भास्कर सीरीज; 7 दिन... 7 रामायण- अपनी-अपनी रामकथा: भाग-1:आनंद रामायण; दशरथ-कौशल्या के विवाह से पांच दिन पहले रावण ने कौशल्या का हरण कर लिया था

Nov 03, 2026 - 09:30
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भास्कर सीरीज; 7 दिन... 7 रामायण- अपनी-अपनी रामकथा: भाग-1:आनंद रामायण; दशरथ-कौशल्या के विवाह से पांच दिन पहले रावण ने कौशल्या का हरण कर लिया था
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के अलावा भी रामायण के कई और वर्जन हैं। इन्हीं में से एक है- आनंद रामायण। 15वीं सदी में रची गई इस रामायण में कुछ नए और रोचक प्रसंग दिए गए हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं- प्रसंग-1: रावण का मृत्यु के बारे में पूछना लंका में रावण ने ब्रह्माजी से पूछा- मैं कैसे मरूंगा? ब्रह्माजी ने कहा- राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या से साक्षात् भगवान पैदा होंगे। वही तुम्हें मारेंगे। आज से 5वें दिन दशरथ-कौशल्या का विवाह है। यह जानने के बाद रावण ने राजा दशरथ को नौका सहित डुबो दिया और कौशल्या का हरण कर लिया। उसने कौशल्या को पिटारी में बंद करके तिमिंगल मछली के पास रख दिया। सामने किसी शत्रु को देखकर वह मछली पिटारी को एक टापू पर रखकर युद्ध करने लगी। तभी दशरथ और सुमंत नौका के टुकड़े पर तैरते हुए उसी टापू पर पहुंच गए। पिटारी में कौशल्या को देख दशरथ बड़े खुश हुए और गंधर्व विवाह कर लिया। फिर तीनों पिटारी में घुस गए। ब्रह्माजी ने रावण से कहा- दशरथ का विवाह हो गया है। रावण ने मछली से पिटारी मंगवाई। इसमें से तीनों निकले। रावण ने इन्हें मारना चाहा, पर ब्रह्माजी ने रोक दिया। (प्रथम सारकाण्ड से) प्रसंग-2: जब वशिष्ठ ने सीता को मांगा चैत्र शुक्ल रामनवमी का दिन था। श्रीराम और सीता ऋषि-मुनियों को दान दे रहे थे। जब कामधेनु को गुरु वशिष्ठ को देने चले, तो वे सोचने लगे कि मेरे पास तो इसकी कन्या नन्दिनी है ही, इसे लेकर क्या करूंगा। वशिष्ठजी बोले- मुझे दान में सीता को दें। यह सुनकर लोग कहने लगे- वृद्ध वशिष्ठ पागल हो गया है। तभी राम ने सीता का बायां हाथ पकड़कर वशिष्ठजी के प्रसन्नार्थ कहा- आप स्त्री दान का मन्त्र बोलिए, मैं आपको सीता का दान करता हूं। वशिष्ठजी ने कहा- तथास्तु। फिर वे सीता से बोले- श्रीराम ने तुमको मेरे लिए अर्पित किया है। परन्तु मैं तुम्हें पुत्री मानता हूं। वशिष्ठजी बोले- हे राम! तुम्हारी उदारता देखने के लिए ही मैंने सीता को मांगा था। सीता पुनः तुम्हारी हो जाए, इसके लिए तुम इसे सोने के बराबर तौलो और 8 बार तौलने पर जितना सोना हो, वह मुझे दें। (याग काण्ड से) प्रसंग-3: राम को सेतु नहीं बनाना पड़ता एक बार श्रीराम और सीता कुरुक्षेत्र गए। वहां मुनि-पत्नियों ने सीता को आदर सत्कार से बैठाया। इन्हीं में से एक लोपामुद्रा ने पूछा- मेरी समझ में नहीं आता कि श्रीराम ने समुद्र पर सेतु बनाने का कष्ट क्यों उठाया? मेरे पति (अगस्त्य) से कह देते तो वे क्षणभर में समुद्र पी जाते। इस पर सीताजी ने कहा- यदि आपके पति से समुद्र पीने को कहते तो रामजी को सोचना पड़ता कि क्या यह उचित होगा? क्योंकि पुराकाल में एक समय अगस्त्यजी समुद्र को पी चुके हैं। फिर मूत्र-द्वार से इसे बाहर निकाला है। इसी से यह खारा है। क्या उसी खारे समुद्र को अगस्त्यजी फिर पीते। मान लें कि वे श्रीराम के कहने से पी भी जाते, तो इससे संसार में राम का अपयश होता कि स्वार्थ सिद्ध के लिए एक ब्राह्मण को उसका मूत्र पिला दिया। सेतु-बन्धन से राम की कीर्ति हुई। सीता की ये बातें सुनकर लोपामुद्रा ने हार मानी। (विलास काण्ड से) प्रसंग-4: 5 साल तक आश्रम में रहे जनक एक दिन जनक, उनकी पत्नी सुमेधा, सीता और श्रीराम एकान्त में बैठे थे। श्रीराम ने जनक से कहा, 'मैंने सोचा है कि जानकी को वाल्मीकि आश्रम में छोड़ दूं। आपको अपनी पत्नी के साथ 5 साल वहां रहना होगा।' जनक ने राज्यभार मंत्रियों को सौंपा और वाल्मीकि आश्रम को सुखों का भंडार बना दिया। सीता को जब 8वां महीना लग गया तो राम ने उनसे कहा- हे देवी! उस दिन एक धोबी ने अपनी व्यभिचारिणी स्त्री से कहा था- 'मैं वह राम नहीं हूं, जिन्होंने रावण के घर में रही सीता को वर्षों के बाद भी अंगीकार कर लिया है।' उसके बहाने मैं तुम्हें कुछ दिन वन में छोड़ दूंगा। दुनिया समझेगी कि मैंने लोकापवाद के भय से तुम्हें त्याग दिया है। तुम अपने दो स्वरूप बनाओ। सात्त्विक रूप से मेरे बाएं अंग में रहो और दूसरे रूप से वाल्मीकि आश्रम में रहकर संसार को मेरे वियोग का दुख दिखाओ। (जन्म काण्ड से)

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