केरल हाईकोर्ट बोला- लोकतंत्र में धरना-भूख हड़ताल की जगह नहीं:कॉलेज पढ़ाई के लिए, राजनीति के लिए नहीं; आंदोलनकारी छात्रों को संस्थान से निकाल सकते हैं

Nov 04, 2026 - 10:57
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केरल हाईकोर्ट बोला- लोकतंत्र में धरना-भूख हड़ताल की जगह नहीं:कॉलेज पढ़ाई के लिए, राजनीति के लिए नहीं; आंदोलनकारी छात्रों को संस्थान से निकाल सकते हैं
केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी गतिविधियों की संवैधानिक लोकतंत्र में जगह नहीं है। कोर्ट ने कहा- शिक्षण संस्थान पढ़ाई के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं। आंदोलनों में शामिल छात्रों को संस्थान से निष्कासित किया जा सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी कालडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी के 16 निलंबित छात्रों के मामले में की। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें छात्रों को सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की इजाजत दी गई थी। यूनिवर्सिटी ने छात्रों को 13 अगस्त को कैंपस में हुई घटनाओं की जांच लंबित रहने तक 1 सितंबर को निलंबित किया था। इसके बाद छात्रों ने निलंबन को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। 13 अगस्त की घटना के बाद सस्पेंड हुए थे 16 छात्र यूनिवर्सिटी ने 1 सितंबर 2026 को आदेश जारी कर 16 छात्रों को निलंबित किया था। यह कार्रवाई 13 अगस्त को कैंपस में हुई घटनाओं की जांच पूरी होने तक की गई थी। यूनिवर्सिटी ने मामले की जांच के लिए एक कमेटी भी बनाई थी। निलंबन के बाद छात्रों के कैंपस में प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। उन्हें सिर्फ जांच कमेटी की ओर से तय तारीखों पर सुनवाई में शामिल होने के लिए आने की अनुमति थी। छात्रों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उनका लंबे समय तक निलंबन गैरकानूनी है। इससे वे कक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे हैं और उनकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है। उनका तर्क था कि निलंबन के कारण अटेंडेंस कम होने पर उन्हें परीक्षा देने से नहीं रोका जाना चाहिए। यूनिवर्सिटी बोली- छात्रों की अटेंडेंस और जरूरी शर्तें पूरी नहीं यूनिवर्सिटी ने कोर्ट में कहा कि छात्र परीक्षा में बैठने के लिए तय पात्रता शर्तें पूरी नहीं करते। इनमें न्यूनतम अटेंडेंस और इंटरनल परीक्षाएं सफलतापूर्वक पूरी करना शामिल है। यूनिवर्सिटी के मुताबिक, छात्रों ने अटेंडेंस की कमी माफ करने के लिए नियमों के तहत जरूरी आवेदन भी जमा नहीं किए थे। इसके साथ ही जरूरी दस्तावेज और संबंधित विभागों के प्रमुखों या सेंटर के निदेशकों की सिफारिश भी नहीं दी गई थी। इससे पहले 30 अक्टूबर को सिंगल जज ने यूनिवर्सिटी को छात्रों की परीक्षा फीस स्वीकार करने और उन्हें परीक्षा में बैठने देने का निर्देश दिया था। यह अनुमति उनकी मुख्य याचिका पर आने वाले अंतिम फैसले के अधीन थी। परीक्षाएं 4 नवंबर से शुरू होनी थीं। डिवीजन बेंच ने कहा- सिंगल जज ने मुख्य राहत ही दे दी जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. की डिवीजन बेंच ने कहा कि छात्रों की याचिका में ऐसे जरूरी तथ्य और दस्तावेज नहीं थे, जिनसे परीक्षा में बैठने की उनकी पात्रता साबित हो सके। कोर्ट ने पाया कि किसी भी छात्र ने अटेंडेंस की कमी माफ करने के लिए जरूरी आवेदन जमा नहीं किया था। इसके साथ ही आवेदन के समर्थन में जरूरी दस्तावेज और संबंधित विभाग प्रमुखों या सेंटर निदेशकों की सिफारिश भी नहीं दी गई थी। बेंच ने कहा कि सिंगल जज ने यह जांच किए बिना ही छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी कि वे यूनिवर्सिटी के नियमों के मुताबिक पात्र हैं या नहीं। इस तरह अंतरिम आदेश के जरिए छात्रों को वही मुख्य राहत दे दी गई, जिसकी मांग उन्होंने अपनी याचिका में की थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतें यूनिवर्सिटी या किसी अन्य संस्था को ऐसे निर्देश नहीं दे सकतीं, जो कानून या तय नियमों के खिलाफ हों। 2017 के फैसले में भी राजनीतिक गतिविधियों पर की गई थी टिप्पणी डिवीजन बेंच ने 2017 के मामले डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मोहम्मद रफीक में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में भी हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा था कि धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों की संवैधानिक लोकतंत्र में जगह नहीं है, खासकर शैक्षणिक संस्थानों में। उस फैसले में कहा गया था कि ऐसी गतिविधियों में शामिल होने वाले छात्रों को निष्कासित या संस्थान से बाहर किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि राजनीतिक दल अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए शिक्षण संस्थानों या वहां पढ़ने वाले दूसरे छात्रों के शिक्षा के अधिकार को बाधित नहीं कर सकते। आंबेडकर के संविधान सभा में दिए भाषण का भी जिक्र हाईकोर्ट ने 2017 के फैसले में डॉ. भीमराव आंबेडकर के 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में दिए गए भाषण का भी उल्लेख किया। इसमें आंबेडकर ने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए संवैधानिक तरीकों को अपनाने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि जब संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हों, तब सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसे तरीकों को अपनाना अराजकता का रास्ता बन सकता है। उन्होंने ऐसे तरीकों को 'अराजकता का व्याकरण' (Grammar of Anarchy) कहा था। बेंच ने इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रिंसिपल बनाम अनस पी.एम. मामले में दिए गए एक अन्य फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि निलंबन के कारण अटेंडेंस में आई कमी का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ सकता है।

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