घर की चारदीवारी से आगे महिलाओं की पहचान:BHU में बदलते जेंडर विमर्श पर अंतरराष्ट्रीय मंथन

Oct 30, 2026 - 18:26
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घर की चारदीवारी से आगे महिलाओं की पहचान:BHU में बदलते जेंडर विमर्श पर अंतरराष्ट्रीय मंथन
महिला ऑफिस में भी काम करे और घर लौटकर रसोई से लेकर बच्चों और परिवार की पूरी जिम्मेदारी भी संभाले, आखिर यह व्यवस्था कब तक चलेगी? जब नौकरी महिला और पुरुष दोनों कर रहे हैं तो घर की जिम्मेदारी भी दोनों की क्यों नहीं? बदलते समाज के बीच यह सवाल शुक्रवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रमुखता से उठा। यहां वक्ताओं ने साफ कहा कि महिलाओं के सपनों और उनकी क्षमताओं को जैविक पहचान के दायरे में कैद नहीं किया जा सकता। समाज को अपनी पुरानी सोच बदलनी होगी। बीएचयू के समाजशास्त्र विभाग की ओर से वैदिक विज्ञान केंद्र में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'Gender in Flux' में भारत समेत छह देशों के विद्वानों ने जेंडर, समानता, सामाजिक बदलाव और महिलाओं की बदलती भूमिका पर खुलकर विचार रखे। भारतीय परंपरा में भी महिलाओं की बौद्धिक ताकत के उदाहरण निवेदिता भिड़े ने कहा - जेंडर की बहस को केवल पश्चिमी विचारधारा के चश्मे से देखने के बजाय भारतीय इतिहास, संस्कृति और दर्शन के आधार पर भी समझना होगा। बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी के संवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरा में महिलाओं की ज्ञान संबंधी जिज्ञासा और बौद्धिक क्षमता के उदाहरण मौजूद हैं। रामायण और महाभारत के स्त्री पात्र भी महिलाओं की निर्णय क्षमता और सामाजिक भूमिका को समझने के महत्वपूर्ण आधार हैं। सिर्फ पैसा और सुविधाएं नहीं, इंसान की बेहतरी भी विकास मुख्य अतिथि पद्मभूषण प्रो. कपिल कपूर ने विकास की प्रचलित परिभाषा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि विकास का मतलब सिर्फ पैसा, भौतिक सुविधाएं और सुख-साधन नहीं है। इसमें मानवीय चेतना, आंतरिक कल्याण और सामाजिक जिम्मेदारी भी शामिल होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज लिए गए फैसलों का असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है। इसलिए समाज को केवल वर्तमान नहीं, भविष्य को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए। कुलपति बोले- सोच बदली, लेकिन बराबरी की मंजिल अभी दूर बीएचयू के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा - पिछले पांच से छह दशकों में भारतीय समाज में महिलाओं की पहचान, भूमिकाओं, जागरूकता और अवसरों को लेकर काफी बदलाव आया है। संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों ने इस बदलाव को मजबूती दी है, लेकिन वास्तविक समानता हासिल करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। उन्होंने कहा कि किसी की जैविक पहचान उसके सपनों और उपलब्धियों की सीमा नहीं बननी चाहिए।

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