अयोध्या कार्तिक कल्पवास के लिए रामनगरी पहुंचे श्रद्धालु:27 अक्टूबर से शुरू होगा कार्तिक मास; आश्रमों में जप-अनुष्ठान, पूजा-पाठ,सत्संग करेंगे
रामनगरी में कार्तिक मास की आहट के साथ ही आस्था का सैलाब उमड़ने लगा है। कार्तिक कल्पवास के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु अयोध्या पहुंच रहे हैं। रविवार को आश्विन पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं ने मां सरयू में आस्था की डुबकी लगाई। इसके बाद अपने-अपने दीक्षा गुरुओं के आश्रमों में पहुंचकर पूजा-अर्चना की। अब श्रद्धालु जप, तप, अनुष्ठान और सत्संग के जरिए कार्तिक मास बिताएंगे। अयोध्या में कार्तिक कल्पवास की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। श्रद्धालु इस दौरान आश्रमों में रहकर नियमित पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन करते हैं। सरयू स्नान, दान-पुण्य और भगवान के दर्शन को विशेष महत्व दिया जाता है। कल्पवास को संयम, साधना और आध्यात्मिक शांति का माध्यम माना जाता है। भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महीना हिंदू धर्म में कार्तिक मास को बेहद पवित्र माना गया है। यह चातुर्मास का अंतिम महीना है। धार्मिक मान्यता है कि इसी महीने भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसके साथ ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। कार्तिक में तुलसी पूजन, आंवले की पूजा और तुलसी-शालिग्राम विवाह का विशेष महत्व है। इस महीने दीपदान और दान-पुण्य करने की भी परंपरा है। धनतेरस से तुलसी विवाह तक होंगे आयोजन ज्योतिषविद् हरफूल शास्त्री के अनुसार, कार्तिक मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस महीने मां लक्ष्मी की आराधना करने से सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है। इसी महीने धनतेरस, दीपावली, भैया दूज और गोपाष्टमी जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। तुलसी विवाह और दीपदान भी कार्तिक मास के प्रमुख धार्मिक आयोजन हैं। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष कार्तिक मास 27 अक्टूबर से शुरू होकर 24 नवंबर तक चलेगा। इस दौरान रामनगरी के मंदिरों, आश्रमों और सरयू तट पर धार्मिक गतिविधियां बढ़ेंगी। श्रद्धालु भक्ति और साधना में लीन होकर पुण्य अर्जित करेंगे। श्री सीता माता मंदिर जानकी घाट के महंत अवनीशदास आचार्य ने बताया कि कार्तिक माह में कई पर्व पड़ने के कारण यह पूरा माह अत्यंत पवित्र माना गया है। यहीं कारण है कि श्रद्धालु पूरे एक मास तक राम नगरी में रहकर कल्पवास करते है। इस दौरान प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में सरयू नदी में पवित्र स्नान, दीपदान, तुलसी पूजन, जप-तप और रामकथा का श्रवण करते है।
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