदार, संवेदनशील और संयमित पत्रकारिता की सलाह दी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि सनसनीखेज हेडलाइन और यौन हिंसा का भड़काऊ विवरण जनहित में नहीं है। इससे पीड़ितों और उनके परिवारों को गंभीर मानसिक आघात हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की से कथित गैंगरेप समेत तीन मामलों का संज्ञान लिया। इनमें दिल्ली के स्वरूप नगर में किशोरी से कथित गैंगरेप और हत्या का मामला भी शामिल है। तीसरा मामला चलती स्लीपर बस में नाबालिग लड़की से कथित यौन हमले का है। कानून लागू कराने वाली एजेंसियां ग्रेटर नोएडा से दिल्ली तक 47 किलोमीटर से ज्यादा चलने वाली बस को कथित तौर पर नहीं रोक सकीं। मीडिया को सुप्रीम कोर्ट की सलाह सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों की रिपोर्टिंग संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। मीडिया संस्थानों, पत्रकारों और पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म्स को इस जिम्मेदारी का ध्यान रखना चाहिए। बेंच ने कहा, “सनसनीखेज हेडलाइन, यौन हिंसा का ग्राफिक या भड़काऊ विवरण और असंवेदनशील भाषा जनहित में नहीं है। इससे पीड़ितों और उनके परिवारों को गंभीर मानसिक आघात का खतरा रहता है।” कोर्ट ने कहा कि हेडलाइन और रिपोर्टिंग में सनसनी के बजाय गरिमा, तथ्यों की सटीकता और संस्थागत जवाबदेही को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। चर्चा का केंद्र न्याय और सुरक्षा रहना चाहिए। पीड़ितों की पहचान उजागर न करने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया संगठनों को BNS की धारा 72 का सख्ती से पालन करने की याद दिलाई। POCSO Act की धारा 23 के तहत भी यौन हमले की पीड़ित या नाबालिग बच्चे की पहचान बताने पर रोक है। यह रोक पीड़ित की पहचान सीधे या परोक्ष रूप से उजागर करने पर लागू होती है। सुरक्षा संबंधी जानकारी के लिए अलग जगह देने को कहा बेंच ने कहा कि जिला प्रशासन को मीडिया संस्थानों के साथ तुरंत बैठक करनी चाहिए। अखबारों में एक अलग कॉलम और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अलग समय तय किया जाना चाहिए। इसमें सुरक्षा के उपायों और उन फोन नंबरों की जानकारी दी जानी चाहिए, जिनसे किसी खतरे की स्थिति में तुरंत मदद मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे भरोसा है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस जिम्मेदारी को निभाएगा। मीडिया संस्थान ऐसे नंबरों के लिए बिना शुल्क यानी प्रो बोनो अलग कॉलम या समय उपलब्ध कराएंगे। लिज मैथ्यू को एमिकस नियुक्त किया सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम लिज मैथ्यू, वरिष्ठ वकील, को एमिकस नियुक्त करते हैं। वह इस गंभीर मुद्दे पर अदालत की मदद करेंगी।” बेंच ने रजिस्ट्री को आदेश की एक प्रति और उससे जुड़े अखबारों की कतरनें जल्द से जल्द एमिकस को देने को कहा। रजिस्ट्री को एमिकस को इस आदेश की जानकारी भी जल्द देने का निर्देश दिया गया।

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