2017 से टैक्स लागू, अब अचानक क्यों उठाया सवाल?:हाईकोर्ट ने टिप्पणी कर 18% जीएसटी को चुनौती वाली याचिका खारिज की
हाईकोर्ट ने ऑनलाइन लीगल रिसर्च और कानूनी शिक्षा से जुड़ी डेटा सेवाओं पर लगने वाले 18% जीएसटी को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब यह टैक्स वर्ष 2017 से लागू है, तो याचिकाकर्ता अधिवक्ता को 2026 में अचानक इसकी दर अनुचित क्यों लगने लगी।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने अधिवक्ता अनिकेत गुप्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में यह नहीं बताया कि ऐसा क्या नया हुआ, जिसके कारण उन्हें अब इस टैक्स दर के अनुचित होने का एहसास हुआ, जबकि यह दर वर्ष 2017 से लागू है। क्या है मामला जानिये याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि इन सेवाओं के लिए अलग वर्गीकरण किया जाए और इन्हें जीएसटी से छूट या रियायती टैक्स दर का लाभ दिया जाए। याचिका में कहा गया कि एस सी सी आनलाइन, मनुपात्रा, लेक्सिस नेक्सिस जैसे लीगल रिसर्च प्लेटफॉर्म तथा लाइव ला , बार एंड बेंच जैसी कानूनी समाचार सेवाएं कानूनी पेशे से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से अधिवक्ताओं को न्यायालयों के फैसलों, कानूनों, सरकारी अधिसूचनाओं और अन्य कानूनी दस्तावेजों तक पहुंच मिलती है। कहा गया था कि इन सेवाओं पर 18% जीएसटी लगाने से न्याय तक पहुंच प्रभावित होती है और विशेष रूप से जूनियर अधिवक्ताओं तथा छोटे वकीलों के चैंबर पर आर्थिक बोझ पड़ता है। जूनियर वकीलों और छोटे चैंबर्स पर असर का दावा याचिका में कहा गया कि आधुनिक कानूनी प्रैक्टिस में ऑनलाइन रिसर्च डेटाबेस महत्वपूर्ण कार्य-साधन बन चुके हैं। व्यक्तिगत अधिवक्ताओं और छोटे चैंबर्स के लिए इन डेटाबेस में उपलब्ध पूरी जानकारी को स्वयं जुटाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल है। कोर्ट में पेश की गईं दलीलें हाईकोर्ट ने याचिका पर विचार करते हुए याचिकाकर्ता के टैक्स दर को चुनौती देने के समय पर सवाल उठाया। अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2020 में अधिवक्ता के रूप में नामांकित हुए थे और अपनी याचिका में पिछले छह वर्षों से प्रैक्टिस करने का दावा कर रहे थे।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि जब संबंधित टैक्स दर वर्ष 2017 से लागू है, तो याचिकाकर्ता को वर्ष 2026 में अचानक यह दर अनुचित क्यों लगने लगी, इसका कोई स्पष्ट कारण याचिका में नहीं बताया गया। अदालत ने कहा कि इस तरह अचानक टैक्स दर को अनुचित मानकर जनहित याचिका दाखिल करने के पीछे का आधार स्पष्ट नहीं है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)